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'द ग्रेट कलकत्ता किलिंग्स' की कहानी, जिसे 'भारत विभाजन का रिहर्सल' कहा गया

The Great Calcutta Killings: देश के विभाजन और आजादी के ठीक एक साल पहले कलकत्ता में जो हुआ, कहा जाता है कि इससे ही तय हुआ कि मुसलमानों को उनका एक अलग मुल्क दिया जाएगा. और इस सबका सूत्रधार एक ही व्यक्ति था - मोहम्मद अली जिन्ना.

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Great Calcutta Killings ने ही भारत के बंटवारा की नींव रखी थी. (फोटो-इंडिया टुडे)

तारीख 16 अगस्त 1946. कलकत्ते की एक उमस से भरी सुबह थी. लेकिन इस सुबह से ट्रॉम की आवाजें और बाजारों का शोर गायब था. ब्रिटिश आर्मी की एक टुकड़ी शहर की मुख्य सड़कों पर मौजूद थी. फौज के अफसर डरे हुए थे. दिन चढ़ने के साथ न जाने क्या होने वाला था. उनकी आशंकाएं सच साबित होने वाली थीं. शहर में एक हिंसक तूफान आने वाला था. अगले चार दिनों में 4 हजार से 10 हजार लोग मारे जाने वाले थे. 15 हजार लोग घायल होने वाले थे. 1 लाख से ज्यादा लोग बेघर होने वाले थे.

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कई लाशों को हुगली में बहाया जाना था. जिनकी कहीं कोई गिनती नहीं थी. कलकत्ता की सड़कों पर मौत का नाच आयोजित था. हिन्दू-मुसलमान तलवार से एक दूसरे को काटने को दौड़ने वाले थे. ये किसी साधारण दंगे की सुगबुगाहट नहीं थी. ये दरअसल इंडिया पाकिस्तान के विभाजन का रिहर्सल था, जिसे इतिहास में लिखा गया - The Great Calcutta Killings

देश के विभाजन और आजादी के ठीक एक साल पहले कलकत्ता में जो हुआ, कहा जाता है कि इससे ही तय हुआ कि मुसलमानों को उनका एक अलग मुल्क दिया जाएगा. इन सबका सूत्रधार एक ही व्यक्ति था- मोहम्मद अली जिन्ना. 

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विवाद की शुरुआत होती है मार्च 1940 में. इस साल 22 से 24 मार्च तक लाहौर में ऑल इंडिया मुस्लिम लीग की एक मीटिंग हुई. मीटिंग के दूसरे दिन यानी 23 मार्च को एक रेसोल्यूशन पास किया गया. इसे कहा गया- लाहौर रेसोल्यूशन. ये था पाकिस्तान का खाका. भारत के मुस्लिम बहुल प्रांतों को मिलाकर एक अलग देश की मांग यहीं से उठी लेकिन कांग्रेस पार्टी शुरु से ही इस प्लान के समर्थन में नहीं थी. उनका मत था कि देश का विभाजन नहीं होना चाहिए. 

काफी आंदोलनों और प्रदर्शनों के बाद 1946 आते-आते ब्रिटिश हुकूमत को लगने लगा था कि अब भारत की हुकूमत भारतीय राजनेताओं के पास जानी चाहिए. इस वजह से मार्च 1946 में तत्कालीन ब्रिटिश प्राइम मिनिस्टर क्लीमेंट एटली ने तीन सीनियर अधिकारियों की टीम को इंडिया भेजा. Stafford Cripps, A.V. Alexander, Lord Pethick-Lawrence. इस तिकड़ी का नाम था- कैबिनेट मिशन. काम था भारत के नेताओं को देश की आजादी सौंपना लेकिन इस पावर ट्रांसफर के अलावा इस मिशन के सामने एक और चुनौती थी. भारत का विभाजन रोकना. क्योंकि मुस्लिम लीग बंटवारा चाह रही थी और कांग्रेस ठीक इसका उल्टा. 

