इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले दिनों एक वकील के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू करने का आदेश दिया है. वकील आशुतोष मिश्रा ने एक केस की सुनवाई के दौरान जस्टिस संतोष राय पर आरोप लगाया था कि वह सरकारी दबाव में काम करते हुए दिख रहे हैं. बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस संतोष राय ने एडवोकेट आशुतोष कुमार मिश्रा के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही चलाने का आदेश दिया है. आशुतोष ने 12 फरवरी को एक आरोपी को जमानत दिलाने के लिए जिरह करते वक्त विवादित टिप्पणी की थी. उन्होंने जज के सामने कहा,
वकील ने HC के जज से कहा, 'सरकारी दबाव में काम कर रहे', अब बुरा फंस गए
Allahabad High Court ने कहा कि वकील आशुतोष मिश्रा का लहजा, बॉडी लैंग्वेज और शब्दों का चयन बेहद आपत्तिजनक, निंदनीय और अपमानजनक था. इससे कोर्ट के सामने मौजूद लोगों की नजर में कोर्ट की अथॉरिटी और गरिमा कम हुई.
.webp?width=360)

आप इस मामले में काउंटर एफिडेविट क्यों मांग रहे हैं? आपमें संबंधित जांच अधिकारी से स्पष्टीकरण मांगने का साहस नहीं है, जिसने आज तक पीड़ित का बयान दर्ज नहीं किया है. आपको जांच अधिकारी के खिलाफ आदेश पारित करने का अधिकार नहीं है. ऐसा लग रहा है कि आप सरकार के दबाव में काम कर रहे हैं.
जस्टिस राय ने अपने आदेश में कहा,
आशुतोष मिश्रा का लहजा और शब्दों का चयन बेहद आपत्तिजनक, निंदनीय और अपमानजनक था. इससे कोर्ट के सामने मौजूद लोगों की नजर में कोर्ट की अथॉरिटी और गरिमा कम हुई. मिश्रा ने कोर्ट के अधिकार को चुनौती देते हुए अपमानजनक टिप्पणियां की और कार्यवाही में बाधा डाली, जिसके चलते कार्यवाही लगभग 10 मिनट तक रुकी रही.
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आगे कहा,
आशुतोष मिश्रा का व्यवहार साफतौर पर कोर्ट की कार्यवाही में हस्तक्षेप करने और बाधा डालने के इरादे को दिखाता है. ऐसा व्यवहार प्रथम दृष्टया कोर्ट की अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 2(C) अंतर्गत आता है, क्योंकि यह कोर्ट को बदनाम करने और न्याय देने की प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने के बराबर है, इसलिए इस मामले में मिश्रा के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू करने पर विचार करने की जरूरत है.
इसके बाद कोर्ट ने आदेश दिया कि आशुतोष मिश्रा के खिलाफ न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 के प्रावधानों और हाईकोर्ट के संबंधित नियमों के तहत अवमानना की कार्यवाही शुरू करने के लिए एक अलग रेफरेंस दिया जाए. इससे पहले अपने क्लाइंट के जमानत याचिका पर जिरह करते हुए मिश्रा ने तर्क दिया था कि उनके क्लाइंट को गलत तरीके से फंसाया जा रहा है. उन्होंने बताया कि जांच अधिकारी घायल पीड़ित का बयान रिकॉर्ड नहीं कर पाए, जिसके सीने पर बंदूक से चोट लगी थी.
एक सरकारी वकील ने इस बात को स्वीकार किया कि 19 जनवरी को मामला दर्ज किया गया था लेकिन अभी तक पीड़ित का बयान रिकॉर्ड नहीं किया गया है. इसके बाद कोर्ट ने राज्य सरकार को तीन हफ्ते के भीतर मेडिकल रिपोर्ट और घायल व्यक्ति और डॉक्टर के बयान के साथ एक काउंटर एफिडेविट फाइल करने का निर्देश दिया. इस मामले को 10 मार्च को लिस्ट करने का आदेश दिया गया था लेकिन आशुतोष मिश्रा की टिप्पणियों से आहत होकर जस्टिस राय ने खुद को इस मामले से अलग कर लिया.
उन्होंने अपने आदेश में कहा कि माननीय चीफ जस्टिस से उचित आदेश मिलने के बाद इस मामले की जल्द किसी दूसरे पीठ के सामने पेश किया जाएगा.
वीडियो: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ED को किस बात पर नसीहत दे दी?
















.webp?width=120)


