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'न्यूटन' की मलको के नाम ओपन लेटर वाला खुला ख़त

बहुत सी उम्दा अभिनेत्रियां हुई हैं, जिन्हें समय-समय पर चाहा-सराहा है. स्मिता पाटिल से लेकर काजोल तक. मधुबाला से लेकर दिव्या दत्ता तक. पर कभी मन नहीं किया किसी को ख़त लिखने का.

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नामाबर तू ही बता तूने तो देखे होंगे, कैसे होते हैं वो ख़त जिनके जवाब आते हैं...

मलको,

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ख़तों में संबोधन का चलन है लेकिन कई बार इस डिपार्टमेंट की कंगाली तकलीफ देती है. अजनबियों के लिए संबोधन उपलब्ध हैं. प्रियजनों के लिए तो भरमार है लेकिन उन लोगों के लिए कोई सटीक संबोधन नहीं है, जो अपने से लगते हैं, पर आपको नहीं जानते. ऐसे आत्मीय अजनबियों को 'प्रिय' लिखना शिष्टाचार के खिलाफ़ जाता है और नीरस सा 'डियर' लिखना ज़हन गवारा नहीं करता. तो ये ख़त बिना किसी संबोधन के ही शुरू होगा.

बताना ये है कि मैं 'न्यूटन' देखने गया था. लौटा 'मलको' देखकर. राजकुमार और पंकज त्रिपाठी जैसे कद्दावर अभिनेताओं की मौजूदगी के बावजूद मेरे साथ घर सिर्फ तुम आई. शायद इसलिए कि राजकुमार 'न्यूटन' भी है, 'शाहिद' भी है और 'प्रीतम विद्रोही' भी. पंकज त्रिपाठी तो न जाने क्या-क्या हैं. तुम सिर्फ मलको हो. अंजलि पाटिल भी नहीं.

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अब ऐसे हाल में क्या खाक़ गुफ्तगू होगी, कि एक सोच में गुम है तो दूसरा खामोश..
अब ऐसे हाल में क्या खाक़ गुफ्तगू होगी, कि एक सोच में गुम है तो दूसरा खामोश...

बहुत सी उम्दा अभिनेत्रियां हुई हैं, जिन्हें समय-समय पर चाहा-सराहा है. स्मिता पाटिल से लेकर काजोल तक. मधुबाला से लेकर दिव्या दत्ता तक. पर कभी मन नहीं किया किसी को ख़त लिखने का. जब हम फिल्म देखने गए थे तो मेरे दोस्त ने कहा था कि हमें फ़िल्म की समीक्षा लिखनी चाहिए. जब लौटा तो ये मुश्किल लगा.

समीक्षा लिखता भी तो वो तुम पर निबंध ही होता. ये बात मुझे उसी वक़्त महसूस हो गई थी, जब जंगल की उस पगडंडी पर तुम न्यूटन से विदा लेकर चली गई थी. बिना किसी औपचारिक बाय-शाय के. मेरे लिए तो फिल्म वहीं ख़त्म हो गई थी. बहुत बुरा लगा था. लगा, फिल्म खत्म होने से पहले तुम्हारा जाना बनता ही नहीं था. इसीलिए जब क्लाइमैक्स में तुम न्यूटन से अचानक मिलने आई तो उससे ज़्यादा मैं खिल गया.

इक इसी सोच में गुम हो गए कितने मौसम, उनसे हम हाल ज़ुबानी ही कहें या लिक्खें?
इक इसी सोच में गुम हो गए कितने मौसम, उनसे हम हाल ज़ुबानी ही कहें या लिक्खें?

कई लोग होंगे जो मेरी पसंद पर सवाल करेंगे. कहेंगे कि इससे उम्दा तो वो है, ऐसा क्या है इसमें वगैरह-वगैरह! मैं समझा नहीं पाऊंगा. ज़रूरत भी क्या है! कई बार उन चीज़ों में भी एक तरह का उन्मादी आनंद होता है, जो न आप खुद समझ सकते हैं, न किसी को समझा सकते हैं.

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ख़त लिख तो रहा हूं लेकिन ऐसा लगता है ये सारे शब्द घिसे हुए हैं. बार-बार चबाकर बेस्वाद हो चुके. किसी बेहद ख़ास के लिए नए शब्द गढ़ने का सिस्टम होना चाहिए. ऐसे शब्द, जो किसी की भी पकड़ाई से बाहर हो. थिरकते पारे की तरह. सियाह रात के माथे पर सजे तारे की तरह. ख़ूबसूरत से लेकिन किसी की भी मिल्कियत के ठप्पे से आज़ाद.

मेरे आसपास शब्दों के जादूगरों की भीड़ रहती हैं. ये लोग शब्दों से खेलते हैं. अपनी मनमर्ज़ी से. मैं कई बार असहाय महसूस करता हूं. उन्हीं रटे-रटाए शब्दों को तस्बीह के दानों की तरह पलट-पलट कर थक भी जाता हूं. उलझन होने लगती है लेकिन फिर ये ख़याल आता है कि परफेक्शन किस शख्स के मुकद्दर में लिखा है? तो बरायमेहरबानी इन्हीं लफ़्ज़ों से काम चला लो.

