गाज़ियाबाद की भारत सिटी सोसायटी. यहां 3-4 फरवरी की दरमियानी रात तीन नाबालिग बहनों ने अपनी जान दे दी. मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि तीनों बहनें कोरियन कल्चर, कोरियन ड्रामा की दीवानी थीं. वो स्कूल नहीं जाती थीं और दिनभर फोन चलाती थीं. फोन की ऐसी लत देख घरवालों ने उन्हें डांटा. पिता ने मोबाइल छीन लिया. इसके बाद से तीनों बहनें परेशान रहने लगीं. वो तनाव में आ गईं और उन्होंने अपनी जान दे दी.
क्या बच्चों के हाथ में मोबाइल देने की कोई उम्र है?
गाज़ियाबाद की भारत सिटी सोसायटी में तीन बहनों की मौत ने एक नई बहस शुरू कर दी है. अगर उन्हें कम उम्र में ही फोन दे दिया जाए, तो क्या-क्या दिक्कतें हो सकती हैं? और बच्चों को फोन देने की सही उम्र क्या है?


वैसे अब इस मामले में रोज़ नए खुलासे हो रहे हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक, परिवार आर्थिक तंगी से गुज़र रहा था. उनके पिता पर करीब 2 करोड़ का कर्ज़ था. बच्चियां तीन साल से स्कूल नहीं जा रही थीं. उनके पिता ने दो शादियां की थीं. ये दोनों शादियां सगी बहनों से हुई थीं. और अब वो कथित रूप से उसी घर में तीसरी महिला के साथ रह रहे थे. ये तीसरी महिला, उनकी दोनों पत्नियों की सगी बहन है.
CCTV फुटेज में माता-पिता के हावभाव भी सामान्य नहीं हैं. इस मामले में जो भी नए खुलासे हो रहे हैं. वो आप तक लल्लनटॉप पहुंचा रहा है. हालांकि, ये कोई पहला मामला नहीं है जब पैरेंट्स ने मोबाइल छीना हो और बच्चों ने गलत कदम उठाया हो. हम पहले भी ऐसी ख़बरें देख-सुन चुके हैं. जहां घरवालों के फोन छीनने से आहत बच्चों ने अपनी जान दे दी.
कोविड-19 के बाद से बच्चों में मोबाइल फोन का इस्तेमाल बहुत ज़्यादा बढ़ गया है. वो पहले से कहीं ज़्यादा समय डिज़िटल डिवाइसेज़ पर बिता रहे हैं. इससे उनमें कई तरह की समस्याएं भी देखी गई हैं. पर बच्चों को फोन देने, उन्हें मोबाइल की स्क्रीन दिखाने की सही उम्र क्या है? अगर कम उम्र में ही उन्हें फोन दे दिया जाए, तो क्या-क्या दिक्कतें हो सकती हैं? फोन की लत देख कब पैरेंट्स को सतर्क हो जाना चाहिए? ये हमने पूछा सी.के. बिड़ला हॉस्पिटल, दिल्ली में नियोनैटोलॉजी एंड पीडियाट्रिक्स डिपार्टमेंट की डायरेक्टर, डॉक्टर पूनम सिदाना से.

