भइया कुच्छो कह लो पटना के लौंडे अपना अलगे पहचान रखते हैं. चाहे वो
इस्टाइल हो या फिर कारनामे. जन्म लेते हैं तो माई-बाबू, दादा-दादी, फुआ-फुफ्फा, मउसी-मउसा
सभे एतना खुश होते हैं कि हस्पताल के नर्स से लेकर बाहर बैठे भिखारी को भी पइसा बांटते हैं. साथ में कहते हुए कि
बेटा होलक हे, मिठाई खा लिह. अइसे जेब से एक पइसा नहीं निकलता.
एतना करने के बाद बबुआ थोड़े बड़े होते हैं
स्कूल जाएंगें तो पापा की बाइक पर, साइकिल पर नहीं. पेप्सी-कोला की बोतल नहीं, गर्दन में टांगने वाला बोतल चाहिए होता है पानी के लिए. नाक से नेटा भी न पोछ पाते हैं तबे से
इस्टाइल शुरू हो जाता है. लंच बॉक्स में घर का बना कुछ नहीं दिखना चाहिए. बिस्कुट-दालमोट से नीचे कुछ हुआ तो बबुआ की बेज्जती है. खाएंगें नहीं. उसका गुस्सा निकालेंगे मम्मी पर. माई का भी दुलार अइसा, फुसला लेती है पइसे का प्रलोभन देकर. बबुआ भी कम नहीं. ट्यूशन का होमवर्क नहीं करेंगे. ट्यूशन की मैडम के सामने माई का डायलॉग. छोड़ दीजिएगा तबीयत गड़बड़ाया है, इसलिए टास नहीं किया.
बबुआ जब नेटा (नाक) खुद से पोंछने और बबरी (बाल) झाड़ने लायक हो जाते हैं
हाफ पैंट की जगह फुल पैंट ले लेता है. स्कूल आना-जाना खुद की साइकिल से हो जाता है. पापा वाली नहीं, एवन की रेंजर साइकिल. वही मोटे चक्के वाली. घर से निकलेंगे तो सीधे-साधे बच्चे बनकर. रोड पर जाते ही हीरोगिरी शुरू. लप्पा-झप्पा जैसा तो कुछ होता ही नहीं. पहला प्यार क्रिकेट और दूसरा वी़डियो गेम. मम्मी के लाए कैसे भी कपड़े पहन लेते हैं. लेकिन खाने में वही चिकचिक. चाहे दस तरह के पकवान बन जाए फिर भी,
इ न खाम, उ न खाम.
खाना में लाल न हई पियर न हई. इतने के बाद माई का एक लहराता
थाप. और खाना गटागट गले के नीचे. 13-14 साल तक तो सारे लड़के लगभग एके जइसे होते हैं. बाद में किस्म-किस्म के संगति में खर्च हो जाते हैं. कुछ लफुआगिरी में. कुछ किताबों में और कुछ बेकारी में. नौवी-दसवीं में जाने के बाद सारे के रंग और चाल-ढाल उभरने लगते हैं.
1. पहले टाइप के बबुआ
पानी और तेल से बाल को चपका के बीच बबरी माथा झाड़ेंगे. बोले तो तेरे नाम टाइप. थोबड़े पर क्रीम-पउडर का लेप अइसे पोतेंगे मानो चक्की मील से अभी-अभी निकले हो. गोविंदा के माफिक कपड़े पहनेंगे. ब्रैन्डेड कपड़ा और जूता इनके फैशन का हिस्सा नहीं होता. फुटपाथ के कपड़े और हवाई चप्पल पर सारी भौकाली रहती है. बाइक कभी-कभी मिलने लगती है तो उसके लालच में हर काम करता है. बस यहीं से शुरूआत होती है लड़के के बिगड़ने की. तिरंगा, शिखर, खैनी जैसे टॉनिक लेना शुरू. पढ़ाई-लिखाइ साढे बाइस हो जाता है. रास्ते में कहीं कोई लइकी दिख गई तो पूछो न भइया. घूरेंगे अइसे जइसे कुत्ता लार टपकाता हुआ हड्डी को घूरता है. 'बगल वाली जान मारे ली' गाना शुरू. रोज शाम को झंडीमार बन के पहले नुक्कड़ पर जाएंगे और वहां से कटने के बाद सीधे घर की छत पर लुढ़कते हैं. पढ़ने के लिए बाप से हजार गाली सुन ले फिर भी किताब छुएंगे नहीं. दसवीं की परीक्षा जैसे-तैसे देते हैं. रिजल्ट के टाइम पर माई भगवान को खूब्बे घूस देती है.
