Rajpal Yadav फिल्म इंडस्ट्री के सबसे बेहतरीन कॉमिक एक्टर्स में से एक माने जाते हैं. सोशल मीडिया पर उनके सीन्स अब वायरल मीम टेम्प्लेट बन चुके हैं. Phir Hera Pheri, Chup Chupke, Bhool Bhulaiyaa और Garam Masala जैसी फिल्मों को उनके पॉपुलर कामों में गिना जाता है. मगर हालिया दिनों में वो जेल जाने की वजह से सुर्खियों में हैं. 9 करोड़ रुपये के चेक बाउंस केस में Delhi High Court ने उन्हें Tihar Jail भेज दिया है. मगर जेल जाना उनके करियर के हाइलाइट्स में नहीं, बल्कि उनके सबसे कमज़ोर पलों में गिना जाना चाहिए. क्यों? ये आप समझेंगे उनकी कहानी जानकर.
कहानी राजपाल यादव की, जो रिवॉल्वर के बूते NSD गए, पत्नी के निधन के बाद सिर मुंडा प्ले करने चले गए
राजपाल यादव वो एक्टर हैं, जिनका लोहा नसीरुद्दीन शाह ने भी माना. 'चुप चुप के' में कॉमेडी करना उनके करियर का सबसे मुश्किल काम क्यों था?


# जिस सड़क से गांव से निकले, अब उसका नाम राजपाल यादव मार्ग है
उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में एक तहसील है, पोवायां. यहां एक गांव है- कुंडरा. शहर से 50 किलोमीटर दूर. 6 मार्च, 1971 को राजपाल यादव का जन्म हुआ. घर से समृद्ध हैं. पिता किसान. माता हाउसवाइफ. घर में दूध का बिजनेस है. आज भी करीब 100-150 भैंसें हैं. डेयरी है. हज़ार बीघे से ज़्यादा ज़मीन है. छह भाई हैं. उनके एक भाई पिछले 5 साल से गांव के प्रधान हैं. उनके गांव जाने वाली सड़क का नाम राजपाल यादव मार्ग है. घर खेतों के बीच है. एकदम महल जैसा. इस समय मुंबई में रहते हैं. पहली पत्नी का देहांत हो गया था. दूसरी पत्नी से दो बेटियां हैं.
# स्कूल जाते थे तो पैंट खोल देते थे
राजपाल यादव ने 2005 में अपने गांव को गोद ले लिया था. उन्होंने यादें ताजा करते हुए बताया,
“हम लोग बारिश के दिनों में घर से निकल नहीं पाते थे. सड़कों पर कमर तक पानी भरा रहता था. जब स्कूल जाते थे, तो पैंट हाथ में ले लेते थे. गांव के बाहर तक सिर्फ निक्कर में जाते और वहां फिर पैंट पहनते.”
राजपाल बताते हैं कि अब उनके गांव में लगभग सभी सड़कें पक्की हैं. ये काम उन्होंने अपने प्रधान भाई के साथ मिलकर किया.
# घरवाले बनाना चाहते थे डॉक्टर, बन गए एक्टर
घर वालों की इच्छा थी कि राजपाल बड़े होकर डॉक्टर बने. इस इच्छा को पूरा करने की तैयारी बचपन से ही चालू हो गई थी. पांचवीं तक की पढ़ाई गांव के प्राइमरी स्कूल से हुई. फिर सुनासीर नाथ जूनियर हाईस्कूल (बंडा) में 'एक साल पढ़े. इसके बाद ढका घनश्याम, जो कुंडरा का पोस्ट है, वहां से सातवीं-आठवीं की. फिर शहर आ गए. यहां सरदार पटेल कॉलेज से कक्षा 9-10 की. 11वीं राजकीय इंटर कॉलेज (शाहजहांपुर) से की.
# इंडियन आर्मी के लिए दर्जी बन गए
इसी दौरान ऑर्डिनेन्स क्लोदिंग फैक्ट्री में अपरेंटिस के लिए अप्लाय किया. हो भी गया. इसलिए बारहवीं प्राइवेट की. क्योंकि एक साथ फिर दो इंस्टिट्यूट में कैसे पढ़ते. फिर दो साल वहीं से अपरेंटिस की. इसे शाहजहांपुर में दर्जीखाना भी कहते हैं. यहां आर्मी के लिए कपड़े और ज़रूरत की अन्य चीज़ें बनाई जाती हैं. यहां से पढ़ रहे बच्चों को आगे चलकर यहीं जॉब करने की सहूलियत मिलती थी. राजपाल अपने इंटरव्यूज़ में बताते हैं कि अगर वो एक्टर नहीं होते, तो आज भी ऑर्डिनिन्स क्लोदिंग फैक्ट्री में जॉब कर रहे होते. क्लोदिंग फैक्ट्री में पढ़ते हुए राम लीला में भी हिस्सा लिया. यहां अंगद बने थे.
# हिंदी पढ़कर वकील लग गए
'राजपाल ने मां-पिताजी के कहने पर डॉक्टरी के लिए साइन-अप तो कर लिया था, मगर उन्हें साइंस में कुछ खास इंट्रेस्ट नहीं था. न ही उन्हें लैब एक्सपेरिमेंट्स वगैरह अच्छे लगते थे. इसलिए राजपाल अपना स्ट्रीम चेंज करके आर्ट्स में आ गए. उन्होंने रुहेलखंड यूनिवर्सिटी से पॉलिटिकल साइंस और हिंदी लिटरेचर में ग्रैजुएशन किया. इस दौरान एक वकील के साथ भी कुछ दिन काम किया.
# कुत्तों से बचाने वाले किसान सीताराम के लिए कमरा बनाया
राजपाल यादव के बारे में उनके किसी भी पुराने साथी से पूछें, तो वो अपना कोई किस्सा ज़रूर सुनाएगा जब राजपाल ने उसकी मदद की होगी. नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा और भारतेन्दु नाट्य अकादमी से लेकर शाहजहांपुर तक के साथी और गुरु कहते हैं कि उन्हें घमंड छू तक नहीं गया है. स्टार हैं पर खुद फोन उठाते हैं. दोस्त कृष्णकुमार श्रीवास्तव बताते हैं कि उन्होंने एकाध दोस्तों को घर बनाने के लिए फ्री में ज़मीन तक दे दी. बचपन में बेर खाने दूसरे गांव जाने और वहां कुत्तों के दौड़ा लेने पर उनको बचाने वाले किसान सीताराम के लिए राजपाल ने एक कमरा बनवाया. कचहरी में कभी उनके साथ काम करने वाले एक साथी को शादी में मुंबई लाने के लिए उन्होंने रूस से फोन करके दोस्तों को हिदायत दी.