डॉक्टर पूनम कहती हैं कि 2 साल से छोटे बच्चों को फोन की स्क्रीन दिखानी भी नहीं चाहिए. ये उम्र बच्चे के दिमागी विकास के लिए बहुत अहम होती है. इस दौरान बच्चे खेलकर, बातचीत करके, छूकर और लोगों के साथ समय बिताकर सीखते हैं. ये अनुभव फोन की स्क्रीन कभी नहीं दे सकती. इसलिए शुरुआती उम्र में स्क्रीन से दूरी बहुत ज़रूरी है.
2 साल के बाद आप आधे घंटे के लिए बच्चे को दे सकते हैं. लेकिन ये ध्यान रखें कि बच्चा फोन पर क्या देख रहा है. वैसे तो कोशिश करें कि बच्चे को फोन न दें. अगर उसे कुछ दिखाना है, तो टीवी पर दिखाएं. साथ में कोई बड़ा बैठे, जो बच्चे से बात करता रहे. ताकि बच्चा सिर्फ स्क्रीन में न खो जाए.
अगर कम उम्र में ही बच्चे को फोन मिल जाए तो उसके शारीरिक और मानसिक विकास पर असर पड़ता है. फिर बच्चा किसी काम में ध्यान नहीं लगा पाता. उसकी नींद की क्वालिटी खराब हो जाती है. उसकी भाषा और आंखों की सेहत पर भी बुरा असर पड़ता है. फिज़िकल एक्टिविटी न करने की वजह से उसमें मोटापा हो सकता है. इसके अलावा, बच्चों को दूसरों से घुलने-मिलने और अपनी भावनाएं समझने में दिक्कत हो सकती है. क्योंकि, बच्चे स्क्रीन के बजाय असल ज़िंदगी से ज़्यादा सीखते हैं.

वैसे World Health Organization यानी WHO ने 2019 में बच्चों के स्क्रीन टाइम से जुड़ी कुछ रिकमेंडेशंस जारी की थीं. इनके मुताबिक, एक साल या उससे कम उम्र के बच्चे का स्क्रीन टाइम बिल्कुल भी नहीं होना चाहिए. यानी नो फोन. नो गैजेट्स. 2 साल के बच्चे को ज़्यादा से ज़्यादा एक घंटे के लिए फोन देना चाहिए. वैसे जितना कम समय के लिए देना पड़े, उतना बेहतर. 3 से 4 साल के बच्चे का भी स्क्रीन टाइम एक घंटे से ज़्यादा नहीं होना चाहिए.
अगर बच्चा 5 साल से ज़्यादा का है तब भी उसे बहुत ज़्यादा देर के लिए फोन नहीं देना चाहिए. अगर दे रहे हैं, तो ये ज़रूर देखें कि बच्चा फोन पर क्या देख रहा है. कितनी देर के लिए देख रहा है. कहीं वो फोन पर निर्भर तो नहीं हो रहा.

पर ये पता कैसे चलेगा कि बच्चा स्क्रीन पर ज़रूरत से ज़्यादा निर्भर हो रहा है?
डॉक्टर पूनम कहती हैं कि अगर फोन न मिलने पर बच्चा चिड़चिड़ाने लगे. वो ठीक से सो न पाए. बाहर खेलने न जाए. हर थोड़ी देर बाद आकर फोन मांगे. तो समझ जाइए कि उसे फोन की आदत हो गई है.
अगर हर बार फोन देने से मना करने पर बच्चा खीझने लगे. गुस्साए. उसकी पढ़ाई पर असर पड़े. वो लोगों से मिलना जुलना बंद कर दे. या अपनी भावनाएं न संभाल पाए. तो किसी एक्सपर्ट से ज़रूर मिलें. ताकि उसकी फोन की लत छुड़ाई जा सके.
एक बात और. अगर पैरेंट्स बच्चे को फोन नहीं दे रहे हैं. तो वो भी फोन न चलाएं. क्योंकि, बच्चे माहौल से ही सीखते हैं.
(यहां बताई गई बातें, इलाज के तरीके और खुराक की जो सलाह दी जाती है, वो विशेषज्ञों के अनुभव पर आधारित है. किसी भी सलाह को अमल में लाने से पहले अपने डॉक्टर से ज़रूर पूछें. दी लल्लनटॉप आपको अपने आप दवाइयां लेने की सलाह नहीं देता.)
वीडियो: सेहत: अगर कोई मीठा नहीं खाता, तो क्या उसे डायबिटीज़ नहीं होगी?














.webp?width=275)

.webp?width=120)
.webp?width=120)





