अंग्रेजी की एक कहावत है - Every Dogs has its day. मेरी छोटी समझ तो यही कहती है जब कुत्ते का भी दिन आना है, इंसान का तो दौर आना चाहिए. समय सबका बदलता है. आपका भी बदलेगा. हमारा भी बदलेगा. फिलहाल समय रैना का बदला है. और ऐसा बदला है कि कुछ महीने पहले तक उन्हें ट्रोल करने वाले भी कसीदे पढ़ रहे हैं. उन्हें इस दौर का सबसे बड़ा कमीडियन कहने से भी गुरेज़ नहीं कर रहे. वजह है उनका नया स्टैंड-अप स्पेशल Samay Raina - Still Alive. इसने समय नाम के ‘कॉमिक मॉन्स्टर’ को दोबारा ज़िंदा कर दिया है. इस स्पेशल में सबके लिए थोड़ा-थोड़ा, कुछ-कुछ मसाला है. इसे अपलोड करते हुए समय भाई ने कहा होगा:
Samay Raina Still Alive - बिगड़ैल बच्चा अब मैच्योर हो चुका है?
समय रैना ने अपनी ही खींची लकीरों को छोटा कर दिया है. कच्चा घड़ा आग में तपकर अब पक चुका है.


रैना खड़ा बज़ार में कंटेंट दिया छितराय,
जिसको जितना चाहिए काट-छांट लै जाय
ये स्टैंडअप उनकी उस आपबीती की कहानी है, जिसमें वो दुबककर रोते होंगे. अपने आंसू छिपाते फिरते होंगे. परिवार से, दोस्तों से, और कई बार खुद से भी. शायद उन्होंने अभी जितना दिखाया है, उनके घावों का 10 प्रतिशत भी नहीं है. इस स्टैंड-अप से समय ने अपनी ही पुरानी खींची गई लकीरों को छोटा कर दिया है. अब एक बिगड़ैल बच्चा मेच्योर हो चुका है. वो हमें सिखा रहा है - This shall too pass.

इस स्टैंड-अप स्पेशल में समय मोटिवेशनल स्पीकर हैं. बेटे हैं. दोस्त हैं. कश्मीरी पंडित भी हैं. कई मौकों पर ‘बिलो द बेल्ट’ जोक्स करने वाले भद्दे कॉमिक भी हैं. बहुत बड़े गालीबाज़ भी हैं. एक कमाल के व्यंग्यकार और सधे हुए स्टोरीटेलर भी हैं. इस कहानी के हीरो वही हैं. विलेन भी वही हैं. वो हंसते हैं. रोते हैं. शायद कुछ मौकों पर दूसरों को भी रुलाते हैं और हंसाना उनका काम है. सो वो बड़ी सहजता से कर जाते हैं.
Samay Raina-Still Alive को रिव्यू करने वाला मैं कोई बहुत बड़ा एक्सपर्ट नहीं हूं. महज़ एक जागरुक दर्शक की तरह जो कुछ देखा-सुना, समझा, वही आप सबके सामने रख रहा हूं. समय की कॉमेडी 'सेक्रेड गेम्स' सरीखी है. जैसे उस शो ने इंडियन OTT स्पेस में क्रांतिकारी बदलाव किए, वैसा ही कुछ समय का ये स्टैंड-अप स्पेशल इंडियन कॉमेडी स्पेस में कर सकता है. बशर्ते जॉनर के नाम पर सेक्रेड गेम्स की तरह इसकी सिर्फ गालियों और सेक्स को कॉपी न किया जाए.
समय ने अपने (एक तरह से) कमबैक के लिए आत्मकथात्मक जॉनर चुना. लेकिन इसे किसी आम कॉमिक सेट जैसा नहीं बनाया. वो चाहते तो इसे सिर्फ फनी रख सकते थे. उनके पास ऐसा करने का स्कोप भी था. या फिर इसे सिर्फ इमोशनल सेट बना सकते थे और इस एंगल पर खेलने के लिए एक अच्छी कहानी भी थी. करारे व्यंग्य का ज़ोरदार छौंका लगाने की कोई खास ज़रूरत थी नहीं. रैना सेफ खेल सकते थे लेकिन उनकी ही भाषा में कहें तो कश्मीरी पंडित और सेफ... हाहाहा…
मेरे लिए एक घंटे इक्कीस मिनट के वीडियो का सबसे उजला पक्ष रहा इसका व्यंग्य. जिसका तड़का समय ने बहुत सही लगाया. चाहे उनका मीडिया पर कटाक्ष करते हुए कहना हो कि लोग हंसना बंद कर देंगे न तो सवाल पूछना शुरू कर देंगे. या फिर George Orwell को असम के सेटअप में डालकर कहना - Every revolution is a tiny joke.