# कक्षा 3 में कविता सुनाते हुए पैर कांपने लगे
राजपाल तीसरी कक्षा में थे. एनुअल फंक्शन में कविता सुनाने का नम्बर लगा. कविता थी: “जिसके लिए प्रताप सिंह ने धूल जंगलों की छानी…” एक ही दो लाइन पढ़ी होगी. पैर कांपने लगे. राजपाल रोने लगे. पर टीचरों ने तालियां बजा दी. मुंशी जी ने रबर इनाम में दी. फिर पांचवीं में चुटकुला सुनाया. उसमें एक पेन्सिल इनाम में मिली. फिर सातवीं में एक कार्यक्रम में हिस्सा लिया. यहां तौलिया मिला. ये तीन ईनाम राजपाल के लिए सबसे ख़ास हैं.
# एक थियेटर ग्रुप ने राजपाल की लाइफ बना दी
राजपाल यादव पढ़ाई तो कर रहे थे, मगर उनका मन एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटीज़ में ज़्यादा लगता था. नवीं कक्षा से ही थिएटर में सक्रिय हो गए. नुक्कड़-नाटकों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया था. राजपाल शहर में किराए पर जहां रहते थे, उसी के सामने कृष्ण कुमार श्रीवास्तव रहा करते थे. आगे चलकर ये उनके पक़के दोस्त बन गए. कृष्णा थिएटर जाते थे. उनके साथ दिलीप भी जाते थे. राजपाल ने भी एक दिन उनके साथ चलने का आग्रह किया. यहां उनकी मुलाक़ात हुई, ज़रीब मलिक आनंद से. वो शाहजहांपुर में कोरोनेशन आर्ट थिएटर ग्रुप चलाते थे. राजपाल भी इससे जुड़ गए. यहां पहला प्ले ' अंधा कानून ' किया.
# पत्नी का दाह संस्कार किया और सिर मुंडाकर प्ले करने पहुंच गए
ज़रीब मलिक बताते हैं,
"शुरू में राजपाल बैकस्टेज और दरी बिछाने जैसे काम करते थे. वो शुरू से ही बहुत जुझारू थे. कभी कोई काम कहो, तुरंत हाज़िर. वे मेरे प्रिय शिष्यों में से एक है."
राजपाल, ज़रीब को मिले सबसे समर्पित लोगों में से थे. उन्होंने राजपाल के समर्पण का एक किस्सा सुनाया. दरअसल राजपाल की शादी काफ़ी पहले हो गई थी. उससे उनकी एक बेटी भी है. अब इस बेटी की शादी भी हो गई है. आगे चलकर राजपाल ने गुजराती मूल की कनाडा में रहने वाली लड़की राधा से शादी की. किस्सा ये है कि भारत भवन भोपाल से विभा मिश्रा शाहजहांपुर NSD (नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा) की तरफ से वर्कशॉप कराने आईं. इसी के तहत 'अंधेर नगरी चौपट राजा' प्ले हो रहा था. इसमें कृष्ण श्रीवास्तव बने थे राजा. राजपाल को गोवर्धन का रोल मिला था. फाइनल शो के दो दिन बचे थे. इसी वक़्त उनकी पहली पत्नी बेटी को जन्म देते समय गुज़र गईं. राजपाल उस वक़्त शाहजहांपुर में थे. वो डरते-डरते मलिक साहब के पास गए. उन्हें पूरी बात बताई. मलिक जी सोच रहे थे कि अब प्ले का क्या होगा? पर राजपाल का डेडिकेशन लेवल ऐसा था कि अपने गांव गए. पत्नी का दाहसंस्कार किया. दूसरे दिन सुबह मुंडे हुए सिर के साथ वापस हाज़िर हो गए. अगले दिन प्ले किया. चूंकि बाल नहीं थे सिर पर, तो ये उनके कैरेक्टर को और ज़्यादा सूट कर रहा था. शो शाहजहांपुर में हिट हो गया. यहीं से उन्होंने ठान लिया कि अब ऐक्टिंग में जाना है.
# BNA में एडमिशन के लिए स्कूटर गिरवी रख दी
विभा मिश्रा ने सलाह दी कि भारतेंदु नाट्य एकेडमी (BNA) में एडमिशन ले लो. ग्रैजुएशन पूरा करने के बाद 1992 में राजपाल ने लखनऊ के BNA से दो साल का एक्टिंग डिप्लोमा कोर्स किया. राजपाल बताते हैं कि जब वो लखनऊ पहुंचे, तब जाकर उन्हें बोलने का शऊर आया. वरना उन्हें 'श' और 'स' के बीच का फर्क तक नहीं पता था. BNA में एडमिशन के लिए राजपाल मलिक साहब के पास आए. वो राज के साथ लखनऊ गए. फॉर्म भरवाया. राज ने ऑडिशन दिया. सलेक्शन हो गया. पर एडमिशन के लिए 15000 की सॉल्वेंसी भरनी थी. माने कोई ऐसी चीज़, जिसकी वैल्यू 15000 रुपये की हो, उसे सिक्योरिटी के तौर पर रखना था. राजपाल यादव के घर में ठीक ठाक ज़मीन थी. पर उसके जरिए पोवायां तहसील से सॉल्वेंसी बनवानी पड़ती, जो कि एक लम्बी प्रकिया
थी. इन लोगों के पास बस दो सप्ताह थे. इसलिए जब कुछ जुगाड़ नहीं बना, तो मलिक साहब ने अपने स्कूटर की सॉल्वेंसी दी.
