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2018 की इन 10 खबरों ने हर किसी का दिल जीत लिया

देखें कि इस साल क्या-क्या अच्छा हुआ. इसीलिये आज हम लेकर आए हैं, साल 2018 की अच्छी बातें.

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फोटो - thelallantop

साल 2018 ख़त्म हो रहा है. सोमवार साल का आख़िरी दिन है. कुछ लोग लंबी छुट्टियों पर निकलने वाले होंगे, वीकेंड के प्लान बन चुके हैं. पुराने साल की विदाई के सबके अपने तरीके हैं, जो घर से बाहर रहना चाहते हैं, उन्होंने एडवांस बुकिंग्स करा ली होंगी, जो घर पर रहना चाहते हैं, उन्होंने करीबियों को 'न्यौत' दिया होगा. नए साल के लिए लोग अच्छा-अच्छा सोचते हैं. हैप्पी न्यू ईयर इसीलिए तो कहते हैं ताकि अगला साल सबके लिए अच्छा हो. लेकिन जाते हुए साल का क्या? उसकी विदाई का एक तरीका ये भी तो हो सकता है कि पूरे साल का एक क्विक रीकैप ले लें, देखें कि इस साल क्या-क्या अच्छा हुआ. इसीलिये आज हम लेकर आये हैं, साल 2018 की अच्छी बातें. वो बातें जिन्हें देख-सुनकर आपको अच्छा लगा हो.

मॉब लिंचिंग, वो शब्द जिसने हर किसी को डराया. लेकिन जिस समय ऐसे शब्द खबरों में आते हैं, ठीक उसी समय कुछ लोग, तमाम बुराइयों के खिलाफ उठ खड़े होते हैं. ऐसी ही ख़बर आई जब एक मुस्लिम लड़के को एक सब इंस्पेक्टर ने मॉब लिंचिंग से बचाया.
मॉब लिंचिंग का शिकार होने से बचाया था.
मॉब लिंचिंग का शिकार होने से बचाया था.

गगनदीप सिंह नाम है इनका, उत्तराखंड पुलिस में सब-इंस्पेक्टर हैं. मई के महीने में गगनदीप ने एक मुस्लिम लड़के को मॉब लिंचिंग का शिकार होने से बचाया था. उत्तराखंड में एक जगह है रामनगर, वहां गिरिजा देवी का मंदिर है. आस-पास जंगली इलाका. हर शहर में ऐसी जगहें कपल्स का ठिकाना होती हैं. जहां दुनिया से छुपकर कपल्स मिलने आते हैं. 22 मई, 2018 को ऐसा ही एक कपल मिलने आया. कुछ लोगों ने देखा और पकड़ लिया. पूछा तो पता चला कि लड़का मुसलमान और लड़की हिंदू है. इसके बाद तो हंगामा हो गया. कुछ ही देर में हिंदू संगठन के लोग जुट गए और लड़के को पीटने लगे.
उस दिन गगनदीप की ड्यूटी वहीं पर थी. मौके पर पहुंचे, लड़के को बचाया. भीड़ उस लड़के को पीटना चाहती थी, लेकिन गगनदीप के रहते ऐसा हो नहीं सका. इस पूरी घटना का वीडियो वायरल हो गया. गगनदीप की कुछ फ़ोटोज़ आईं. एक तरफ भीड़, भीड़ के सामने लड़के को सीने से चिपकाए गगनदीप. लोगों ने गगनदीप की खूब वाहवाही की. वो तस्वीर बन गए कि जब सब बुरा हो रहा है. तब एक अकेला आदमी खड़ा होकर कैसे बुराई को रोक सकता है.
लोग, जब इकट्ठा होते हैं तो भीड़ बनती है. भीड़ हमेशा निगेटिव असर लिए हो जरूरी नहीं, वही भीड़, वही लोग. एकता का प्रतीक भी हो सकते हैं. उस एकता की दिखाने के लिए एक मूर्ति बनाई गई. सरदार पटेल की मूर्ति.  नाम दिया गया, स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी . 31 अक्टूबर 2018 को स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी का उद्घाटन हुआ. ये मूर्ति सरदार सरोवर बांध के पास नर्मदा नदी के बीच बनी,  साधु बेट द्वीप पर. ख़ास ये रहा कि दुनिया की सबसे ऊंची मूर्ति बनी. ऊंचाई कितनी? 182 मीटर. देश भर के लगभग 15 करोड़ किसानों से लोहा और मिट्टी मंगवाई. जिसका वजन हुआ, 129 टन.  इस सबका इस्तेमाल मूर्ति बनाने के लिए किया गया. मूर्ति बनाने में समय लगा 42 महीने. खर्च हुए, 2 हज़ार 9 सौ करोड़ रुपये. मूर्ति को डिज़ाइन किया है राम वी सुतार ने. सुतार वो मूर्तिकार हैं, जिन्हें पद्मभूषण सम्मान भी मिला है.

