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जनगणना के बाद 2027 में क्राइम घट जाएगा; लेकिन ऐसा होता कैसे है?

NCRB हर साल हुए अपराधों की संख्या को अपडेट करता है. लेकिन शहरों के लिए, क्राइम रेट की गिनती करते समय वह पिछली जनगणना की आबादी को आधार के तौर पर इस्तेमाल करता है. पॉपुलेशन का यह आंकड़ा अगली जनगणना होने तक वैसे का वैसा बना रहता है.

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क्राइम का डेटा निकालते समय आखिरी जमगणना को ध्यान में रखा जाता है (PHOTO-AajTak)

NCRB यानी नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो हर साल देश में हो रहे अपराधों का डेटा जारी करता है. तो अगले साल यानी 2027 में देश के अलग-अलग शहरों के क्राइम रेट में गिरावट देखने को मिल सकती है. वजह, 2027 में जनगणना होनी है. ऐतिहासिक तौर पर ये देखा गया है कि जब भी जनगणना होती है, तब बड़े शहरों के क्राइम रेट में गिरावट देखने को मिलती है. लेकिन ऐसा नहीं है कि पुलिस जनगणना के समय इतनी मुस्तैद हो जाती है कि अपराध कम हो जाते हैं. इसके पीछे विशुद्ध गणित है. इस गणित वाले हिसाब को NCRB अपने डेटा में जारी भी करता है. लेकिन उसके ऊपर छपने वाली अधिकतर रिपोर्ट्स में ये गायब होता है. लिहाजा लोगों को लगता है कि क्राइम कम हो गया.

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जनगणना, क्राइम और गणित का खेल

NCRB हर साल हुए अपराधों की संख्या को अपडेट करता है. लेकिन शहरों के लिए, क्राइम रेट की गिनती करते समय वह पिछली जनगणना की आबादी को आधार के तौर पर इस्तेमाल करता है. पॉपुलेशन का यह आंकड़ा अगली जनगणना होने तक वैसे का वैसा बना रहता है. इसलिए, भले ही हर साल दर्ज होने वाले अपराधों की संख्या घटती-बढ़ती रहे, लेकिन क्राइम रेट की गिनती के लिए इस्तेमाल की जाने वाली आबादी का नंबस सेम रहता है. आमतौर पर एक दशक तक ये नंबर सेम होता है. और इस बार तो 15 साल से भी अधिक समय तक आबादी वाला डेटा सेम रहा. यही कारण है कि दिल्ली में क्राइम रेट बढ़ गया है या दिल्ली का क्राइम रेट मुंबई से ज्यादा है जैसी तुलनाएं भ्रामक हो सकती हैं. जब तक कि जनसंख्या के आधार को ठीक से न समझ लिया जाए तब तक ये आंकड़े भ्रामक हो सकते हैं.

टाइम्स ऑफ इंडिया ने इस मामले पर एक विस्तृत रिपोर्ट छापी है. रिपोर्ट में दिल्ली का उदाहरण देकर आबादी वाले पॉइंट को समझाने की कोशिश की गई है. जैसे 2011 की जनगणना में दिल्ली की आबादी 1.6 करोड़ थी. यही नंबर क्राइम रेट निकालने के लिए भी इस्तेमाल किया जा रहा है. लेकिन दिल्ली की अनुमानित आबादी 2.2 करोड़ है. चूंकि दिल्ली ही लगभग पूरे नेशनल कैपिटल टेरिटरी (NCT) को कवर करती है, इसलिए यह साफ है कि अगर NCT की आबादी 2.2 करोड़ है, तो शहर में अभी भी सिर्फ 1.6 करोड़ लोग ही नहीं, उससे कहीं अधिक लोग होंगे.

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आंकड़ों में बड़ा बदलाव 

आबादी के इस अंतर से क्राइम रेट में भारी बदलाव आता है. दिल्ली और दिल्ली शहर में आईपीसी के तहत दर्ज अपराधों की संख्या समान है. लेकिन एनसीआरबी अलग-अलग आबादी के आधारों का इस्तेमाल करता है, इसलिए दिल्ली का क्राइम रेट 1,259 प्रति लाख दिखाया गया है. जबकि दिल्ली शहर का रेट 1,688 प्रति लाख है जो 34% अधिक है. जनसंख्या आधार को अपडेट करने पर क्या होता है, इसका एक उदाहरण पहले से मौजूद है. 2001 की जनगणना में, भारत में 35 ऐसे शहर थे जिनकी जनसंख्या दस लाख से अधिक थी.

2011 में जब शहरों की जनसंख्या को अपडेट किया गया, तो उनमें से 27 शहरों में क्राइम रेट में गिरावट देखने को मिली. कोच्चि में यह रेट 1,898 प्रति लाख से घटकर 1,636 हो गया. विशाखापत्तनम, बेंगलुरु, इंदौर, अहमदाबाद और भोपाल में भी 150 से अधिक अंकों की गिरावट देखी गई. 

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