# NSD में एडमिशन पाने के लिए रिवॉल्वर इस्तेमाल करना पड़ा
BNA जैसा हाल ही NSD एडमिशन के दौरान भी हुआ. यहां 40,000 की सॉल्वेंसी भरनी थी. अबकी सिर्फ एक सप्ताह का समय था. मलिक साहब के पास इस बार कुछ 40 हज़ार की कीमत का नहीं था. इसलिए उन्होंने अपने एक दोस्त की रिवॉल्वर के कागज़ सॉल्वेंसी बनवाने में नत्थी किए. पर यहां एक पेंच फंसा. तहसीलदार ने कहा कि सॉल्वेंसी के लिए कोई अचल सम्पत्ति होनी चाहिए. पर अचल कुछ ऐसा था नहीं. इसलिए मलिक साहब ने कुछ न कुछ करके तहसीलदार को ‘धमकाया’ और तब जाकर सॉल्वेंसी बनी. राजपाल का एडमिशन हुआ. उस वक़्त राजपाल NSD में सलेक्ट होने वाले यूपी से इकलौते थे. 1994 में एडमिशन लिया. 1997 में पास आउट हो गए.
# मेस का खाना अच्छा नहीं लगा, तो रैंडम शादी में खाने चले गए
राजपाल के NSD के क्लासमेट दौलत वैद बताते हैं,
“हम लोग मेस के खाने से परेशान हो जाते थे. पास ही में हिमाचल भवन था. वहां शादियां होती थीं. हम बढ़िया तैयार होकर हैट लगाकर जाते, क्योंकि मेरे, राजपाल और जसपाल तीनों के बाल लम्बे थे. दूल्हे के पास जाकर उसे बधाई देते. उससे कहते कि हम आपकी शादी में मिठाई खाने आए हैं. ऐसे ही हमारे यहां की होली बहुत फेमस थी. कई सीनियर भांग बनाते और हमने फर्स्ट इयर में बहुत भांग पी ली थी. चूंकि हमें आइडिया नहीं था. उसके बाद हमारी हालत खराब हो गई थी."
# नवाजुद्दीन जैसे सीनियर STD फोन की एक्टिंग कराते थे
वैद आगे कहते हैं,
"नवाज़ वगैरह हमारे सीनियर थे. ये हमारी रैगिंग नहीं करते थे. बल्कि हमसे कुछ न कुछ क्रिएटिव करवाते थे. जैसे कभी देर हो जाए आने में. हम कहें कि एसटीडी बूथ गए थे तो वो कहते थे एसटीडी फोन बनकर दिखाओ और ये भी करो, जब उससे बिल निकलता है."
NSD में पढ़ने दौरान शाहजहांपुर के साथियों ने उनसे एक वर्कशॉप करने की गुज़ारिश की. इस दौरान राजपाल अपने शहर गए. एक महीने वहां रुके. वहां ' यहूदी की लड़की ' नाम का प्ले करवाया.
# बज्जू भाई के प्ले में राजपाल ने रुला दिया था
NSD के डायरेक्टर राम गोपाल बजाज उन्हें करमखोर कहते थे. दरअसल NSD में रात 10-10:30 बजे के बाद नौजवान लड़के-लड़कियां अपने-अपने पार्टनर के साथ हो लेते थे. फिर बजाज बचे हुए लोगों से कहते-"जो जा रहे हैं जायें. बाक़ी जितने करमखोर हैं, वो करमबोड खेलें आकर." बजाज करमखोर उन लोगों को कहते थे, जो सिंगल थे. जिनकी कोई गर्लफ्रैंड या बॉयफ्रैंड नहीं था. बजाज राजपाल यादव को बहुत सीरियस और सिंसियर ऐक्टर मानते हैं. राजपाल ने बज्जू भाई के डायरेक्ट किये प्ले 'पाप और प्रकाश' में एक बहुत महत्वपूर्ण किरदार किया था. इसमें उन्होंने सबको रुला दिया था.
# मिमिक्री के उस्ताद
NSD के उनके टीचर देवेन्द्रराज अंकुर जो बाद में निदेशक बने , वे राजपाल को बहुत अच्छा अभिनेता और इंसान मानते हैं. वो बताते हैं कि राजपाल मिमिक्री में उस्ताद थे. वो सबकी मिमिक्री कर देते थे. अक्सर टीचर्स की भी करते थे. उनके सीनियर राजीव गौड़ कहते हैं कि वो विदेशी छात्रों की भी मिमिक्री कर दिया करते थे.
# "उसे एक सीन का रोल भी देंगे, तो वो उत्सव की तरह करता है”
राजपाल कहते हैं,
“हमेशा से बेहतर करने की आदत है. उदाहरण देता हूं. मेरे बैच का नाटक हो रहा था, 'जनमेजय का नाग यज्ञ'. इसमें कश्यप ऋषि का मेरा चार सीन का रोल था. उसमें एक तरीके से एक्सपेरिमेंट किया था मैंने. पूरे बैच के लिए फाइनल में 42 कॉस्ट्यूम, 50-55 प्रॉपर्टी. निर्देशक रॉबिन दास ने कहा-'राजपाल का कॉस्ट्यूम वही रहेगा, बाक़ी सबके नए बनेंगे.”
उनके NSD और मुंबई के दिनों के साथी संजय सिंह सोनू भी इसकी गवाही देते हैं. वो कहते हैं,
“राजपाल का बहुत छोटा सा रोल था. पर पता नहीं कहां से उसने इतने कॉस्टयूम वगैरह जमा कर लिए थे. एक छोटे रोल को बहुत बड़ा बना दिया था. उसे एक सीन का रोल भी देंगे, वो उत्सव की तरह करता है. ”
# राजपाल का घर नवाज़ समेत कई एक्टर्स का ठिकाना हुआ करता था
NSD पासआउट होने के तुरंत बाद वे मुंबई पहुंच गए. वहां वनराई कॉलोनी में रहते थे. नवाज़ ने भी अपने एक इंटरव्यू में बताया है,
"मनोहर तेली, मनोज गोयल, राजपाल यादव और अशरफ इन चारों ने अपने-अपने घर से बर्तन मंगा लिए... पासआउट होने के तुरंत बाद मुंबई पहुंच गए."