कैबिनेट मिशन का सोचना था कि किसी तरह से कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच सुलह करा ली जाए. ताकि पावर ट्रांसफर की गाड़ी कहीं फंस न जाए. फिर एक प्लान बनाया गया. इसे कहा गया कैबिनेट मिशन प्लान. इसके तहत तीन लेयर की सत्ता होने की बात कही गई. केंद्र, प्रॉविन्स और प्रोविंशियल ग्रुपिंग्स. यानि प्रांतों एक समूह और इस प्रोविंशियल ग्रुपिंग का आधार बना धर्म. ऐसे में तीन प्रोविंशियल ग्रुप सामने आए.

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हिन्दूबहुल ग्रुप ए - मद्रास, मध्य प्रांत, यूनाइटेड प्रोविन्स, बिहार, बॉम्बे और उड़ीसा
मुस्लिमबहुल ग्रुप बी - पंजाब, सिंध, उत्तरी पश्चिमी खाड़ी क्षेत्र और बलूचिस्तान और
मुस्लिमबहुल ग्रुप सी - बंगाल और असम

इनके ऊपर एक कमजोर केंद्र की सरकार होती, जिसके पास बस रक्षा, विदेश, वित्त और संचार जैसे मंत्रालय होते. जिन्ना और मुस्लिम लीग ने इस प्लान पर ताली पीटी क्योंकि उन्हें राज करने के लिए ग्रुप बी और सी मिल रहे थे. इन्हें वो भारत का हिस्सा रहकर चला सकते थे. 6 जून 1946. जिन्ना ने इस कैबिनेट मिशन प्लान को स्वीकार कर लिया था. वो भी constituent assembly का हिस्सा बनने के लिए रेडी हो गए. भारत का विभाजन कुछ समय के लिए टल गया. 

जिन्ना तो इस प्लान से इतना खुश थे कि उन्होंने चिट्ठियां भी लिखीं कि आगे आने वाले समय में मुस्लिम लीग को हिंदुस्तान की सत्ता भी मिल सकती है लेकिन कांग्रेस जो थी, वो इस कैबिनेट मिशन प्लान के लिए तैयार नहीं थी. वो धर्म के आधार पर बंटवारा क्या, किसी किस्म का कोई विभेद नहीं चाहती थी. ऐसे में एक दिन जवाहरलाल नेहरू ने जिन्ना की पूरी प्लानिंग पर पानी फेर दिया.

10 जुलाई 1946 का दिन. इस दिन नेहरू ने बंबई में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की. नेहरू ने कहा कि कांग्रेस ने constituent assembly में शामिल होने पर सहमति जताई है लेकिन वो किसी भी चीज से बंधी नहीं है. नेहरू ने ये भी कहा कि कांग्रेस के पास कैबिनेट मिशन प्लान में बदलाव करने का अधिकार है. नेहरू की इस बात ने जिन्ना को आगबबूला कर दिया. जिन्ना को लगा कि नेहरू ऐसा कर देंगे तो मुस्लिम बहुल प्रांतों वाले दो ग्रुप पर राज करने का उनका ख्वाब भी टूट जाएगा. 

नेहरू के जवाब में जुलाई 1946 में ही जिन्ना ने अपने बॉम्बे वाले घर में एक प्रेस कान्फ्रेन्स की. जिन्ना ने ऐलान किया कि वो अब constituent assembly का हिस्सा नहीं बनेंगे और उन्होंने कैबिनेट मिशन प्लान से समर्थन वापस ले लिया. फिर जुलाई महीने में ही मुस्लिम लीग काउंसिल की कुछ मीटिंग्स में जिन्ना ने कह डाला, “हमने सारे तरीके आजमा डाले. अब हम संवैधानिक तरीकों को अलविदा कह रहे हैं. अब हमें या तो विभाजित भारत चाहिए या बर्बाद भारत.” यानी जिन्ना अब अपने पुराने लाहौर रेसोल्यूशन वाले प्लान पर वापस चले गए थे. वो देश का बंटवारा चाह रहे थे. कैबिनेट मिशन प्लान को मुस्लिम लीग और कांग्रेस, दोनों ने रद्दी की टोकरी में डाल दिया.

