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धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद सोनम वांगचुक का नाम क्यों नहीं लिया? अभिजीत दिपके ने अब ये कहा

धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद अपने पहले भाषण में सोनम वांगचुक का नाम नहीं लेने पर उठे सवालों पर अभिजीत दिपके ने पहली बार सफाई दी है. उन्होंने कहा कि वांगचुक के 26 दिन के अनशन ने ही पूरे आंदोलन को निर्णायक मोड़ दिया और उनके बलिदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता.

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अभिजीत दिपके ने सोनम वांगचुक से मतभेद पर चुप्पी तोड़ी. (फोटो- India Today)

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  • कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके ने बताया कि शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने 25 जुलाई को इस्तीफा दे दिया, जो एक महीने के विरोध प्रदर्शन के बाद हुआ।
  • मेडिकल परीक्षा का पेपर लीक होने के विरोध में सीजेपी ने एक महीने तक प्रदर्शन किया, जिसमें सोनम वांगचुक ने 26 दिन भूख हड़ताल की और आंदोलन को समर्थन दिया।
  • धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद 25 जुलाई को यह आंदोलन समाप्त हो गया, और अभिजीत दिपके ने आंदोलन के बीच सोनम वांगचुक से मिलने की अनुमति न मिलने की बात भी कही।

वो 25 जुलाई की दोपहर थी. जंतर-मंतर पर एक महीने से प्रदर्शन कर रहे कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके को खबर मिली कि शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया है. एक महीने पहले ही सोशल मीडिया पर व्यंग्य के तौर पर शुरू हुई उनकी पार्टी की ये पहली और सबसे बड़ी जीत थी. इस जीत के बाद सबकी नजर थी कि अभिजीत दिपके क्या बोलें. उन्होंने मंच पर माइक थामा और सबसे पहले कहा, ‘हमने कर दिखाया. झुकती है दुनिया झुकाने वाला चाहिए.’

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इस जीत के लिए उन्होंने छात्रों को ‘धन्यवाद’ दिया. नीट पेपर लीक के बाद आत्महत्या करने वाले छात्रों को श्रद्धांजलि दी, लेकिन उनके इस छोटे से भाषण में एक बहुत जरूरी नाम मिसिंग था. इस पर बाद में खूब बातें भी बनीं. सोनम वांगचुक ने सीजेपी के आंदोलन को सपोर्ट करते हुए 26 दिन तक अनशन किया था. लेकिन जीत के बाद अपने पहले भाषण में अभिजीत दिपके ने उनका नाम तक नहीं लिया. क्यों नहीं लिया, इस पर अब दिपके ने पहली बार चुप्पी तोड़ी है. 

सोनम वांगचुक पर क्या बोले अभिजीत दिपके?

इंडिया टुडे से बातचीत में दिपके ने कहा कि उनके और सोनम वांगचुक के बीत कोई मतभेद नहीं है. आंदोलन के लिए उनके बलिदान को कभी भूला नहीं जा सकता. दिपके ने कहा,

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हम सोनम वांगचुक सर के बलिदान को नहीं भूल सकते. उन्होंने अपनी जान जोखिम में डाली. 26 दिनों तक वो भूख हड़ताल पर रहे. अपनी जान खतरे में डालकर उन्होंने देश को जगाया. लोगों को सड़कों पर उतरकर सवाल करने के लिए मोटिवेट किया. अगर वो भूख हड़ताल नहीं करते तो धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा नहीं होता.

दिपके ने ये भी कहा कि वह निजी तौर पर चाहते थे कि सोनम वांगचुक अपनी हड़ताल खत्म करें. उन्हें विरोध प्रदर्शन जारी रखने का आश्वासन भी दिया गया. जिस दिन वांगचुक ने अपना अनशन तोड़ा, उस दिन उन्होंने (दिपके ने) काफी राहत महसूस की.

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केंद्रीय मंत्रियों जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह की मौजूदगी में वांगचुक के अनशन तोड़ने के सवाल पर दिपके ने कहा कि उन्हें मंत्रियों के हाथ से भूख हड़ताल खत्म करने पर निराशा नहीं हुई. वो इस बात से निराश हुए थे कि नड्डा और जितेंद्र सिंह को तो वांगचुक से मिलने दिया गया, लेकिन वो उनसे नहीं मिल पा रहे थे. दिपके ने कहा,  

मैं उनसे मिलना चाहता था. मुझे उनसे मिलने नहीं दिया गया. विपक्षी सांसद भी उनसे मिलने की कोशिश कर रहे थे. उन्हें भी उनसे मिलने नहीं दिया गया. लेकिन जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह को उनसे मिलने की अनुमति कैसे मिल गई?

दिपके ने आरोप लगाया कि एक तरह से सोनम वांगचुक को सरकार ने ‘अगवा’ कर लिया था. न तो उनसे सीजेपी के लोग मिल पा रहे थे. न ही विपक्ष के किसी नेता को वांगचुक से मिलने दिया जा रहा था. 

मेडिकल परीक्षा का पेपर लीक होने के बाद धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर सीजेपी ने एक महीने तक विरोध प्रदर्शन किया था. सोनम वांगचुक ने आंदोलन को समर्थन देते हुए 26 दिनों की भूख हड़ताल की थी. उन्हें दिल्ली पुलिस ने जबरन जंतर-मंतर से सफदरजंग अस्पताल शिफ्ट कर दिया था, जहां बाद में उन्होंने जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह के आश्वासन पर अनशन तोड़ा. 25 जुलाई को धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद ये आंदोलन खत्म हो गया.   

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