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अंबरनाथ में फिर उलटफेर, शिंदे से दगा करने वाली BJP को अजित पवार की NCP ने 440 वोल्ट का झटका दिया है

महाराष्ट्र नगर निकाय चुनाव में एक से एक दिलचस्प समीकरण देखने को मिल रहे हैं. यहां अंबरनाथ नगर परिषद में पहले कांग्रेस-भाजपा ने साथ मिलकर स्थानीय सत्ता कब्जाई. अब अजित पवार गुट के विद्रोह के कारण उन्हें कुर्सी छोड़नी पड़ेगी.

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महाराष्ट्र के निकाय चुनाव में एक से बढ़कर एक उलटफेर देखने को मिल रहे हैं (india today)

बाघ और बकरी एक घाट पर पानी पी सकते हैं, लेकिन कांग्रेस-भाजपा का गठबंधन नहीं हो सकता. अगर आप भी यही सोचते हैं तो यह सोच बदलने का वक्त आ गया है. महाराष्ट्र के नगर निकाय चुनाव में ये ‘चमत्कार’ भी हो गया. अंबरनाथ नगर परिषद के चुनाव में भाजपा-कांग्रेस ने साथ मिलकर स्थानीय सत्ता पर कब्जा कर लिया. इस गठजोड़ में भाजपा की दोस्त एकनाथ शिंदे वाली शिवसेना पीछे रह गई और सत्ता से बाहर ही हो गई. माने, स्थानीय कुर्सी (मेयर) पाने के लिए दोस्त ‘दुश्मन’ बन गए और ‘दुश्मन’ दोस्त हो गए. लेकिन इस कहानी में अब एक और रोचक मोड़ आ गया है. शुक्रवार, 9 जनवरी को अजित पवार की पार्टी के लोगों का ‘स्वाभिमान’ जागने के बाद भाजपा के हाथ आई कुर्सी छोड़ने की नौबत आ गई है.

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क्या है पूरा मामला? 

कहावत है- ‘सियासत में कोई दोस्त-दुश्मन नहीं होता.’ महाराष्ट्र के नगर निकाय चुनावों में ये कहावत बहुत ज्यादा चरितार्थ होते दिखी. पहले एक दूसरे की कट्टर विरोधी मानी जाने वाली भाजपा और ओवैसी की ‘अखिल भारतीय मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन’ का गठबंधन देखने को मिला. अब कांग्रेस और भाजपा के एक साथ आने की खबर अंबरनाथ नगर परिषद से आई. समझने में दिमाग की नसें उलझ न जाएं इसलिए पहले ये क्लियर कर दिया जाएः

– महाराष्ट्र की मौजूदा सरकार में तीन बड़े दल एक साथ हैं. 'सबसे बड़ा भाई' भाजपा. दूसरी एकनाथ शिंदे की शिवसेना. तीसरी अजित पवार की एनसीपी.

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– विपक्ष में मुख्यतः तीन दल एक साथ हैं. सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस. दूसरी उद्धव ठाकरे की शिवसेना. तीसरी शरद पवार की एनसीपी.

लेकिन नगर निकाय चुनाव में सब उलट-पुलट हो गया. अंबरनाथ नगर परिषद के चुनाव नतीजे आने के बाद शिंदे सेना सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी. उसे 27 सीटें मिलीं. भाजपा को 14 और कांग्रेस को 12 सीटें आईं. अजित पवार गुट के एनसीपी को 4 सीटें मिलीं और एक निर्दलीय उम्मीदवार भी जीत गया. अपना मेयर बनाने के लिए किसी भी दल को 30 सीटें चाहिए थीं. इसे पाने के लिए भाजपा ने अपने कट्टर राजनीतिक विरोधी कांग्रेस और अजित पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी के साथ मिलकर ‘अंबरनाथ विकास आघाड़ी’ के नाम से गठबंधन बना लिया. एक निर्दलीय के समर्थन के साथ ही इस अघाड़ी को जीत मिल गई. भाजपा की तेजश्री करणजुले पाटिल मेयर चुन ली गईं.

इधर कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को ये गठबंधन पसंद नहीं आया. उसने अंबरनाथ के अपने सभी 12 पार्षदों को पार्टी से निकाल दिया. पार्टी ने कहा कि कांग्रेस की लोकल यूनिट ने बिना पूछे ये अघाड़ी बनाई थी. हालांकि, भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रवि चव्हाण ने इन सभी निष्कासित कांग्रेसी पार्षदों को अपनी पार्टी में शामिल करा लिया. लेकिन सीएम देवेंद्र फडणवीस को ये बात नागवार गुजरी. उन्होंने इसे लेकर कहा कि ऐसे गठबंधनों को पार्टी नेतृत्व की मंजूरी नहीं है और ये अनुशासन के खिलाफ हैं. शिवसेना ने तो इसे गठबंधन धर्म के साथ धोखा बता दिया.

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पिक्चर अभी बाकी...

कहानी यहीं खत्म नहीं होती है. अंबरनाथ नगर परिषद में 9 जनवरी को एक और उलटफेर हो गया. अजित पवार गुट वाली एनसीपी ने ‘अंबरनाथ विकास अघाड़ी’ बनाने वाली भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रवि चव्हाण को बड़ा झटका दे दिया. एनसीपी के चार नगरसेवकों ने भाजपा वाले इस गठबंधन से सपोर्ट वापस ले लिया. एनसीपी नगरसेवकों का कहना है कि उन्हें कांग्रेस के साथ सत्ता साझा करने में ठीक नहीं लग रहा था क्योंकि 2023 से वो लगातार कांग्रेस का विरोध करते आ रहे हैं. एनसीपी नेताओं का कहना है कि चुनाव के बाद जनता का जनादेश महायुति को सत्ता में लाने के पक्ष में था न कि कांग्रेस के साथ गठबंधन के लिए.

एनसीपी काउंसलरों के इस कदम ने ‘अपने दोस्त’ भाजपा की चाल से मात खाई शिवसेना में नई जान फूंक दी है. अब अंबरनाथ विकास अघाड़ी अल्पमत में है और 4 एनसीपी नगरसेवकों के साथ शिवसेना बहुमत का दावा कर रही है. 

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