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'न्यायपालिका में भ्रष्टाचार' वाले लेखक 'अयोग्य' घोषित, अगली पीढ़ी के लिए कुछ नहीं लिख पाएंगे

NCERT की किताब में 'न्यायपालिका में भ्रष्टाचार' नाम का चैप्टर लिखने वाले तीन लेखकों पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी कार्रवाई की है. उन्हें किसी भी तरह का सरकारी काम न सौंपने का आदेश जारी किया है.

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सुप्रीम कोर्ट ने एनसीईआरटी विवाद पर कड़ा आदेश जारी किया है. (तस्वीरः India Today)

NCERT की 8वीं क्लास की किताब में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ जैसा चैप्टर लिखने वाले 3 लेखकों पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी कार्रवाई करने का आदेश दिया है. कोर्ट ने कहा कि ये तीनों लेखक अगली पीढ़ी के लिए किसी भी तरह का सिलेबस लिखने के लिए एकदम ‘अयोग्य’ हैं. सरकार को चाहिए कि तीनों को कोई भी सरकारी काम न दे और न ही उन्हें किसी सिलेबस को तैयार करने के काम में कभी लगाया जाए. सुप्रीम कोर्ट ने ये भी स्पष्ट किया कि लेखक अपना जवाब दाखिल करने के बाद इस आदेश में संशोधन के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर सकते हैं.

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क्या है मामला?

ये मामला फरवरी 2026 का है. मीडिया रिपोर्ट्स में सामने आया कि NCERT की सामाजिक विज्ञान की 8वीं क्लास की किताब में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ को प्रमुख चुनौतियों के रूप में बताया गया है. इस पर वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने सुप्रीम कोर्ट के सामने चिंता जताई कि ये कॉन्टेंट पूरी न्यायपालिका को बदनाम करने जैसी है. सुप्रीम कोर्ट ने इसे स्वतः संज्ञान लिया और कहा कि किसी को भी न्यायपालिका की अखंडता को नुकसान पहुंचाने की इजाजत नहीं दी जाएगी. 

कोर्ट के मामले को संज्ञान में लेने के बाद NCERT ने विवादित किताब को वापस ले लिया और बिना शर्त माफी मांगी. उसने हलफनामा दाखिल करके कोर्ट से कहा कि विवादित चैप्टर वाली सारी किताबें वापस मंगा ली गई हैं. साथ ही उन्हें संशोधित रूप में दोबारा लिख लिया गया है. इसे अगले शैक्षणिक सत्र 2026-27 में कोर्स में शामिल करने की योजना है. 

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सुप्रीम कोर्ट ने जताई आपत्ति

सुप्रीम कोर्ट ने NCERT के इस कदम पर भी आपत्ति जताई. कोर्ट ने कहा कि NCERT के हलफनामे में ये नहीं बताया गया है कि वो कौन से एक्सपर्ट हैं, जिन्होंने इस चैप्टर को दोबारा लिखा. किताब के नए वर्जन को मंजूरी किसने दी और इसे सिलेबस में शामिल करने के लिए कौन सी प्रक्रिया अपनाई गई. शीर्ष अदालत ने कहा कि ये चिंताजनक है और इस अकादमिक सुधार की प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट ने NCERT को निर्देश दिया कि संशोधित अध्याय को फिर से सही एक्सपर्ट्स की निगरानी में तैयार किया जाए. इस चैप्टर को फिर से लिखने के लिए एक्सपर्ट्स का एक पैनल बनाने की जरूरत है, जिसमें एक रिटायर्ड जज, एक प्रैक्टिसिंग वकील और एक वरिष्ठ शिक्षाविद शामिल हों. कोर्ट ने इस समिति को सटीक और सही जानकारी लिखने के लिए भोपाल के राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी से भी सहायता लेने की सलाह दी. 

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संशोधित अध्याय को NCERT की किताब में तब तक शामिल नहीं किया जाना चाहिए, जब तक कि कानून से जुड़े विशेषज्ञों की समिति से इसकी समीक्षा न हो जाए और इस प्रस्ताव को पारित न कर दे.

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तीन लेखकों के खिलाफ कड़े आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने उन तीन लेखकों को लेकर भी कड़े आदेश जारी किए, जिन्होंने विवादित अध्याय को लिखा था. NCERT निदेशक प्रोफेसर दिनेश प्रसाद सकलानी के हलफनामे से यह सामने आया कि विवादित अध्याय प्रोफेसर मिशेल डैनिनो की निगरानी में तैयार किया गया था. उनके साथ इसमें सुपर्णा दीवाकर तथा आलोक प्रसन्न कुमार भी शामिल थे. 

चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की खंडपीठ ने 11 मार्च को अपने आदेश में कहा, “इन व्यक्तियों को भारतीय न्यायपालिका के बारे में पर्याप्त ज्ञान नहीं है या उन्होंने जानबूझकर फैक्ट्स को गलत तरीके से पेश किया, जिससे 8वीं क्लास के छात्रों के सामने न्यायपालिका की नकारात्मक छवि बनी. ऐसे में केंद्र सरकार के अलावा सभी राज्य सरकारों और सार्वजनिक रूप से वित्तपोषित संस्थानों को इन तीनों व्यक्तियों से संबंध तोड़ लेना चाहिए. उन्हें किसी भी ऐसी सेवा के लिए नियुक्त नहीं किया जाना चाहिए, जिसमें सरकारी पैसे से पेमेंट किया जाता हो. इतना ही नहीं, उन्हें आने वाले समय में सिलेबस बनाने के काम में भी शामिल नहीं किया जाना चाहिए.”

कोर्ट ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर इन तीनों लोगों में से किसी को कभी किसी विश्वविद्यालय का कुलपति बना दिया जाए तो क्या होगा? हजारों छात्र इससे प्रभावित होंगे. जिन लोगों के पास भारतीय न्यापालिका का ठीक से ज्ञान नहीं है या जो फैक्ट्स को गलत तरीके से पेश करते हैं, ऐसे लोगों को अगली पीढ़ी के लिए सिलेबस तैयार करने का काम बिल्कुल नहीं देना चाहिए.

हालांकि, पीठ ने साफ किया कि आरोपी व्यक्ति अपना जवाब दाखिल करने के बाद आदेश में संशोधन की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं.

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