इसके साथ ही जिन्ना ने एक ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ का ऐलान किया. वो दिन, जिस दिन सड़कों पर उतरना तय हुआ. प्लान ये कि मुस्लिम समुदाय के लोग इस दिन हड़ताल करेंगे. प्रोटेस्ट मार्च निकालेंगे. ताकि पाकिस्तान की मांग बुलंद की जा सके. तारीख तय हुई - 16 अगस्त. देशभर में इस दिन डायरेक्ट एक्शन डे की हड़ताल होनी थी, लेकिन बंगाल में इस दिन का एक अलग मतलब निकाला गया. 

16 अगस्त का दिन नजदीक आते ही जिन्ना के खास कमांडर और बंगाल के तब के मुख्यमंत्री हुसैन शहीद सुहरावर्दी ने बंगाल के गवर्नर सर फ्रेडरिक बरो से मीटिंग की. एजेंडा था कि मुस्लिम लीग के डायरेक्ट एक्शन डे को सफल बनाया जाए. उन्होंने गवर्नर से डिमांड की कि 16 अगस्त के दिन बंगाल में पब्लिक हॉलिडे घोषित कर दिया जाए. गवर्नर मान गए. बंगाल में छुट्टी घोषित हो गई.

लेकिन बंगाल में इतना फोकस क्यों?

1941 की जनगणना के मुताबिक, बंगाल में 54% मुसलमान और 44% हिंदू आबादी थी. हालांकि, ज्यादातर मुसलमान पूर्वी बंगाल (जो आज बांग्लादेश है) के गांवों में रहते थे. वहीं, कोलकाता में ज्यादातर हिंदू (73% हिंदू और 23% मुसलमान) रहते थे. प्रदेश में मुसलमान ज्यादा थे लेकिन कोलकाता शहर में मुसलमानों की स्थिति सामाजिक, आर्थिक और भौगोलिक रूप से हाशिये पर थी.

इन दोनों समुदायों के बीच संबंध 20वीं सदी की शुरुआत से ही तनावपूर्ण रहे थे. बंगाल में, खासकर कोलकाता में, समय-समय पर सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं होती रहती थीं. साल 1946 में बंगाल पर मुस्लिम लीग का राज था. इसलिए, मुस्लिम लीग के लिए ये एक अच्छी जगह थी कि वो अपना प्रदर्शन कर सके.

लेकिन मुस्लिम लीग के इस सरकारी छुट्टी वाले प्लान से कांग्रेस एकदम नाखुश थी. कांग्रेस का कहना था कि सरकारी छुट्टी की आड़ में मुस्लिम लीग अपनी हड़ताल को सफल दिखाने का प्रयास करेगी. लिहाजा, बंगाल कांग्रेस ने विरोध शुरू किया. छिटपुट खबरें बताती हैं कि बंगाल कांग्रेस के नेताओं ने कुछ हिन्दू दुकानदारों को पुश करना शुरू किया कि हड़ताल के दिन अपनी दुकानें खोलें. कुछ हिस्सों में कांग्रेस की मांग को समर्थन भी मिला.

आखिरकार कैलेंडर में 16 अगस्त की तारीख लगी. सुबह 10 बजे का वक्त. कलकत्ता के बीचोबीच मौजूद Ochterlony Monument के मैदान में मुसलमानों की भीड़ जमा होनी शुरू हुई. अगर आप आज की तारीख में कलकत्ता जाते हैं, तो इस जगह आपको शहीद मीनार दिखाई देगी. कलकत्ता के कुछ हिस्सों के अलावा हावड़ा, हुगली और 24 परगना के इलाकों से मुस्लिम समुदाय के लोगों की भीड़ इस मैदान में प्रवेश कर रही थी.