युद्ध, अलोकतंत्र, तानाशाही और पागलपन की दुनिया में ये एक ग्लोबल सटायर है, जहां जोक के लिए स्पेस कम हो रहा है और आं'डॉनल्ड' ट्रम्प के लिए खत्म ही हो रहा है. हां, तिकोने झंडे वाले आंदोलन कर सकते हैं. किसी की भी रेल बना सकते हैं, क्योंकि उन्हें अगले दिन एक्सेल शीट नहीं बनानी है.(माज़रत दोस्तो. रील के इस ज़माने में मेरी रेल मत बना दीजिएगा.)
बीच-बीच में समय ज़ाकिर खान मोड में चले जाते हैं. मोटिवेशनल स्पीकर हो जाते हैं. रील कटवाने के लिए ज्ञान देने लगते हैं. कभी दोस्ती पर. कभी बेटे होने के फ़र्ज़ पर. कभी देश पर. इसके लिए कई मौकों पर अपनी कश्मीरी पंडित की आइडेंटिटी को कमीडियन के आगे खड़ा कर देते हैं. मसलन - सबसे डाउन फ़ेज़ में आंसू बहाते हुए समय को मीम भेजते पापा का ये कहना, मेरा घर चला गया, तब मैं नहीं रोया, अब क्या रोऊंगा! और लेटेंट का शो तुमसे है, तुम शो से नहीं हो. अपने अंदाज़ में समय एक बड़े मार्के की बात कहते हैं - You only fight when the fight is fair, if the fight is not fair, you f*** off from there. इसी बात पर मैं भी ज्ञान देना चाहता हूं - कुछ भी हो जाए ज़िंदगी कभी खत्म नहीं होती. हमेशा नए ढंग से शुरू होती है.
ढेर सारा इमोशन भी है इसमें. पेरेंट्स को लेकर रिलेटेबल बातें कुछ ज़्यादा ही हैं. स्कूल से बुली होकर लौटा बच्चा मां के सामने खुश-खुश उछलते हुए आ रहा है. अपने आंसू छिपा रहा है. उम्र बढ़ी, पर आदत वही रही. तीन FIR हो चुकी हैं. असम से लेकर मुंबई पुलिस तक पीछे पड़ी है. USA में बैठे लड़के को रोना आ रहा है. लेकिन मां के सामने स्ट्रॉन्ग बने रहना है. पर मां भी आखिर मां होती है. फोन करके दोस्त से कहती है कि समय का ध्यान रखना, बहुत परेशान है वो. यहीं वो दीवार टूटती है, जिसमें एक 27 साल का बच्चा अपने जीवन के सबसे बुरे दौर में मां के सामने रोता है. पर पिता के सामने नहीं. क्यों? ये भी बताना पड़ेगा? आप रोए हैं?
समय को कुछ चीजों पर फ़िल्टर लगाना भी सीखना होगा. अभिषेक बच्चन और पोलियो वाले जोक का कोई औचित्य नहीं था. ये एक ‘बिलो दी बेल्ट’ जोक है. किसी पर पर्सनल अटैक करना कैसे सही हो सकता है? परंपरा, प्रतिष्ठा, अनुशासन और थोड़ी-सी मर्यादा भी भाईसाब.
स्टैंड-अप में गालियों का इतना ज़्यादा प्रयोग क्यों? क्या उनके पास अच्छे जोक नहीं हैं? अच्छी पंचलाइन नहीं है कि उनकी जगह गालियां देनी पड़ रही हैं. मुझे तो ऐसा नहीं लगता. उन्हें गाली देने की ज़रूरत है नहीं. क्या समय को मंजूर होगा कि उन्हें ऐसे कमीडियन के तौर पर याद किया जाए, जो गालियों के दम पर तालियां बजवाता हो. गालियों की जहां ज़रूरत नहीं है, वहां तो कम से कम अवॉइड की ही जा सकती है. उन्हें ये कूल लगता होगा, लेकिन किसी भी बात पर मां की, बहन की गाली देना. हर बात पर अंग विशेष से जुड़े शब्दों का प्रयोग करना, कहां तक सही है?
ज़बरदस्ती गालियों को अपने सेट में फिट किया जाना किस अच्छे कॉमिक की निशानी है? गालियां बैसाखी हैं, क्या भाषाई स्तर पर समय विकलांग हैं? या जोक्स के स्तर पर. मुझे तो नहीं लगता. इसी सेट में उन्होंने साबित किया है कि वो एक कमाल के कमीडियन हैं. लिहाजा जिस तरह ये सोसाइटी भाषा में गालियों की थोड़ी बहुत गार्निशिंग करती है, उतना कॉमेडी में भी ठीक है, लेकिन सब्जी ही धनिया की बना देंगे तो एक वक़्त के बाद मज़ा आना बंद हो जायेगा साब.
समय के पास कौशल है. थोड़ा फिल्टर और सेंटिविटी आ जाए तो जो लोग उन्हें इस दौर का सबसे बड़ा इंडियन कमीडियन घोषित करना चाह रहे हैं, वो ऐसा कर भी सकते हैं. लेकिन इतनी जल्दी ऐसा कह देना जल्दबाजी है. क्योंकि अभी तो ये अंगड़ाई है, आगे और लड़ाई है. वैसे भी समय रैना का 'विजडम' कहता है कि किसी शेर की पहली लाइन सुनकर ‘वाह-वाह’ कैसे कर सकते हो. क्या पता ह* दे वो अगली लाइन में.
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