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गलघोंटू बीमारी से नासिक में भाइयों की मौत, जानें ये होती क्या है

गलघोंटू यानी डिप्थीरिया एक गंभीर बैक्टीरियल इंफेक्शन है. ये कोरीनेबैक्टीरियम डिप्थीरिया नाम के बैक्टीरिया से होता है.

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गलघोंटू बीमारी को मेडिकल भाषा में डिप्थीरिया कहते हैं

महाराष्ट्र का नासिक ज़िला. यहां के मालेगांव में गलघोंटू बीमारी के 3 संदिग्ध मामले सामने आए हैं. इनमें दो सगे भाइयों की मौत हो गई हैं. वहीं एक बच्ची का इलाज अभी चल रहा है. फिलहाल उसकी कंडीशन स्थिर बताई जा रही है.

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वैसे भारत में तो अभी सिर्फ इसके तीन ही मामले आए हैं. लेकिन ऑस्ट्रेलिया में गलघोंटू बीमारी के केसेज़ तेज़ी से बढ़े हैं. जनवरी से लेकर अब तक ऑस्ट्रेलिया में इसके 200 से ज़्यादा मामले मिल चुके हैं. वहां का स्वास्थ्य विभाग फिलहाल अलर्ट पर है. गलघोंटू बीमारी को मेडिकल भाषा में डिप्थीरिया कहते हैं. ये क्या है, कैसे होता है, इसके बारे में हमने सबकुछ जाना यथार्थ सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, फरीदाबाद में पल्मोनोलॉजी एंड स्लीप मेडिसिन के डायरेक्टर, डॉ. विजय कुमार अग्रवाल से.

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डॉ. विजय कुमार अग्रवाल, डायरेक्टर, पल्मोनोलॉजी एंड स्लीप मेडिसिन, यथार्थ सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, फरीदाबाद

डिप्थीरिया क्या है?

डॉक्टर विजय कहते हैं कि डिप्थीरिया एक गंभीर बैक्टीरियल इंफेक्शन है. ये कोरीनेबैक्टीरियम डिप्थीरिया नाम के बैक्टीरिया से होता है. जब डिप्थीरिया से संक्रमित कोई व्यक्ति खांसता या छींकता है. तो उसके मुंह और नाक से निकलने वाली छोटी-छोटी बूंदों के ज़रिए बैक्टीरिया हवा में फैल जाता है. अगर कोई दूसरा व्यक्ति इन्हें सांस के साथ अंदर ले ले, तो उसे भी इंफेक्शन हो सकता है. संक्रमित व्यक्ति द्वारा इस्तेमाल की गई चीज़ों को छूने से भी ये इंफेक्शन हो सकता है.

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किन्हें ज़्यादा खतरा?

जिन लोगों की इम्यूनिटी कमज़ोर है. या जिन्होंने डिप्थीरिया की वैक्सीन नहीं लगवाई. उनमें इसका ख़तरा ज्यादा होता है. वैसे तो डिप्थीरिया किसी को भी हो सकता है, पर बच्चों में इसके मामले ज़्यादा आते हैं.

डिप्थीरिया में क्या होता है?

डिप्थीरिया में नाक और गले की म्यूकस मेम्ब्रेन प्रभावित होती है. म्यूकस मेम्ब्रेन एक तरह की झिल्ली है, जो शरीर के अंदरूनी अंगों की रक्षा करती है. उन्हें नम और चिकना बनाए रखती है. साथ ही, इंफेक्शन करने वाले बैक्टीरिया और वायरस को शरीर में आने करने से रोकती है. पर डिप्थीरिया होने पर गले में सफेद या ग्रे रंग की एक मोटी परत जम जाती है. जो डेड सेल्स, बैक्टीरिया और उसके बनाए हुए टॉक्सिन से बनती है. जब ये परत गले की अंदरूनी सतह पर चिपकती है. तो सांस लने और निगलने में दिक्कत होने लगती है. कई बार तो ये परत इतनी मोटी हो जाती है, कि इससे सांस की नली तक ब्लॉक हो जाती है.

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दिल और किडनी पर भी असर डाल सकता है डिप्थीरिया

डिप्थीरिया से कॉम्प्लिकेशंस

डिप्थीरिया का टॉक्सिन सिर्फ गले तक सीमित नहीं रहता. अगर वक्त पर इलाज न हो, तो ये खून के ज़रिए शरीर के दूसरे अंगों तक भी पहुंच सकता है. इससे दिल की मांसपेशियों में सूजन आ सकती है. जिसे मायोकार्डाइटिस कहते हैं. गंभीर मामलों में हार्ट फेलियर और अचानक मौत का ख़तरा भी हो सकता है. ये टॉक्सिन किडनी और नसों को भी नुकसान पहुंचा सकता है. इससे हाथ-पैरों में कमज़ोरी और पैरालिसिस तक हो सकता है.

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डिप्थीरिया के लक्षण 

आमतौर पर डिप्थीरिया के लक्षण दिखने में 2 से 5 दिन का समय लगता है. इसके आम लक्षणों में शामिल हैं- गले में तेज़ दर्द. गले में सूजन. गले के अंदर मौजूद ग्रंथियों का बढ़ जाना. बुखार और कमज़ोरी. निगलने में दिक्कत होना. सांस लेने में तकलीफ और खांसी आना.

डिप्थीरिया का इलाज और बचाव 

डिप्थीरिया का इलाज तुरंत शुरू करना ज़रूरी होता है. इसके इलाज में एंटीबायोटिक्स दी जाती हैं. कई बार मरीज़ को अस्पताल में भर्ती करना पड़ता है. सांस लेने में दिक्कत होने पर ऑक्सीज़न भी दी जाती है. इलाज के दौरान मरीज़ को दूसरों से अलग रखा जाता है, ताकि इंफेक्शन न फैले.

डिप्थीरिया से बचना है, तो बचपन में ही बच्चे को इसकी वैक्सीन लगवाएं. समय-समय पर बूस्टर डोज़ लेना भी ज़रूरी है. इसके साथ ही, संक्रमित व्यक्ति से दूरी रखें. खांसते या छींकते समय मुंह ढकें. हाथों को साफ रखें. और अगर डिप्थीरिया से जुड़ा कोई भी लक्षण दिखे, तो तुरंत डॉक्टर से मिलें.

(यहां बताई गई बातें, इलाज के तरीके और खुराक की जो सलाह दी जाती है, वो विशेषज्ञों के अनुभव पर आधारित है. किसी भी सलाह को अमल में लाने से पहले अपने डॉक्टर से ज़रूर पूछें. दी लल्लनटॉप आपको अपने आप दवाइयां लेने की सलाह नहीं देता.)  

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