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बंगाल चुनाव में तुष्टीकरण-ध्रुवीकरण अब भी फैक्टर, पर बीजेपी की भाषा क्यों बदल गई? 'क्रोनोलॉजी' समझिए

बंगाल चुनाव के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने चुनावी अभियान की शुरूआत कर दी है. उनकी चुनावी रैलियों में घुसपैठ और अल्पसंख्यक ध्रुवीकरण जैसे शब्द भी सुनने को मिले हैं. लेकिन इस बार उनका स्वर राज्य के पिछले चुनाव के मुकाबले संयमित रहा है. पिछले चुनाव के सबसे अहम मुद्दे CAA और NRC की अब तक राज्य के चुनावी सीन में एंट्री नहीं हुई है.

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बंगाल में बीजेपी ने ममता बनर्जी को मात देने के लिए अपनी रणनीति में बदलाव किया है. (इंडिया टुडे)

साल 2021. पश्चिम बंगाल का विधानसभा चुनाव. बीजेपी ने धुआंधार कैंपेन चलाया. नरेंद्र मोदी और अमित शाह की दर्जनों रैलियां हुई. चुनाव पूरी तरह केंद्रीय चेहरों के इर्द-गिर्द सिमटा था. ध्रुवीकरण और हिंदुत्व बीजेपी का कोर एजेंडा था. नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) का जिक्र तकरीबन हर रैली में आता था. इन्हीं मुद्दों पर जमकर ध्रुवीकरण हुआ. बीजेपी को फायदा भी हुआ. सीटों की संख्या भी बढ़ी लेकिन बंगाल में बीजेपी ममता बनर्जी का किला ढाह नहीं पाई.

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साल 2026 में एक बार फिर बंगाल में चुनाव है. सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की आंच फिर से तेज होने लगी है लेकिन इस बार ईंधन बदल गया हैं. CAA और NRC की जगह वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) ने ले ली है. साथ में जाने-पहचाने शब्द भी हैं, जिनकी उपस्थिति पिछले चुनाव में भी थी. मसलन घुसपैठ और अल्पसंख्यक तुष्टीकरण.  

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, बंगाल में मुस्लिम आबादी लगभग 27 फीसदी है. कई जिले ऐसे हैं, जहां अल्पसंख्यक वोट निर्णायक भूमिका में हैं. बंगाल में लेफ्ट, कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस मेन प्लेयर रहे हैं. पक्ष और विपक्ष में इनकी भूमिका बदलती रही है. तृणमूल तो कांग्रेस से ही निकली है. इन तीनों पार्टियों की अल्पसंख्यक वोटों पर दावेदारी रही है. इसलिए राज्य में चुनाव का आधार सांप्रदायिक विभाजन नहीं रहा लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव और 2021 के विधानसभा में डायनेमिक्स बदल गए. 

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लेफ्ट और कांग्रेस चुनावी मुकाबले से लगभग बाहर ही रहे. इनकी जगह बीजेपी ने ले ली. नतीजा 2021 के चुनाव में जमकर सांप्रदायिक विभाजन हुआ. राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो इस ध्रुवीकरण की तृणमूल की जीत में निर्णायक भूमिका रही. मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर दिनाजपुर, बीरभूम, साउथ 24 परगना, नादिया, हावड़ा, नॉर्थ 24 परगना और कूच बिहार. इन 9 जिलों में मुस्लिम आबादी 25 फीसदी से भी ज्यादा है. 

यहां विधानसभा की 150 सीटें हैं. इनमें 127 सीट TMC के खाते में गई. स्ट्राइक रेट रहा 80 प्रतिशत. बीजेपी यहां सिर्फ 30 सीटें जीत पाई. इनमें से आधी सीटें केवल दो जिलों कूचबिहार और नादिया में मिली थी. इसके उलट बाकी 14 जिले, जहां मुस्लिम आबादी 25 फीसदी से कम है, वहां TMC का स्ट्राइक रेट थोड़ा कम हो गया. हालांकि बढ़त यहां भी रही. इन जिलों में पार्टी को 134 में से 86 सीटें मिली. यानी 64 प्रतिशत सीट. 

वहीं बीजेपी के खाते में 47 सीटें आईं. इन जिलों में बर्धमान, पश्चिमी बर्धमान, कोलकाता, हुगली, पूर्वी मेदिनीपुर, जलपाईगुड़ी, अलीद्वारपुर, पश्चिमी मेदिनीपुर, झाड़ग्राम, बांकुरा, पुरुलिया, दार्जिलिंग, कालीम्पोंग और साउथ दिनाजपुर शामिल है.