मुस्लिम लीन ने 5 लाख की भीड़ की उम्मीद की थी. शायद उससे भी ज्यादा आए. लगभग एक हजार Muslim National Guard volunteers तैनात थे. मंच से सुहरावर्दी और दूसरे नेताओं ने पाकिस्तान के पक्ष में भाषण दिए. सुहरावर्दी ने कहा 

‘Direct Action Day’ मुसलमानों की आजादी का पहला कदम है. 

जिस समय सुहरावर्दी ऐसे भाषण दे रहे थे, ठीक इस समय ही नॉर्थ कलकत्ता के कुछ हिस्सों में हिंसा शुरू हो गई. बंद के दिन जो दुकानें खुली थीं, उन्हें जबरदस्ती बंद करवाया जा रहा था. कुछ जगहों पर पत्थर चले. कुछ जगह लाठीमार लड़ाइयां हुईं.  कुछ लोगों को चाकू भी मारे गए. राजा बाजार, कॉलेज स्ट्रीट, हैरिसन रोड और बड़ा बाजार के इलाके सबसे पहले इस हिंसा की जद में आए. पुलिस ने लाठीचार्ज किया. बात नहीं बनी. फिर फायर खोल दिया गया.

दोपहर होते-होते नॉर्थ कलकत्ता पूरी तरह से युद्ध क्षेत्र बन चुका था. मुस्लिम लीग के समर्थकों की भीड़ को देखकर लग रहा था कि उन्हें सीएम सुहरावर्दी की शह मिली हो. पुलिस कोई एक्शन नहीं ले रही थी, जैसे उन्हें रुकने को कहा गया हो. उस समय TIME/LIFE जैसी पत्रिकाओं की स्टार फोटोग्राफर मार्गरेट बर्क व्हाइट भारत के दौरे पर थीं और कलकत्ता में ही मौजूद थीं. उनकी रिपोर्ट में हैरीसन रोड पर चाय की दुकान चलाने वाले नंदालाल के अकाउंट भी मिलते हैं. ईस्ट बंगाल केबिन नाम से दुकान चलाने वाले नंदा लाल ने कहा कि 7 लॉरियों में भरकर मुस्लिम लीग के गुंडे आए. वो लोहे की छड़ों और बोतलों से लैस थे.

हैरिसन रोड पर आते ही उन्होंने हिंदुओं की दुकानों में तोड़फोड़ शुरू कर दी. वो घरों में घुसने की कोशिश करने लगे. जो घर भीतर से बंद थे, उन्होंने उन घरों की मुंडेरों से कूदने की कोशिश भी की. वहां मौजूद कुछ लोगों ने भी विरोध किया. दोनों तरफ से मारकाट चल रही थी.

शाम 6 बजते-बजते नॉर्थ कलकत्ता के कई इलाकों में कर्फ्यू लगा दिया गया. सेना की कई टुकड़ियां सड़कों पर उतर आईं. अंदरूनी इलाके और सघन मोहल्ले पुलिस के हवाले किये गए.
उसी रात विवेकानंद रोड और सेंट्रल अवेन्यू की क्रॉसिंग पर एक दिल दहला देने वाली घटना हुई. 50 हिंदू रिक्शा चालक एक डेड-एंड में फंस गए. वो बिहार से कलकत्ते में रोजी-रोटी कमाने आए थे. उनके पास भागने की कोई जगह नहीं थी. उन्हें वहीं काटकर फेंक दिया गया.

पहले दिन हुई हिंसा में अधिकतर हिन्दू समुदाय के लोगों की जान गई थी. 17 अगस्त से हिन्दू समुदाय ने भी हिंसा शुरू की. बड़ा बाजार, पार्क सर्कस, भवानीपुर - सभी जगहों पर हिन्दू समुदाय के लोगों ने मुस्लिम समुदाय पर हमले किये. गोपाल मुखर्जी उर्फ गोपाल पाठा ने हिंदुओं की भीड़ का नेतृत्व किया. उन्होंने मुस्लिम लीग के लोगों पर हमले शुरू किए. 

