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'पेनिट्रेशन बिना इजैकुलेशन रेप नहीं...', HC ने ये कहकर दोषी की सजा घटा दी

Chhattisgarh High Court: सरकारी वकील ने बताया कि अपीलकर्ता ने 2004 में पीड़िता का हाथ पकड़ा. उसे जबरदस्ती अपने घर ले गया, जहां उसने उसकी मर्जी के बिना शारीरिक संबंध बनाए.

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रेप के दावे पर छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का बड़ा फैसला. (Chhattisgarh High Court)

‘महिला के प्राइवेट पार्ट में बिना पेनिट्रेशन पुरुष के वीर्यपात यानी इजैकुलेशन को रेप नहीं माना जा सकता.’ छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने साल 2004 के एक मामले की सुनवाई करते हुए ये कॉमेंट किया है. इस मामले में पीड़िता का आरोप था कि उसके साथ रेप किया गया है, जबकि कोर्ट ने कहा कि पेनिट्रेशन नहीं हुआ था इसलिए इसे रेप नहीं माना जा सकता. इस मामले में कोर्ट ने आरोपी को ‘रेप की कोशिश’ का दोषी मानते हुए सजा सुनाई. इस कमेंट के साथ कोर्ट ने निचली अदालत से दोषी को मिली 7 साल की सजा को घटाकर 3 साल 6 महीने कर दी.

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इस केस को लेकर कुछ अहम बातें हैं, जिन्हें जानना जरूरी है. एक तो केस 2004 का है. यानी बीएनएस (भारतीय न्याय संहिता) के बजाय इंडियन पीनल कोड (IPC) के तहत इस पर सुनवाई हुई. इसके अलावा यह मामला 2013 से भी पहले का है जबकि साल 2013 में सरकार ने रेप से संबंधित धाराओं में बदलाव किए थे. छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की एकल पीठ ने घटना के समय लागू कानून और पेश किए गए सबूतों के आधार पर अपना फैसला सुनाया. जस्टिस व्यास ने कहा कि IPC की धारा 375 के तहत केवल पेनिट्रेशन होने के मामले में ही किसी को रेप करने का दोषी माना जा सकता है. 

कोर्ट ने अपने फैसले में 'पेनिट्रेशन' और 'इजैकुलेशन' जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया है. लेकिन ये होते क्या हैं? महिला के निजी अंग (योनि) में पुरुष के जननांग का प्रवेश करना ‘पेनिट्रेशन’ (Penetration) कहा जाता है. पुरुष के वीर्यपात को ‘इजैकुलेशन’ कहा जाता है. लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास ने कहा,

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इंडिसेंट असॉल्ट (अनुचित यौन हमले) को अक्सर रेप की कोशिश के तौर पर पेश किया जाता है. इस नतीजे पर पहुंचने के लिए सबूत मौजूद होने चाहिए कि आरोपी का व्यवहार हर हाल में और हर तरह के विरोध के बावजूद अपने जुनून को पूरा करने के पक्के इरादे का इशारा था. जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है. रेप के जुर्म के लिए जरूरी शर्त पेनिट्रेशन है, इजैकुलेशन नहीं. बिना पेनिट्रेशन के इजैकुलेशन रेप करने की कोशिश है, असल में रेप नहीं.

हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि ट्रायल के दौरान पीड़िता ने दूसरी बातों के साथ ये भी कहा था कि ‘पेनिट्रेशन’ हुआ था. हालांकि, पीड़िता ने आगे यह भी कहा कि दोषी ने अपना प्राइवेट पार्ट लगभग 10 मिनट तक उसके निजी अंग के ऊपर रखा था, लेकिन प्रवेश नहीं किया था. उसकी बात उसकी मां और दादा के बयानों से भी सही साबित हुई. जिस डॉक्टर ने पीड़िता की मेडिकल जांच की थी, उसने पाया कि पीड़िता का हाइमन (Hymen) सही सलामत है. 

डॉक्टर की तरफ से रेप के बारे में कोई पक्की बात भी नहीं कही गई थी. फिर भी क्रॉस-एग्जामिनेशन में ‘आंशिक पेनिट्रेशन’ की संभावना सामने आई. इसके अलावा पीड़िता के अंडरगारमेंट से ह्यूमन स्पर्म भी मिला. हालांकि, जस्टिस व्यास ने पीड़िता के बयानों में विरोधाभास देखते हुए कहा कि 2013 संशोधन से पहले IPC की धारा 375 में रेप के लिए पेनिट्रेशन जरूरी है. उन्होंने कहा,

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IPC की धारा 376 के तहत सजा के लिए हल्का सा पेनिट्रेशन भी काफी है. इसलिए यह साफ है कि रेप के जुर्म के लिए पेनिट्रेशन जरूरी है और पेनिट्रेशन साबित करने के लिए साफ और ठोस सबूत होने चाहिए कि आरोपी के लिंग का कुछ हिस्सा महिला के प्यूडेंडम के लेबिया के अंदर था. चाहे वह कितना भी हो. जो आरोपी को IPC की धारा 376 के तहत सजा वाले जुर्म के लिए दोषी ठहराने के लिए काफी है.

पीड़िता की तरफ से पेश सरकारी वकील के मुताबिक, 21 मई 2004 को अपील करने वाले दोषी ने पीड़िता का हाथ पकड़ा. उसे जबरदस्ती अपने घर ले गया, जहां उसने पीड़िता की मर्जी के बिना शारीरिक संबंध बनाए. इसके बाद उसने पीड़िता को अपने घर के कमरे में बंद कर दिया. उसके हाथ-पैर बांध दिए और उसके मुंह में कपड़ा ठूंस दिया. इन सब तथ्यों को देखते हुए कोर्ट ने कहा कि यह मामला 'रेप की तैयारी' से बढ़कर 'रेप की कोशिश' तक पहुंच गया. 

घटना में अपीलकर्ता का बर्ताव दिखाता है कि उसकी रेप की करने की पूरी मंशा थी. अपना इरादा पूरा करने के लिए उसने काफी कुछ किया. आखिर में हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता को IPC की धारा 376(1) (रेप) के बजाय IPC की धारा 376/511 (रेप की कोशिश) के तहत सजा के लायक जुर्म के लिए दोषी ठहराया. 

कोर्ट ने उसे 3 साल 6 महीने की कड़ी कैद की सजा सुनाई और 200 रुपये का जुर्माना लगाया. IPC की धारा 342 (गलत तरीके से किसी को बंधक बनाना) के तहत उसको मिली सजा को बरकरार रखा गया. वह बेल पर है, इसलिए उसे बाकी सजा काटने के लिए ट्रायल कोर्ट के सामने सरेंडर करने का आदेश दिया गया.

साल 2005 में धमतरी के एडिशनल सेशंस जज ने उसे IPC की धारा 376(1) और 342 यानी रेप और गलत तरीके से बंधक बनाने का दोषी ठहराते हुए 7 साल की सजा सुनाई थी. इसके खिलाफ उसने हाई कोर्ट में अपील की थी.

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