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ममता बनर्जी की कल्याणकारी योजना, बंगाली अस्मिता और उम्मीदवारों के चयन में रणनीतिक चतुराई ने उनको 2021 में बंपर जीत दिलाई. राज्य की 294 में से 213 सीटें उनकी झोली में गईं. वोट शेयर भी रहा 48 प्रतिशत. ममता बनर्जी ने महिलाओं के लिए कन्याश्री और रूपाश्री जैसी योजनाएं चलाईं. टिकट में भी महिला उम्मीदवारों को प्राथमिकता दी. इसके चलते महिला वोटर्स की लामबंदी उनके पक्ष में हुई. 2016 की तुलना में 2021 में दीदी ने मुस्लिम उम्मीदवारों की संख्या भी घटा दी थी. 

साल 2016 में 54 की जगह 2021 में ये संख्या 45 हो गई. यह बीजेपी के अल्पसंख्यक तुष्टीकरण के आरोपों को पंक्चर करने की कवायद थी. वो भी तब जब मुस्लिम वोट उनके पीछे खड़ा नजर आ रहा था. लेफ्ट और कांग्रेस के कमजोर होने का फायदा भी TMC को मिला. दोनों में से किसी का भी खाता नहीं खुला. मुस्लिम वोट पूरी तरह से TMC के खाते में गया. साल 2026 के चुनाव में बीजेपी इससे सबक लेती दिख रही है. पार्टी अब भी सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के एजेंडे पर कायम है लेकिन उसका स्वर आक्रमक की जगह संयमित हो गया है.

साल 2021 चुनाव के पहले गृहमंत्री अमित शाह नागरिकता को खुलेआम धार्मिक पहचान से जोड़ रहे थे. उनकी रैली में बार-बार CAA-NRC का जिक्र होता था. शाह क्रोनोलॉजी समझा रहे थे. गैर मुस्लिमों शरणार्थियों को नागरिकता और घुसपैठियों को देश से बाहर फेंकने की बात की जा रही थीं. उन्होंने अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों को दीमक बता दिया. इस पर जमकर ध्रुवीकरण भी हुआ. ममता के सहयोगी और बीजेपी के बंगाल कमांडर सुवेंदु अधिकारी भी हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण की पिच पर जमकर खेल रहे थे.

साल 2026 में भी घुसपैठ अमित शाह के एजेंडे में है लेकिन अब उनकी शब्दावली बदल गई है. लफ्ज भड़काऊ नहीं हैं. उन्होंने अपनी रैली में तुष्टीकरण की राजनीति' के दिन लदने की बात की. वहीं बॉर्डर पर बाड़बंदी में सहयोग नहीं देने को लेकर ममता सरकार की आलोचना की. बीजेपी से जुड़े एक नेता ने बताया,

 तुष्टीकरण की राजनीति और घुसपैठ राज्य में जरूरी मुद्दे हैं. जमीन पर इसका असर भी होता है. पिछले चुनाव में ध्रुवीकरण हमारे लिए दोधारी तलवार साबित हुई. फायदा तो हुआ. लेकिन नुकसान भी पहुंचा.

राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो बीजेपी इस बार एक नैरेटिव के भरोसे नहीं रहना चाहती. इसलिए महिला, रोजगार, कानून व्यवस्था और स्थानीय भ्रष्टाचार के मुद्दों पर भी पार्टी का फोकस है. पिछली बार बीजेपी के अटैक ममता बनर्जी पर होते थे. इस बार TMC को निशाना बनाया जा रहा है. पार्टी बूथ लेवल पर संगठन को मजबूती देने और माइक्रो मैनेजमेंट पर जोर दे रही है. 
सीटवार डेटा और पिछले चुनाव के मार्जिन का विश्लेषण किया जा रहा है. जहां जीत-हार का अंतर कम था उन सीटों पर खास फोकस रहेगा. हर विधानसभा के लिए स्थानीय मुद्दों की एक लिस्ट तैयार की गई है. 2021 में पार्टी प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय काफी मुखर रहे थे. इस बार के प्रभारी सुनील बंसल नेपथ्य में रहकर ग्राउंड पर रणनीति को धार देने में जुटे हैं.

साल 2021 के मुकाबले बीजेपी की चुनावी रणनीति बदल जरूर गई है. लेकिन पार्टी हिंदुत्व के मुद्दे पर पीछे नहीं हटने वाली. नरेंद्र मोदी और अमित शाह की रैलियों में घुसपैठ और अल्पसंख्यक तुष्टीकरण जैसे शब्द लगातार सुनने को मिलेंगे. इस बार तो बंगाल में ओवैसी की भी एंट्री हो गई है. जैसे-जैसे चुनाव के दिन नजदीक आएंगे, प्रधानमंत्री मोदी और शाह के तेवर और कलेवर में भी बदलाव आएगा. आक्रमकता भी बढ़ने वाली है लेकिन इस बार मुद्दा सिर्फ सांप्रदायिक ध्रुवीकरण नहीं रहेगा.

वीडियो: राजधानी: क्या पश्चिम बंगाल में ओवैसी की एंट्री से ममता बनर्जी का मुस्लिम वोट बैंक घट जाएगा?

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