दरअसल इन लोगों ने विदेश में एक प्ले किया था ‘अभिज्ञान शाकुंतलम.’ इससे इन लोगों को खूब पैसा मिला. इसलिए भी ये लोग तुरंत मुंबई चले गए थे वैद बताते हैं कि राजपाल का घर हमारा ठिकाना था.. नवाज भी वहां जाया करते थे. हम कभी भी मुंबई जाते, तो उनके यहां ही रुकते थे. राजपाल अलग भी हो गए, तब भी उसी के घर हम सबका खाना बनता था. ज्यादातर तहरी बना करती थी. उस दौर में विजय राज, आशुतोष राणा, नवाज सब आसपास ही रहते थे. इनमें से किसी के घर में जमावड़ा लग ही जाता था.
# कमरे में चूहा घुस आता तो मारते नहीं थे, एक घंटा दौड़ाते थे
उस जमाने में चार -पांच लोग एक ही फ़्लैट में रहते थे. सबका एक ही पेजर था. पता नहीं चलता था कि पेजर पर किसके लिए मैसेज आया है. तो फ़ोन पर ये लोग पूछते थे कि किसके लिए मैसेज है, हम यहां पांच लोग हैं. तो उधर से सबको बुला लिया जाता था. संजय सिंह सोनू कहते हैं,
"मान लीजिए कभी किसी रोल के लिए कम रुपए मिल रहे हों - हम कैरेक्टर की कॉस्टयूम पहन भी चुके हों, तो कॉस्टयूम उतरकर भाग आते थे कि इतने कम पैसे में नहीं करेंगे. कम से कम 500 तो मिले होंगे.
वे राजपाल की व्यक्तित्व की एक बात बताते हैं,
“राजपाल शुरू से ही बहुत शैतान और चुलबुले थे. इनके रूम में चूहा घुस आता तो ये मारते नहीं थे. झाड़ू लेकर उस चूहे को पूरे रूम में घंटे भर तक दौड़ाते थे. जब चूहा थक जाता तो तब खिड़की खोल देते थे और चूहा निकल जाता था."
# जब राजपाल ने कहा - "मुझे जॉनी लीवर बनना है”
मुंबई में स्ट्रगल के दिनों में यशपाल शर्मा से उनकी कई बार मुलाकात होती थी. यशपाल याद करते हैं,
"एक बार ‘राजपाल ने मुझसे कहा-’मैं जॉनी लीवर बनना चाहता हूं.' मैंने बहुत तेज़ उसे डांटा कि तुम्हें राजपाल यादव क्यों नहीं बनना है? इसके बाद उसे कुछ समझ आया. आज भी वो इस बात को मानता है."
# चार्ली चैप्लिन की 'द ग्रेट डिक्टेटर' देखी और बौरा गए
‘राजपाल जॉनी लीवर के बहुत बड़े फैन हैं. एक समय था जब जॉनी हर फिल्म का हिस्सा होते थे. उनके तिलिस्म को राजपाल ने ही तोड़ा. राजपाल चार्ली चैपलिन को अपना आदर्श मानते हैं. उन्होंने 90 के दशक में चैप्लिन की फ़िल्म ’द ग्रेट डिक्टेटर' देखी. उसके बाद चैप्लिन को चाट डाला. और ऐसा चाटा कि कभी उनका कोई अक्स खुद में आने नहीं दिया. कॉपी नहीं किया किसी को कभी.
# स्क्रिप्ट में डायलॉग नहीं होते थे, बस लिखा होता था- राजपाल
टीवी पर पहला काम मिला - "स्वराज." 1997 में दूरदर्शन पर आया. इसमें उनकी कास्टिंग एक तरह से NSD के दौरान ही हो गई. मंजू सिंह नाम की निर्माता इसे बना रही थीं. उन्होंने राजपाल से कहा, "मुंबई आओ तो मुझे मिलो”. वहां गए, एक एपिसोड में इंदुभूषण का रोल मिला. इंदुभूषण काकोरी काण्ड में बिस्मिल और अशफाक के साथी थे. आगे राजपाल ने पंकज कपूर के साथ 'मोहनदास' में काम किया. इसमें पंकज के साथ नवाज़ुद्दी सिद्दीकी और आदित्य श्रीवास्तव जैसे एक्टर्स भी काम कर रहे थे. फिर राजपाल तिम्मांशु धूलिया के 'नया दौर' में भी दिखाई दिए. सब छोटे-छोटे रोल थे. इसकी जब स्क्रिप्ट लिखी जाती, तो उसमें राजपाल के डायलॉग नहीं होते थे. बस लिखा होता था - राजपाल. स्वराज पहला सीरियल माना जाता है. पर उससे पहले भी संस्कृत के विद्वान भास के नाटक पर आधारित ‘स्वप्न वासवदत्तम’ में काम किया था. ये 1992 में दूरदर्शन पर प्रसारित हुआ.
# 'मुंगेरी के भाई नौरंगीलाल' में बड़ा ब्रेक मिला
उन्हें प्रकाश झा के सीरियल 'मुंगेरी के भाई तौरंगीलाल' में काम मिला. इसके लिए उनकी तरफदारी रामगोपाल बजाज ने की थी. दरअसल प्रकाश झा कोई ऐसा ऐक्टर चाहते थे जो मुंगेरीलाल के तौर पर रघुवीर यादव के निभाएं किरदार को मैच कर सके. उन्होंने NSD फोन किया. राम गोपाल बजाज ने राजपाल का नाम सजेस्ट किया.
# जिसकी शूटिंग में महिमा चौधरी मरते मरते बचीं, उससे डेब्यू हुआ
अगले डेढ़-दो साल तक राजपाल 5-6 टीवी शोज़ में छोटे-बड़े रोल्स में दिखाई दिए. मगर उन्हें मज़ा नहीं आ रहा था. वो ये करने मुंबई नहीं आए थे. उन्हें फिल्मों में काम करना था. इसी आइडिया के साथ राजपाल ने टीवी करना बंद कर दिया. 1999 में प्रकाश झा अजय देवगन, काजोल और महिमा चौधरी को लेकर 'दिल क्या करे' नाम की फिल्म बना रहे थे. इस फिल्म को अजय के पिता वीरू देवगन ने प्रोड्यूस किया था. ये वहीं फिल्म थी, जिसकी शूटिंग के दौरान महिमा चौधरी का भयंकर एक्सीडेंट हुआ. शूटिंग के लिए जा रहीं महिमा की कार को एक ट्रक ने टक्कर मार दी थी. इस एक्सीडेंट में महिमा के चेहरे में शीशे के 67 टुकड़े चुभ गए थे, जो डॉक्टरों ने निकाले. खैर, राजपाल यादव को इस फिल्म में एक स्कूल वॉचमैन का रोल मिला. ये उनके करियर की पहली फिल्म थी. 1999 में ही वो आफताब शिवदासानी की डेब्यू फिल्म 'मस्त' में एक चपरासी के रोल में दिखे. इसमें उनके बस दो तीन क्लोजअप हैं.
