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'राम सेतु' के पोस्टर में अक्षय ने कंधे पर जो चीज़ उठा रखी है, वो क्या है?

अगर आप इसे पत्थर समझ रहे हैं, तो आप ग़लत हैं.

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पंबन द्वीप से है इसका कनेक्शन

उत्सुकता, दुनिया में अब तक जितनी भी खोज हुई है उन सबकी जननी. सोशल मीडिया की भाषा में इसे ही बज़ क्रिएट करना कहा गया है. टीज़र्स, पोस्टर्स के ज़रिये यही काम आजकल फिल्मों के प्रमोशन के लिए भी किया जाता है. ऐसा ही एक पोस्टर रिलीज़ किया है अक्षय कुमार ने. अपने सोशल मीडिया हैंडल्स से. चेहरे पर मज़बूत इरादा, भीगा हुआ शरीर, कंधे पर दोनो हाथ से उठाया एक ‘पत्थर’. ये पोस्टर अक्षय कुमार की आने वाली फिल्म का है, जिसका नाम पोस्टर पर भगवा रंग से लिखा है, ‘राम सेतु’. भीगने का कारण कुछ भी हो सकता है लेकिन पोस्टर में अक्षय समुद्र के बीच एक चट्टान पर खड़े दिखाई देते हैं. चांसेज़ ज्यादा हैं कि इस ‘पत्थर’ को पाने के लिए उनके किरदार को समुद्र की गहराई नापनी पड़ी होगी. 

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लेकिन इस ‘पत्थर’ में ऐसा है क्या? अब अक्षय कुमार के भीगने का कारण समुद्र हो या बारिश, पिक्चर आएगी तो पता चल ही जाएगा. हम अभी से ही इसका पोस्टमार्टम करने में क्यों लगे हैं? दरअसल, अक्षय का भीगना इम्पोर्टेन्ट नहीं है, उनके हाथों में दिख रहा ये बड़ा सा ‘पत्थर’ इम्पोर्टेन्ट है. इसको ज़ूम करके देखा जाए तो ये समुद्र में मिलने वाले पत्थर, जैसे हम सबने देखें है, उनसे कुछ अलग दिखाई पड़ता है. अब पिक्चर का नाम ‘राम सेतु’ है तो ये पत्थर भी उसी पत्थर जैसा होगा, जिससे राम सेतु बनाया गया था. तो अलग तो दिखेगा ही.

लेकिन इसके अलग होने का कारण क्या है?

कारण जानने के लिए चलते हैं, 1964 में. तमिलनाडु के पंबन द्वीप से श्रीलंका की दूरी महज़ 31 किलोमीटर है. दक्षिण में बसे पंबन द्वीप का आखरी शहर है धनुषकोडी. 22 दिसम्बर, 1964 को धनुषकोडी में तेज़ तूफ़ान आया. 300 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से तेज़ हवाएं चली और सब कुछ तबाह हो गया. अब यहाँ सिर्फ एक बसे हुए शहर के अवशेष मिलेंगे. लोगों ने इसे एक शापित जगह घोषित कर दिया और सरकार ने रहने के लिए अनफिट. लेकिन 22 दिसम्बर, 1964 से पहले यहाँ बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर को छूता एक प्राचीन पोर्ट हुआ करता था. इस शहर में रेलवेज, बैंक, पोस्ट ऑफिस, वो सब सुविधाएं उपलब्ध थी जो किसी भी विकसित जगह पर होनी चाहिए. इसी शहर में समुद्र किनारे मिलते हैं एक चर्च के अवशेष. इस चर्च की दीवारों में जो पत्थर मिलता है उसकी आकृति coral जैसी दिखाई पड़ती है, जिसे हिंदी में मूंगा कहा जाता है. ये समुद्र की गहराइयों में पाया जाने वाला एक जीव है. मरने के बाद ये ठोस और बड़े से पत्थर जैसा आकार ले लेते हैं, जिसकी ऊपरी सतह पर छोटे-छोटे छेद देखे जा सकते हैं. अक्षय ने कन्धों पर ऐसी ही कोई चीज़ उठा रखी है.

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पंबन द्वीप पर चर्च के अवशेष

अब चलते हैं कुछ हज़ारों साल पीछे. रामायण के अनुसार नल, जो देवताओं के वास्तुकार विश्वकर्मा के पुत्र थे, बचपन में पूजास्थलों से ऋषि मुनियों कि मूर्तियां उठाकर समुद्र में फेंक दिया करते थे. एक दिन एक ऋषि ने उन्हें श्राप दिया कि उनका फेंका कोई भी पत्थर पानी में नहीं डूबेगा और इसी श्राप का एडवांटेज मिला राम को. राम सेतु बनाने में.

Geologists क्या कहते हैं? 

भारत के आखरी छोर, धनुषकोडी में इस मुद्दे पर रिसर्च करने वाले कुछ geologists बताते हैं कि इस जगह पर बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर दोनों आकर मिलते हैं और दोनों के साथ बहकर आने वाली रेत यहां पर इकट्ठी हो जाती है. भारत और श्रीलंका को जोड़ने वाली एक रेखा की तस्वीर जो हम अक्सर इन्टरनेट पर देखते हैं, वो इसी रेत की बताई जाती है. यह रेत समतल नहीं होती, इसमें उतार-चढ़ाव होते हैं. इन उतार-चढ़ाव को कवर करने के लिए ये corals से बने पत्थर एक दम परफेक्ट हैं क्यूंकि इनका वज़न हल्का होता है और यह ठोस भी होते हैं. इससे यह माना जा सकता है कि इन्ही पत्थरों के सहारे एक ऐसा पुल बनाया जा सकता है, जिसपर चलकर श्रीलंका तक पहुंचा जा सकता हैं. सुनने में यह काफी कंविंसिंग लगता है.

लेकिन सच आखिर है क्या?

नल को दिया गया ऋषि का श्राप सच है या समुद्र में पाए जाने वाले corals? या सच इन दोनों नज़रियों के बीच ही कहीं छुपा है? देखने वाली बात ये भी है कि अब तक जो बड़े-बड़े साइंटिस्ट नहीं कर पाए, वो अक्षय कुमार की 'राम सेतु' कर पाएगी या नहीं? और सबसे बड़ा सवाल, क्या राम-सेतु का यह पत्थर अक्षय कुमार की पिछली कुछ मूवीज की तरह इस मूवी को डूबने से बचा पाएगा? इन सभी सवालों के जवाब तक हम पहुंचे या न पहुंचे. लेकिन एक चीज़ हमेशा अपनी जगह पर बनी रहनी चाहिए. हमारी और आपकी उत्सुकता.

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(ये स्टोरी हमारे साथी दीपक कौशिक ने लिखी है)

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