Shekhar Kapur. National Award विनिंग Director. Padma Bhushan. जिसकी बनाई दो फिल्मों ने ऑस्कर भी जीता. मगर ये सफलता यूं ही उनके हिस्से नहीं आई. बहुत धिक्कारा गया उन्हें. कडे़ शब्दों के हमले हुए. 'लूज़र' का ठप्पा भी लगा. मगर शेखर रुके नहीं. वो अपने भीतर झांकते रहे. और लगातार ख़ुद की शिनाख़्त करते रहे. तब जाकर हमें मिले द ग्रेट फिल्ममेकर शेखर कपूर. बीते दिनों जब शेखर कपूर The Lallantop के ख़ास कायर्क्रम Guest in The Newsroom में आए, तो उन्होंने बताया कि उनके नाम के होर्डिंग लगे थे मुंबई में. और उन पर लिखा था ‘द बिगेस्ट लूज़र इन टाउन… शेखर कपूर’. शेखर की मां ये देख बिलख पड़ी थीं. मगर मां की इन्हीं आंखों में आंसुओं की जगह गर्व ने कब और कैसे ली, ये शेखर ने इस गुफ्तगू में बताया.
शहर के सबसे बड़े होर्डिंग पर क्यों लिखा था-"द बिगेस्ट लस्सू इन टाउन... शेखर कपूर"
शेखर कपूर की मां ये होर्डिंग देख बिलख पड़ीं. शेखर कहते हैं, "मैं था फेलियर और हमेशा फेलियर ही रहूंगा."


इस घटना के बारे में बताते हुए शेखर कपूर ने कहा,
“मुझे याद है. स्टारडस्ट होती थी वो मैगज़ीन. और मैं अपनी मदर को एयरपोर्ट लेने गया. वो मेरे लिए बहुत चिंतित रहती थीं. उन्हें लोग कहते थे- ‘की कर रेया ए तुहाडा पुत्त. चार्टर्ड अकांउंटेंसी कर के आया सी. भटकता फिर रहा बम्बई इच’. और मैं उनको कहता था मम्मी मैं बिल्कुल ठीक हूं. सब कुछ ठीक है. 10 फिल्में ऑफर हो रही हैं मुझे. बहुत काम है. यही सब बातें करते-करते एयरपोर्ट से लेकर आ रहा था. तभी सामने आया स्टारडस्ट का एक बहुत बड़ा पोस्टर. लिखा था- ‘द बिगेस्ट लस्सू इन टाउन’. लूज़र भी नहीं. लस्सू. लस्सू लिखा था मेरे लिए. अब मेरी मां उसे देख रही है. मैं कह रहा हूं अरे आप मत देखो उधर. मत देखो. मगर उन्होंने देखा. पढ़ा. और मैंने देखा कि उनकी आंखों में आंसू आ गए. उन्हें लगा कि दिल्ली में जो लोग उन्हें मेरे बारे में कहते थे, वो सब सच है.”
शेखर कपूर को लोग फेलियर कहते थे. शेखर ने इस बारे में कहा,
“मैं फेलियर था. था फेलियर. लेकिन आप कब फेलियर नहीं होते. आप हर सुबह इसी एहसास के साथ जागते हैं कि आप फेलियर हैं. अगर आप ऐसा महसूस नहीं करते हैं, और आप मानते हैं आप तो सफल हो गए हैं, तो आप कुछ करेंगे ही नहीं. थोड़ा डर तो लगना चाहिए ना. कोई भी काम करने के लिए थोड़ा तो धिक्कारा जाना चाहिए ना. मेरे लिए तो धिक्कारा जाना ज़रूरी है.”
फेलियर के बारे में शेखर का फ़लसफ़ा भी वही है, जो तक़रीबन हर सफल शख़्सियत की होता है. इसे वो ईंधन मानते हैं. शेखर ने कहा,
“फेलियर सबसे बड़ा टीचर है. फेलियर के बाद ही आप अपने अंदर जा पाते हो. और सतत ख़ुद से पूछते रहते हो. सक्सेस में तो सब वाह वाह करते हैं. मगर फेलियर में बिल्कुल अकेले हो जाते हैं. तब हम अंदर जाते हैं खुद के. और फिर अपने आप को ढूंढते रहते हैं. मैं कौन हूं? क्या कर रहा हूं? इसलिए मैं तो हमेशा फेलियर रहूंगा.”
1945 में जन्मे शेखर कपूर हिंदी सिनेमा के सुनहरे हस्ताक्षर हैं. उनकी फिल्मों में वाह वाही की हवस नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति की भूख महसूस होती है. अपने सृजन से वो ऐसे फिल्मकार जान पड़ते हैं, जिन्हें अपने क्राफ्ट पर किसी का वैलिडेशन नहीं चाहिए. वो बस कहानी को पूरी ईमानदारी से कहने में यक़ीन रखते हैं. शेखर कपूर ने अपनी शुरुआती पढ़ाई दिल्ली से की. फिर इकोनॉमिक्स में ग्रैजुएशन किया और इंग्लैंड जाकर चार्टर्ड अकाउंटेंट बने. लेकिन वो हमेशा से कुछ रचना चाहते थे. कुछ ऐसा, जो मौलिक हो. वो कहानियां कहना चाहते थे. उनकी यही भूख उन्हें सिनेमा की तरफ़ ले आई. साल 1983 में उन्होंने ‘मासूम’ बनाई. भारतीय सिनेमा को मोगैम्बो जैसा अमिट खलनायक दिया. उनकी ‘एलिज़ाबेथ’ (1998) को ऑस्कर के 7 नॉमिनेशंस मिले. एक कैटेगरी में इसने ऑस्कर जीता भी. 2007 में इस फिल्म के सीक्वल ‘एलिज़ाबेथ: द गोल्डन ऐज’ ने भी एक ऑस्कर जीता. शेखर कपूर की सभी फिल्मों ने वर्ल्ड सिनेमा में अपनी अलग जगह बनाई. मगर ‘बैंडिट क्वीन’ (1994) उनका सबसे साहसिक काम है.
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