# इतने निराश हुअ कि मुंबई छोड़कर निकलने का मन बना लिया
ये कहा जाता है कि राजपाल यादव मुंबई से हारकर घर जाने का मत बना चुके थे. नवाज़ भी वहां मौजूद थे जब अनुराग ने राजपाल को समझाया कि घबराओ मत, हम कुछ रास्ता निकाल लेंगे. वहां इन लोगों ने अनुराग को देखा और लगा कि ये आदमी ज़रूर काम देगा. इसके वाद ही राजपाल और नवाज़ दोनों को 'शूल' में काम मिल गया.
हालांकि राजपाल के दोस्त संजय सिंह सोनू इस वात से इनकार करते हैं कि ऐसा कुछ नहीं हुआ था. राजपाल कभी मुंबई छोड़कर जाने वाले नहीं थे. वो कहते हैं-"वो तो हमेशा से यहीं रहना चाहता था. उसे काम भी खूब मिलने लगा था. राजपाल को कभी पैसे की तंगी नहीं थी. तंगी रही भी, तो उसने सबकी खूब मदद की. ” इसी मदद का उदाहरण देते हुए संजय कहते हैं कि राजपाल इस बात को स्वीकार नहीं करेंगे. लेकिन राजपाल ने जितनों की मदद की है, अगर वो उगाही करने पर आए तो कम से कम 5 से 6 करोड़ रुपए इकट्ठा कर लेगा.
# 'शूल' की शूटिंग करने पहुंचे , भीड़ नौरंगी-नौरंगी चिल्लाने लगी
चूंकि फिल्म 'शूल' के पहले 'मुंगेरी के भाई नौरंगी' सीरियल आ चुका था. राजपाल को पूरा देश देख रहा था. पर उन्हें इस वात का इल्म नहीं था कि वे पॉपुलर हो चुके हैं. क्योंकि वे तो मुंबई में थे. वहां तब तक केवल टीवी आ चुका था. कोई दूरदर्शन देखता नहीं था. पर देश के अन्य भागों में दूरदर्शन तो था ही. 'शूल' का वो सीन शूट होना था जिसमें मनोज बाजपेयी पहली बार अपनी पोस्टिंग पर आते हैं. ये शूट था, उनके शहर बेतिया में. करीब दस हजार लोग वहां मौजूद थे. पर ये मनोज का आंकड़ा है. राजपाल ये आंकड़ा 5 लाख बताते हैं. और कहते हैं,
“50 थानों की पुलिस थी वहां. पहले सब मनोज और रवीना के लिए चिल्ला रहे थे. मुंबई का किंग कौन या फिर दूसरे डायलॉग. जैसे ही राजपाल यादव की एंट्री हुई, सब नौरंगी-तौरंगी चिल्लाने लगे. सेट पर लोग अचंभे में पड़ गए कि ये नौरंगी कौन है भई? तब मनोज ने बताया कि ये राजपाल हैं.”
मनोज ने GITN में भी बताया था,
"राजपाल को अनुराग कश्यप लेकर आया था. राज के पहले दो टेक में हम और रवीना अचम्भे में पड़ गए. वहां इतनी भीड़ थी. ऐसी ज़ोर-ज़ोर की आवाजें आ रही थी, लग रहा था दंगा हो गया.”
# रामगोपाल वरमा ने फिलम् के लिए बुलाया, मगर राजपाल नहीं गए
'शूल' का उनका कुली वाला रोल ‘ब्लिंक एंड मिस’ रोल था. जब रामू इस फिल्म का रफ कट देख रहे थे तो उन्हें राजपाल का काम नोटिसेबल लगा. उन दिनों रामू अपनी अगली फिल्म 'जंगल' बनाने जा रहे थे. वो इसमें राजपाल यादव को भी कास्ट करना चाहते थे. राजपाल तक खबर पहुंचाई गई. मगर राजपाल उनसे मिलने नहीं गए. दोबारा समन किया गया. फाइनली जब दोनों की मुलाकात हुई, तो रामू ने पूछा कि वो बुलाने पर मिलने क्यों नहीं आए? इसके जवाव में राजपाल ने कहा कि उन्हें लगा कि रामू की फिल्म में उनके लायक क्या रोल होगा! फिल्म का नाम ‘जंगल’ है, ये सुनकर राजपाल यादव ने खुद को रिजेक्ट कर लिया. क्योंकि उन्हें लगा कि इस फिल्म में लंबे-चौड़े एक्टर्स को कास्ट किया जाएगा. मगर इस मीटिंग के बाद ही राजपाल को सिप्पा के रोल में कास्ट कर लिया गया. जोकि एक नेगेटिव कैरेक्टर था. लेकिन वो किरदार फिल्म के बाकी किरदारों पर हावी रहा.
# 'जंगल' के लिए बेस्ट एक्टर का अवॉर्ड मिला तो रोने लगे
साल 2007. स्टार स्क्रीन अवॉर्ड्स चल रहे थे. जैसे ही बेस्ट एक्टर इन नेगेटिव रोल की घोषणा हुई. राजपाल यादव स्टेज पर पहुंचे. भावुक होकर जनता के सामने मत्था टेका. रोते-रोते अवॉर्ड स्वीकार किया और हिंदी में अपनी एक्सेप्टेंस स्पीच दी. राजपाल को ये अवॉर्ड राम गोपाल वर्मा के डायरेक्शन में बनी फिल्म ' जंगल ' के लिए मिला था. ये ऑफिशियली राजपाल के करियर की पहली फिल्म थी, जिसके लिए उन्हें क्रेडिट मिला. फरदीन खान और उर्मिला मातोंडकर स्टारर 'जंगल' में उन्होंने सिप्पा नाम का किरदार निभाया था. जो वाइल्ड कैरेक्टर था.