18-19 अगस्त को हावड़ा स्टेशन के आसपास के इलाकों में हिंसा हुई. कहा गया कि जो लोग बंगाल छोड़कर भाग रहे थे, उन्हें हावड़ा स्टेशन पहुंचने के पहले ही हावड़ा ब्रिज पर ही पकड़कर मार डाला गया. कलकत्ता के निवासी और कांग्रेस कार्यकर्त्ता जुगल चंद्र घोष ने बयान दिया, “मैंने लाशों से भरे चार ट्रक्स देखे. ऊपर तक लाशें भरी हुई थीं. उन लाशों से खून और उनके दिमाग के कुछ हिस्से रिसकर जमीन पर गिर रहे थे.”

इस पूरी हिंसा में सबसे अधिक सवाल उठे चीफ मिनिस्टर सुहरावर्दी के रोल पर. कई जगह छपी खबरें बताती हैं कि कलकत्ता के दंगों के समय सुहरावर्दी लालबाजार में मौजूद पुलिस हेडकॉर्टर में आवाजाही कर रहे थे. उनका जब मन करता, वो पुलिस मुख्यालय चले आते. साथ ही आते उनके ढेर सारे समर्थक. कहा जाता है कि इस दौरान सुहरावर्दी लगातार पुलिस को कोई भी एक्शन लेने से रोकते रहे. हालांकि मुस्लिम लीग के समर्थक कह रहे थे कि सुहरावर्दी तो बस हालात पर नजर बनाए हुए थे. लेकिन सच सभी जानते थे.

आगे आने वाले समय में सुहरावर्दी को ‘गुंडों का राजा’ और ‘बंगाल का कसाई’ जैसी उपमाओं से नवाजा गया था. क्योंकि सुहरावर्दी ने बंगाल की निर्दोष जनता को मरने के लिए छोड़ दिया था. हफ्ते भर तक कलकत्ता और आसपास के इलाकों में दंगे होते रहे. कई दिनों तक हावड़ा स्टेशन पर बंगाल से भागने वालों की भीड़ लगी रही. एक अनुमान के मुताबिक 10 हजार लोग मारे गए थे.

कई लोगों की लाशें हुगली में फेंक दी गई, ये भी कहीं-कहीं लिखा मिलता है. और आखिरकार 21 अगस्त को बंगाल में वाइसरॉय रूल लगा दिया गया. ब्रिटिश आर्मी की 5, इंडियन आर्मी की 4 बटालियन तैनात कर दी गईं. तब कहीं जाकर हिंसा थमी. लेकिन सांप्रदायिक आग जलती रही.

अक्टूबर 1946 में अब के बांग्लादेश में लगने वाले नोआखाली में दंगे भड़के. महात्मा गांधी खुद नोआखाली गए. दंगे खत्म करने के लिए अपील की. फिर नोआखाली के जवाब में इसी महीने बिहार में हिंसा हुई और दंगे भड़क गए. कोई हल न निकलता देख महात्मा गांधी ने दंगे शांत कराने के लिए उपवास रखा. लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. हिंसा की आग थमी, देश के विभाजन के बाद. जब बंटवारे के वक्त खासकर पंजाब प्रांत में लाखों की संख्या में लाशें गिराई गईं और उन्हें ट्रेनों में ठूंसकर भारत या पाकिस्तान की ओर रवाना कर दिया गया.

इस तरह भारत का बंटवारा जिस आधार पर हुआ, उसकी नींव रखी Great Calcutta Killings ने. इतिहास की गति अक्सर एक धीमी जलती लौ सरीखी होती है लेकिन कई बार एक छोटी चिनगारी ही पूरे शहर में आग लगाने के लिए काफी होती है. 

वीडियो: बिग बंग स्टोरीः जिन्ना की जिद ने कलकत्ते में गिराई हिंदुओं की लाशें?

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