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गंगा में इफ्तार पार्टी के 8 आरोपियों को बड़ी राहत, हाईकोर्ट ने 'सच्चा पछतावा' देख जमानत दी

आरोपियों ने हाई कोर्ट का दरवाजा तब खटखटाया, जब वाराणसी की एक सेशंस कोर्ट ने 1 अप्रैल, 2026 को उनकी जमानत की अर्जियां खारिज कर दी थीं. इससे पहले, चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट कोर्ट ने भी उनकी जमानत की अर्जियां खारिज कर दी थीं.

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गंगा में नाव पर इफ्तार करने वाले लोगों पर एफआईआर दर्ज हुई थी (PHOTO-AajTak)

इलाहबाद हाईकोर्ट ने 15 मई को वाराणसी में गंगा नदी में नाव पर इफ्तार करने के मामले में 8 लोगों को जमानत दे दी. उन पर आरोप था कि उन्होंने बीच गंगा में नॉन वेज खाया और हड्डियां नदी में फेंक दी. 15 मई को जारी अलग-अलग आदेशों में जस्टिस राजीव लोचन शुक्ला ने 5 आरोपियों को जमानत दी, जबकि जस्टिस जितेंद्र कुमार सिन्हा ने बाकी 3 आरोपियों को बेल ग्रांट कर दी. जिन लोगों को जमानत मिली है, उनके नाम मोहम्मद आज़ाद अली, मोहम्मद तहसीम, निहाल अफरीदी, मोहम्मद तौसीफ, मोहम्मद अनस, मोहम्मद समीर, मोहम्मद अहमद रजा और मोहम्मद फैजान हैं. 

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लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, मामले में 14 आरोपियों में से 8 को अब जमानत मिल गई है. बेल मामले पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा कि आरोपियों ने अपने किए पर माफी मांगी है और उनके परिवारों ने भी माना है कि इस घटना से एक समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंची है. कोर्ट ने कहा कि जमानत याचिका के साथ दाखिल एफिडेविट और आरोपियों के वकील की दलीलों से साफ दिखता है कि उन्हें अपने कथित करनी पर ‘सच्चा पछतावा’ है.

कोर्ट ने यह भी कहा कि वीडियो में अपनी मौजूदगी से इनकार न करना और बाद में अफसोस जताना इस बात का संकेत है कि आरोपी अपने शपथ पत्र में कही बातों को गंभीरता से स्वीकार कर रहे हैं. सिर्फ कानून से बचने का बहाना नहीं बना रहे. कोर्ट ने आरोपियों के खिलाफ बाद में लगाए गए जबरन वसूली (एक्सटॉर्शन) के आरोपों पर भी संदेह जताया. जांच के दौरान नाविक अनिल साहनी ने आरोप लगाया था कि आरोपियों ने उन्हें धमकाया और उनकी नाव जबरन कब्जे में ले ली थी लेकिन कोर्ट को यह दावा संदिग्ध लगा. 

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अदालत ने कहा कि केस दर्ज होने से पहले नाविक ने इस कथित वसूली को लेकर न तो कोई शिकायत की और न ही कोई रिपोर्ट दर्ज कराई. अदालत की शुरुआती राय में अनिल साहनी द्वारा देर से लगाए गए आरोप उनकी कहानी पर सवाल खड़े करते हैं.

पहले खारिज हो चुकी थी बेल याचिका

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक आरोपियों ने हाईकोर्ट का दरवाजा तब खटखटाया, जब वाराणसी की सेशंस कोर्ट ने 1 अप्रैल, 2026 को उनकी जमानत की अर्जियां खारिज कर दी थीं. इससे पहले चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट कोर्ट ने भी उनकी जमानत की अर्जियां खारिज कर दी थीं.

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क्या था पूरा मामला?

ये पूरा मामला मार्च 2026 का है. 14 लोगों को 17 मार्च 2026 को वाराणसी पुलिस ने भारतीय जनता युवा मोर्चा के जिला अध्यक्ष रजत जायसवाल की शिकायत के बाद गिरफ्तार किया था. आरोपियों पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 196(1)(b), 270, 279, 298, 299, 308 और 223(b) के साथ-साथ पानी (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1974 की धारा 24 के तहत मामला दर्ज किया गया था. शिकायत के अनुसार, आरोपियों ने गंगा नदी में नाव पर बैठकर इफ्तार के दौरान चिकन बिरयानी खाई और कथित तौर पर बचा हुआ खाना पानी में फेंक दिया.

शिकायत में कहा गया कि यह काम बहुत निंदनीय था. शिकायतकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि यह जान-बूझकर ‘जिहादी मानसिकता’ को बढ़ावा देने के लिए किया गया था और इससे सनातन धर्म को मानने वाले लोगों की भावनाएं आहत हुई थीं.

ओवैसी ने पूछा था सवाल?

ये मामला काफी चर्चा में रहा. हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने इस मामले पर बयान देकर सवाल किया था. उन्होंने पूछा कि गंगा में नाव पर रोजा खोलने से किसी की धार्मिक भावनाएं कैसे आहत हो सकती हैं? उन्होंने पूछा था,

किसकी धार्मिक भावनाएं आहत हो रही हैं? क्या गंगा नदी में बहाया जा रहा गंदा सीवर वाला पानी आपको आहत नहीं करता?

इस घटना ने एक राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया था. इसमें विपक्षी नेता गिरफ्तारियों पर और उन आधारों पर सवाल उठा रहे हैं जिनके तहत यह माना गया कि धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं.

वीडियो: वाराणसी में गंगा के बीच नाव पर इफ्तार करने वालों के साथ क्या हुआ?

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