# ‘हंगामा’ ने राजपाल को स्टार बना दिया
राजपाल यादव को 'जंगल' के बाद खूब काम मिलने लगा. 'जंगल' की रिलीज़ के बाद कुछ ही समय में उन्होंने 20 से ज़्यादा फिल्में साइन कर लीं. इसमें ‘प्यार तूने क्या किया’, ‘चांदनी बार’, ‘कंपनी’ और ‘हासिल’ जैसी फिल्में शामिल थीं. मगर राजपाल बताते हैं कि उन्हें I have arrived वाली फीलिंग 2003 में 'हंगामा' करने के बाद आई. प्रियदर्शन के डायरेक्शन वाली इस फिल्म में राजपाल ने राजा नाम के लड़के का रोल किया था. यही वो फिल्म थी, जिसके बाद राजपाल की पहचान अच्छे कॉमेडी एक्टर की बन गई. फिल्ममेकर्स ने उन्हें बढ़िया पैसा देना शुरू किया. 2003 उनके करियर का बहुत महत्वपूर्ण साल रहा. इसी साल 'माधुरी दीक्षित बनना चाहती हूं' फिल्म आई जिसमें उनका लीड रोल था.
# मां ने राजपाल का कॉमेडी सीन देखा, तो उठकर चली गईं
राजपाल की फ़िल्में उनकी मां नहीं देखती थीं. ' हंगामा' जब मां ने पहली बार देखी, तो उठ कर चली गई. क्योंकि प्रियदर्शन की इस फिल्म के ज्यादातर सीन्स में उन्हें पीटा जा रहा है. इसके बाद राज ने उनको ये कहकर शांत कराने की कोशिश की,
"अम्मा, ये वास्तविक नहीं है, रील है. सीन के बाद दोनों एक-दूसरे के गले मिले. मैंने उनसे कहा कि फिल्म में इस तरह के दृश्य हैं, ताकि फिल्म हिट हो जाए. ”
# ‘मैं मेरी पत्नी और वो’ राजपाल की कहानी है?
जब 'मैं मेरी पत्नी और वो' आई तो किसी ने पूछा कि क्या ये आपकी खुद की फिल्म है क्या? क्योंकि इस फिल्म की कहानी भी ऐसी है कि एक छोटे कद का आदमी, लम्बे कद की लड़की से शादी कर लेता है. इस पर राजपाल कहते हैं कि उनकी पत्नी तो उनके साथ जाते हुए भी हील नहीं पहनती. क्योंकि उसे लगता है कि मैं लम्बी दिखूंगी.
# नसीरुद्दीन शाह ने कहा- वो रघुबीर यादव से ऊपर है
'मैं, मेरी पत्नी और वो' में नसीरुद्दीन शाह भी हैं. उन्होंने राजपाल को NSD में पढ़ाया भी है. वो राजपाल के बारे में कहते हैं,
"कद-काठी, चेहरे-मोहरे की कमजोरी को ही उसने ताकत बना लिया है. ये छोटी उपलब्धि नहीं. उसमें नेटिव इंस्टिक्ट और एलर्टनेस कूट-कूटकर भरी हुई है. इस मायने में मैं उसे रघुबीर यादव, बोमन ईरानी और सतीश शाह से भी ऊपर रखता हूं."
# फिल्म के क्लाइमैक्स में चार घंटे तक रोते रहे
‘मैं, मेरी पत्नी और वो’ के क्लाइमेक्स सीन के लिए वे चार घंटे तक रोते रहे थे. राजपाल कहते हैं-"उसी का नतीजा है कि आज वैसे सीन की शूटिंग-डबिंग में ग्लिसरीन नहीं लगानी पड़ती. अच्छा लगता है कि बतौर एक्टर एक प्रोग्रेस हुई." ‘मैं मेरी पत्नी और वो’, 'माधुरी दीक्षित बनना चाहती हूं' के निर्देशक चंदन अरोड़ा बताते हैं,
"उनके अभिनय की रेंज इतनी व्यापक है कि वो निर्देशकों के सामने खुद को बेहतर ढंग से इस्तेमाल करने की चुनौती उछालते रहते हैं. ‘’
# ‘चुप चुपके’ में कॉमेडी सीन, करियर का सबसे मुश्किल काम
2006 में एक फिल्म आई थी 'चुप चुपके'. ये उनकी सबसे पॉपुलर फिल्मों में से है. इस फिल्म के कॉमेडी सीन्स को आज भी जिफ-मीम में यूज़ किया जाता है. इसमें एक सीन होता है जहां गूंगे शाहिद कपूर को पहली बार बोलते सुन कर राजपाल यादव का किरदार बंड्या भारी कंफ्यूज़ हो जाता है. राजपाल इसे अपने करियर का सबसे टफ सीन मानते हैं. क्योंकि यहां उन्हें जो रिएक्शन देना था उसमें उन्हें चौंकना भी था, रोना भी था, हंसना भी था और कन्फ्यूज भी होना था. उन्होंने शायद एक टेक में कर दिया था लेकिन कहते हैं कि अगर आज वो सीन दोबारा करने को कहा जाए तो शायद वैसा न कर पाऊं.
# सेट पर फैंसी बाल कटाकर पहुंचे , प्रियदर्शन ने कटोरा कट करवा दिया
प्रियदर्शन ने 'चुप चुपके' की शूटिंग के लिए राजपाल यादव से 40 दिन का समय मांगा था. राजपाल को लगा कि चलो फाइनली कोई बड़ा रोल उनके खाते में आया. वो प्रियदर्शन की फिल्म के सेट पर पहुंचने से पहले सेलेब्रिटी हेयर-स्टाइलिस्ट आलिम हकीम के यहां पहुंचे. बढ़िया फैंसी स्टाइल में बाल कटाया. इसके बाद वो पहुंचे 'चुप चुपके' के सेट पर. यहां पहुंचते ही प्रियदर्शन ने राजपाल के बाल कटोरा कट स्टाइल में कटवा दिए.