मौसमे बहार सजदा करे सुबह-ओ-शाम तुझे, अलावा मुस्कुराने के न रहे कोई काम तुझे...
मौसमे बहार सजदा करे सुबह-ओ-शाम तुझे, अलावा मुस्कुराने के न रहे कोई काम तुझे...

फिल्म में तुम न्यूटन का लव इंटरेस्ट नहीं थी. बस एक साथी थी. एक खास मुहिम में मददगार. इसके अलावा कुछ थी, तो उस पिछड़े इलाके की सशक्त, मुखर प्रतिनिधि. न्यूटन जिस नाइंसाफी से हक्का-बक्का है, उसे रोज़ देखने का दावा करने वाली. जिस सहजता से तुमने अपने संघर्ष को महसूस करवाया, वो एक अभिनेत्री के रूप में तुम्हें आसमान पर बिठा देता है. वो भी बहुत कम लफ़्ज़ों में. कई बार तो लफ़्ज़ों के बिना भी.

एक जगह न्यूटन तुमसे पूछता है,

"क्या आप भी निराशावादी हैं?"

तुम्हारा जवाब था,

"मैं आदिवासी हूं."

मैं अंदर तक सहमत हो गया. मेरे अंदर का उपेक्षित फिलॉसफर उछल-उछल के कहने लगा कि सही तो बात है. हर वो शख्स आदिवासी है, जो न्याय की, बराबरी की असंभव उम्मीद लिए जी रहा है. है नहीं, तो समझा तो जाता ही है. एक अप्रासंगिक आत्मा, जो किसी और ही समयकाल में जिए जा रही है. उसकी आशा-निराशाओं से किसी को कोई लेना देना नहीं. बल्कि उसे इजाज़त ही नहीं है, किसी भाव को अपने वजूद पर हावी होने देने की. उसका होना तभी सार्थक है, जब वो आदिवासी बना रहे.

जब पता चला तुम महाराष्ट्रियन हो, तो मेरे अंदर का मराठी मुलगा थोड़ा एक्स्ट्रा खुश हो गया. सोच ने उड़ान भरी कि कभी अगर बात करना मुमकिन हुआ, तो हम क्या बात करेंगे? पु. ल. देशपांडे की किताबों पर या कुसुमाग्रज की कविताओं पर. या उस शहर के बारे में जहां मैं पैदा हुआ और तुमने पढ़ाई की. क्या पुणे के 'बालगन्धर्व' में कोई नाटक साथ देखा जा सकता है? खैर...

'न्यूटन' में तुम जिस भी फ्रेम में आई, तुम्हारी आवाज़ ने ऊंचा सुर नहीं पकड़ा. उत्तेजना के क्षणों में भी तुमने शाइस्तगी बरकरार रखी. लखनऊ वाले तुम्हारे बोलने के ढंग को मुहज़्ज़ब लहज़ा कहेंगे. मैं यूं ही लाउड थिंकिंग कर लेता हूं कि तुम अगर कभी किसी पर चिल्लाओगी, तो वो नज़ारा कैसा होगा? या तुम्हें चिल्लाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती? बोलती आंखों से ही काम चल जाता है?

मैंने अपनी ज़िंदगी में कभी ऐसा नहीं किया कि किसी के लिए सिनेमा के परदे की फोटो खींच ली हो. तुम्हारी खींची मैंने. मेरे साथ गए आधा दर्जन लोगों ने तबसे मेरी जान खा रखी है कि मैं 'न्यूटन' नहीं, मलको देखने गया था.

जब तक रहे तू, यूं रहे कि तू ही तू रहे, जब तू न रहे तब भी तेरी गुफ्तगू रहे...
जब तक रहे तू, यूं रहे कि तू ही तू रहे, जब तू न रहे तब भी तेरी गुफ्तगू रहे...

लिखा तो बहुत कुछ जा सकता है. तुम्हारे इंटरनेशनल करियर से लेकर तुम्हें मिले नेशनल अवॉर्ड तक. लेकिन थम जाता हूं. न्यूटन देखकर घर लौटते समय तुम्हारा फेसबुक पेज खोज निकाला था. वहां एक इंटरव्यू देखा तुम्हारा. उसमें एक जगह तुम कहती हो कि फ़िल्में तुम्हारा रोज़गार नहीं, शौक़ है. इसलिए तुम सिलेक्टिव ही फ़िल्में करती रहोगी. इस बात से मुझे बेहद तसल्ली मिली.

सिलेक्टिव ही रहना बाबा तुम! मैं नवाज़ जैसे एक्टर को 'फ्रीकी अली' जैसा वाहियात रोल करते देखकर ख़ून के आंसू रो चुका हूं. ऐसा कोई सदमा तुम न देना प्लीज़. कुछ दमदार ही करती रहना. थोड़ा स्वार्थी होकर कहूं तो अगर तुमने सिर्फ यही एक फिल्म की होती तो भी चल जाता. अभिनेत्रियों से भरा पड़ा है बॉलीवुड. मलको को तरसते हैं हम. बनी रहना मलको.
ढेर सारा प्यार!

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