बेटवा के पास करा दिह, 250 ग्राम बेसन के लड्डू चढइबुअ. 250 ग्राम बेसन के लड्डू, भगवान खुश और बबुआ पास. और फिर पूरे मोहल्ले में मिठाई भी पास. नंबर इतने झक्कास होते हैं कि किसी अच्छे स्कूल में या कॉलेज में एडमिशन होता नहीं. ले दे के बचता है खानदानी कॉलेज. घर की परंपरा को न तोड़ते हुए बबुआ "बी.एस. कॉलेज" के हो जाते हैं. पर वहां भी वहीं हाल. बदलाव जो थोड़ा आता है वो है लइकियों के 'छेड़ने' के स्टाइल में. बाप को चिंता होती है तो गरिया देते हैं. और माई भगवान को घूस देती है.
2. दूसरे टाइप के बबुआ
इनको बस पढ़ाई से मतबल होता है. बोले तो किताबी कीड़ा. आईएएस से नीचे तो कुछ बनना ही नहीं होता. हो भी काहे न. जन्म लेते ही 3 ईडीअट की तरह पहले से ही आईएएस का बोझा जो थोप दिया जाता है. दहेज और धौंस की लालच में बाप सपना देख बैठता है. इनकी लाइफ स्टाइल टाइम-टेबल पर चलता है. स्कूल में टॉपर, कॉलेज टॉपर. दिखने में सिंपल. फैशन और मोह माया से दूर. प्यार-मोहब्बत से परे. आंखों में मोटे-मोटे चश्मे, उसके नीचे 4 इंच के गढ्ढे. थोड़ी तोंद निकली.
इनका कमरा मिनी बुक फेयर और कमरे की दीवार बड़ी सी ग्लोब होती है. बस ट्यूशन-कोचिंग जाते ही दिखते हैं. मम्मी को कहना पड़ता है, कोहबर से कभी बाहर निकल लिया करो. पढ़ाई में अच्छे तो सबके रसमलाई होते है. शादी-बियाह में रिश्तेदारों को न दिखे तो हजार सवाल. और तो और बिटिया की शादी का प्रपोजल भी रख देते हैं. गली-मोहल्ले और पड़ोसियों के घर में मिसाल के तौर पर नाम लिया जाता है. कसम से स्टार वाली फीलिंग तो जरूरे आती होगी. ऐसे लड़कों को लड़कियां भाव नहीं देती.
3. तीसरे टाइप के बबुआ
ये बीच के होते हैं. न पढ़ाई में अच्छे और न ही किसी और चीज में. बोले तो गोबर का चोता. जो
गोइठा(उपले) बनाने के काम भी नहीं आता. इनका दिनचर्या कुछ अइसा होता है. सुबह उठते ही अखबार के लिए गला फाड़ेंगे. पढ़े चाहे एक अक्षर न. उसके बाद मुंह में ब्रश ठूस कट लेंगे चौराहे पर. हाफ पैंट और गंजी में ही. ड्रेस कोड होता है भइया इनका. वहां उनके जैसे और होते हैं. बतकुच्चन राजनीति पर होती है. साला उ नेता ने फलाना नहीं किया. मोदी को ये करना चाहिए था, वो करना चाहिए था. रोड ठीक नहीं है. लाइन बहुत कटता है. सरकारी नौकरी नहीं दे रहा हमलोगों को. एक पल में राजनीति से बहस अपने ऊपर आ जाती है. लोग आज चाय पर चर्चा करते हैं. और ये लौंडे ब्रश पर. चौराहे से घर आ कर माई से खाना मांग कर खाएंगे और चिपक जाएंगे लैपटॉप से. दिखावे वाली पढ़ाई कभी-कभार कर लेते हैं. जिससे गाली न खानी पड़े बाप से. बाप-दादा की खूब सारी जमीन होती है.
इसलिए स्पेशल नाम दिया जाता है '40 बिगहवा'. कंजूस अव्वल दरजे के. शाम के वक्त गुप्ता चाय वाले के यहां तशरीफ टिका देंगे. रात तक वहीं बकैती में खर्च होगें. और फिर घर आ के खाने में हजार नुक्स निकालेंगे. माई चार ठो बात सुनाएगी. और कहेगी, खाए ला हउ त खो, न त सुत अइसही. वापस से लैपटॉप में घुस जाएंगे. भोजपुरी फिल्म देखते-देखते कब टें बोल देंगे इनको भी नहीं पता.