# जब प्रियदर्शन ने कहा - "कमाल का एक्टर है वो”
फिल्मों में शायद प्रियदर्शन ने उन्हें सबसे अच्छा इस्तेमाल किया है. वो तो जैसे उन पर फिदा हैं. वे कहते हैं,
"कमाल का एक्टर है वो. उसका चेहरा, अभिनय सब कुछ इतना पारदर्शी और नैसर्गिक है कि रत्ती भर भी बनावटी नहीं लगता. और आत्मविश्वास इतना गजब का कि सामने अमिताभ बच्चन हों या शाहरुख खान, मजाल है कि शिकन आ जाए!”
दरअसल, कौन बनेगा करोड़पति में अमिताभ के सामने उनकी नैसर्गिक सहजता से ही प्रियदर्शन पहली दफा उनसे प्रभावित हुए थे.
# मलेशिया गए तो कसीनो में एक पिछलग्गू को ऑब्जर्व करने लगे
परेश रावल ने 2005 में राजपाल यादव के बारे में कहा था,
"उसकी ऑब्ज़्वेशन का आलम ये है कि वो जिस किसी का भी हुलिया धर ले, वहीं किरदार आपको अपने आसपास का लगने लगता है. इतना दावे के साथ कह सकता हूं कि इस बंदे को कोई रोक नहीं सकता. बहुत दूर तक जाएगा ये."
राजपाल हर जगह अपनी ऐक्टिंग की क्लास करते रहते हैं. हर जगह से वो कुछ न कुछ उठाना चाहते हैं. इसका उदाहरण है. एक बार वो अपनी पत्नी राधा के साथ मलेशिया की सैर पर गये थे. पत्नी कहती हैं,
"वहां कसीनो में एक पिछलग्गू पर उन्होंने नजरें गड़ा दीं. बोले, ये ऑब्जर्वेशन कभी किसी किरदार में काम आ जाएगी.”
# 'अर्ध' में ऐसे एक्टर का रोल किया जो ट्रांसजेंडर बनकर भीख मांगता है
कॉमेडी फिल्में करते हुए भी एक अलग तरह के पैरलल सिनेमा के लिए जगह और समय निकाला. तभी तो उन्होंने मुख्य भूमिका वाली चुनिंदा फिल्में छांटीं. इनमें से एक सिक्योरिटी गार्ड की प्रेम कहानी वाली दिलीप शुक्ल निर्देशित 'हलो, हम लल्लन बोल रहे हैं' उनके दिल के बहुत करीब है. अजीज़ खान की 'अंडर्ट्रायल' में बहुत खतरनाक किरदार किया है. इसमें उन्होंने ऐसे पिता का रोल निभाया है, जो अपनी बेटियों का ही रेप का आरोपी है. दरअसल इस किरदार पर झूठा इल्ज़ाम लगा होता है, जो बाद में साबित हो जाता है. क्रिटिकली देखें तो ये थोड़ी अपरिष्कृत-सी फिल्म थी. इसके अलावा कौशल-मुजीज्ञ की 'टारगेट' , रजत मुखर्जी की 'लाइलाज' , 'माखन' , 'यू हैव अ राइट' उसी कड़ी का हिस्सा हैं. गंभीर मजमून वाली फिल्में. ऐसी ही दो और फ़िल्में. एक 2014 में आई भोपाल गैस त्रासदी पर बनी उनके पहली हॉलीवुड फिल्म ‘भोपाल: अ प्रेयर फॉर रेन.’ इसमें उनके साथ मार्टिन शीन जैसे कलाकार थे. राजपाल ने इस फिल्म में फैक्ट्री वर्कर की भूमिका निभाई थी. दूसरी फिल्म है, 2022 में आई ‘अर्ध.’
# पहली डायरेक्टोरियल फिल्म के लिए लोन लिया , जेल जाना पड़ा
राजपाल की 2012 में ‘अता पता लापता’ नाम की एक फिल्म आई थी. फिल्म बनाने के लिए उन्होंने बिजनेसमैन माधौ गोपाल अग्रवाल से पांच करोड़ रुपये लिए. फिल्म रिलीज होने के बाद होने वाली कमाई से उनको आठ करोड़ वापस करने थे. लेकिन फिल्म रिलीज होने से पहले ही अग्रवाल ने रिलीज पर कोर्ट से रोक लगवा दी. 5 महीने के बाद कोर्ट ने फिल्म रिलीज करने का ऑर्डर दिया. फिल्म चली नहीं, उसमें घाटा हो गया. फिल्म पर रोक लगवाने के बाद राजपाल यादव और माधौ गोपाल के बीच विवाद हो गया. राजपाल पर आरोप लगा कि उन्होंने कम्पनी को 7 पोस्ट डेटेड चेक दिए थे, जो बाद में बाउंस हो गए.
इसी मामले में दिल्ली की कड़कड़डूमा कोर्ट ने राजपाल यादव को 6 महीने की सजा सुनाई. इस पर राजपाल दिल्ली हाईकोर्ट गए. हाई कोर्ट ने उनकी कंपनी द्वारा लिए गए 5 करोड़ रुपए का लोन न चुका पाने पर तीन महीने के लिए जेल भेज दिया. इससे पहले भी 2013 में यादव को एक मामले में झूठा हलफनामा दायर करने के लिए 3 दिसंबर से 6 दिसंबर तक तिहाड़ जेल भेज दिया गया था. बाद में पत्रिका को दिए एक इंटरव्यू में राजपाल यादव ने बताया,
"मेरे साथ बहुत बड़ा विश्वासघात किया गया. मुझे अपने बेटे जैसा और मेरे परिवार को अपना परिवार जैसा बताकर पैसे लगाने की बात कहते हुए उन्होंने मुझसे एग्रीमेंट साइन करवा लिया. मुझसे कहा गया कि जो बात हुई है वही एग्रीमेंट में लिखी है. लिहाजा मैंने पढ़े बगैर ही उस पर साइन कर दिए. "
जेल में कैदियों को एक्टिंग सिखाते थे: राजपाल जेल में भी ऐक्टिंग ही कर रहे थे. वो कहते हैं,
“जेल में मौजूद लोगों से बातचीत करता था. उनके साथ एक्टिविटी में भाग लेता था. जब मैं फिल्म की शूटिंग कर रहा होता था और गांव जाना पड़ता था तो मैं वहां के लोगों से भी बातचीत करता था. यह चीजें आपको जिंदगी में नई चीजें सिखाती हैं. जेल के अंदर मैंने राजू की पाठशाला बनाई थी. जहां मैं लोगों को एक्टिंग सिखाता था. मैं इस प्लान को दूसरे शहरों में भी ले जाना चाहता हूं. ”
# अपने गुरुओं को अमिताभ बच्चन के हाथों सम्मानित करवाया
‘अता पता लापता’ के म्यूजिक लॉन्च में राजपाल ने अपने सभी गुरुओं को बुलाया था. इसमें बज्जू भाई थे. शाहजहांपुर से मलिक साहब भी थे. लखनऊ से जुगल किशोर और उर्मिल कुमार थपलियाल थे. उनके दोस्त कृष्णकुमार श्रीवास्तव थे. और भी कई लोग थे. इनको सबको उन्होंने अमिताभ बच्चन के हाथों सम्मानित करवाया था. कृष्ण कुमार और मलिक साहब राजपाल की बहुत ज़्यादा तारीफ करते हैं. कहते हैं, वो ऐक्टर तो अच्छे हैं. पर इंसान उससे ज़्यादा अच्छे हैं. घमंड नाममात्र का भी नहीं है. अपने दोस्तों से आज भी बात करते हैं.
