जंतर-मंतर और इंडिया गेट पर इतनी मांगें नहीं रखी जाती जितनी गोलगप्पे वालों के आगे रखी जाती हैं. सरकार से इतनी उम्मीद नहीं होती जितनी गोलगप्पे वालों से. वो व्यस्त रहते हैं, लोगों से घिरे रहते हैं, फिर भी नहीं खीझते. पर अब लोग उनकी भलमनसाहत का फायदा उठाने लगे हैं. उन्हें भी कोफ़्त होती है जब आप जलजीरा में डुबकी लगाने लगते हैं. टिशू पेपर को तौलिये सरीखा इस्तेमाल करते हैं. किसे पसंद आएगा कि वो हर दूसरे गोलगप्पे के लिए चटनी का अलग कंपोजीशन बनाए. सूखी पापड़ी भी हवा में नहीं पैदा हो जाती. तो वक़्त है उनकी आवाज उठाने का. लल्लन ने उनके मन की बात सुनी और आपके सामने रख रहा है. उम्मीद करते हैं आप समझेंगे. पढ़ लिया न? तो क्या हम उम्मीद करें कि अगली बार जब आप गोलगप्पे खाने जाएंगे तो कुछ बातें मान ही लेंगे!