# 2010 के बाद अच्छी फ़िल्में मिलनी बंद हो गई थीं
‘अता-पता लापता’ के बाद राजपाल को कई बरस तक वैसे किरदार नहीं मिले जो दिमाग में छप जाएं. कहते हैं कि राजपाल उस समय इस फिल्म में इतना व्यस्त हुए कि अन्य सारे काम छोड़ने लगे. फिर कोर्ट का चक्कर हो गया. इन्हें जेल जाना पड़ा. पैसे की भी बड़ी समस्या आन पड़ी. यशपाल शर्मा बताते हैं कि इस एक फिल्म के घटनाक्रम से उबरने में राजपाल को बहुत समय लगा. आप उनके करियर को भी देखेंगे तो 200 के बाद ‘अता-पता लापता’ का प्रोडक्शन जब से शुरू होता है. तभी से अच्छी फ़िल्में उन्हें नहीं मिलीं. शायद ऐसा भी कह सकते हैं कि प्रियदर्शन की फिल्में नहीं मिलीं. हाल ही में ‘कटहल’ आई है. इसमें उनका अच्छा रोल है. 'अर्ध' में भी बढ़िया काम है. पिछले साल ‘थाई मसाज’ में भी.
# पॉलिटिकल पार्टी भी बनाई, राजनीति की तरफ रुझान
2016 में सर्व सम्भाव पार्टी बनाई. 2017 में सभी 403 सीटों पर चुनाव लड़ने की भी ठानी. कहते हैं कि पहले सपा से टिकट मांगा. नहीं मिला तो ऐसा किया. इसके बाद जेल जाना पड़ा. लोन लेने वाले केस में 3 महीने की सजा मिली, जिसके बाद पार्टी भी सपना ही रह गई. अभी बस पार्टी रजिस्टर्ड है, लेकिन कुछ काम नहीं करती. बड़े भाई श्रीपाल यादव इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष थे. 2021 में खबर आई थी कि पीलीभीत से चुनाव लड़ सकते हैं. वैसे राजनीति का बचपन से ही शौक था. 15-16 साल की उम्र में चुनाव हुए, तो खूब पोलिंग बूथ पर पर्चियां काटी.. पर आगे चलकर मोह भी भंग हुआ. हालांकि लगातार राजनीति में आने की कोशिश करते रहते हैं.
# आशुतोष राणा के घर राजपाल की शादी हुई थी, दोनों के गुरु सेम
राजपाल यादव ने 2003 में राधा से शादी की थी जो उम्र में उनसे 9 साल छोटी हैं. हालांकि पहली पत्नी की मौत के बाद राजपाल दूसरी शादी नहीं करना चाहते थे लेकिन कनाडा में 'द हीरो' की शूटिंग के दौरान उनकी मुलाकात राधा से हुई. तो दोनों ने शादी करने फैसला किया. कनाडा में राजपाल और राधा की मुलाकात एक कॉमन फ्रेंड के जरिए हुई थी. राधा इंटीरियर डिजानर हैं. कनाडा छोड़कर मुंबई आ गईं. अब दो बेटियां हैं. चूंकि राधा का कोई घर मुंबई में नहीं था. इसलिए सारे कार्यक्रम आशुतोष राणा (बहन का घर भी, कई लोग बताते हैं) के घर हुए थे. आशुतोष उस समय लड़की वालों की तरफ से थे. आप शादी की तस्वीरें देखेंगे, तो आशुतोष उसमें मिलेंगे. किसी मन्दिर में शादी हुई थी. वहां आशुतोष के गुरु दद्दा जी भी आए थे. ये राजपाल के भी गुरु हैं. राजपाल दद्दा जी को बहुत मानते हैं. उन्होंने दद्दा जी का सवा लाख शिवलिंग वाल यज्ञ भी अपने गांव में करवाया. कुम्भ में भी हिस्सा लिया. अब दद्दा जी नहीं हैं. इसलिए उनकी स्मृति में पांच करोड़ शिवलिंग बनाकर उनका पूजन करने का प्लान बन रहा है.
राजपाल फ़िलहाल तिहाड़ जेल में बंद हैं. उन पर 9 करोड़ रुपये का कर्ज़ है. फिल्म इंडस्ट्री से सलमान खान, अजय देवगन, सोनू सूद, गुरमीत चौधरी, वरुण धवन, डेविड धवन, केआरके, आर माधव और म्यूजिक प्रोड्यूसर राव इन्द्रजीत सिंह उनकी मदद के लिए आगे आए हैं. राजपाल के वकील ने कोर्ट में बेल की अर्ज़ी डाली है. उनके मैनेजर का कहना है कि वो जल्द ही जमानत पर बाहर आ जाएंगे.
वीडियो: राजपाल यादव की फिल्म 'अर्ध' का रिव्यू


















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