ये मूर्ति सरदार सरोवर बांध के पास नर्मदा नदी के बीच बनी
ये मूर्ति सरदार सरोवर बांध के पास नर्मदा नदी के बीच बनी

होने को इस मूर्ति का विरोध भी हुआ, लेकिन वो बात किसी और दिन के लिए रख छोड़िए. फिलहाल पॉजिटिव पहलू की बात होनी चाहिए, इस गज़ब के आर्किटेक्चर की बात होनी चाहिए. मूर्ति में लगी इंजीनियरिंग की बात होनी चाहिए. मूर्ति अपनी बनावट में इतनी भव्य है कि सिर्फ इसका बेस ही 25 मीटर ऊंचा है. मूर्ति तीन लेयर्स में बनी है. सबसे अंदर 127 मीटर ऊंचे 2 टॉवर हैं, और यही टॉवर पूरे स्ट्रक्चर को खड़ा रखते हैं. इसके स्टील की लेयर और उसपर कांसा चढ़ा है जो हमें दिखाई देगा. कांसा 8 मिलीमीटर मोटा है.
इस तरफ से ये सिर्फ मूर्ति नहीं है. 70 हज़ार मीट्रिक टन सीमेंट,  2 लाख 12 हज़ार क्यूबिक मीटर कंक्रीट, 18 हज़ार मीट्रिक टन रीइंफ़ोर्समेंट स्टील और 6 हज़ार 500 मीट्रिक टन स्ट्रक्चरल स्टील से गढ़ी गई इबारत है. जिस 22 पर हज़ार स्क्वायर मीटर कांसे की प्लेटें लगी हैं. ये मूर्ति जरूरी है. जब मूर्तियां देखकर इंसानों को ये सीखना पड़ जाए कि हमें एक होकर रखना है, तब वो सीमेंट कंक्रीट और कांसे से यूनिटी सीखेगा.
20 जुलाई 2017. लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर बहस हो रही थी. कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी  बोलने खड़े हुए, सरकार पर हमला बोला. और इसके बाद जाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गले लग गए. सब हैरान हुए, खुद प्रधानमंत्री भी . आप समझदार लोगों से पूछेंगे, वो सौ बातें कह सकते हैं. इसे बचकाना व्यवहार कह सकते हैं, सदन की मर्यादा की दुहाई दे सकते हैं. लेकिन हमें ये देखकर अच्छा लगा. राजनीति में साल भर हंगामे हुए, हार-जीत हुई. हर साल होते हैं, हम बुरी चीजें याद रखते हैं. इस साल याद रखने के लिए हमारे पास ये जेस्चर है.
एक नेता का दूसरे नेता के गले लग जाना बताता है कि उम्मीद बची है. तमाम विरोधों के बाद, सारी कटुता और राजनीति के बाद अंत में दो लोग ही तो हैं. गले लगते इन दो लोगों को देख इनके समर्थकों को समझना चाहिए, वो 365 दिनों के 24 घंटों में एक दूसरे के खिलाफ मोर्चा खोले बैठे रहते हैं. अरे इतना गुस्सा किस चीज का? बातें ही तो हैं, बातें कही जा सकती हैं. मुद्दों पर चर्चा  हो सकती है. आरोप लगाए जा सकते हैं, सफाई मांगी जा सकती है. इस सबके बीच दुश्मनी कर लेने की जरूरत थोड़े है.

वसुंधरा राजे और ज्योतिरादित्य
वसुंधरा राजे और ज्योतिरादित्य

कई पार्टियां हैं, चुनाव होंगे. एक ही पार्टी जीत पाएगी, वही सत्ता में बैठेगी. वो भी हमेशा सत्ता में नहीं रहेगी, वो जाएगी तो आप आएंगे. नेताओं का भी अलग समाज बन जाता है, उन्हीं लोगों के बीच उन्हें सालों-साल रहना पड़ता है. ऐसे गले लग जाना रास्ता दिखाता है कि दो विरोधी पार्टियों के नेता भी दोस्त हो सकते हैं. मुद्दों पर वो एक-दूसरे को घेरें. खूब घेरें, लेकिन कड़वाहट कहीं न आए.

अब आपको इस वीडियो का एक्सटेंशन दिखाते हैं, तीन राज्यों में चुनाव हुए. कांग्रेस जीती, शपथ ग्रहण के समय की तस्वीरें आईं. रमन सिंह और भूपेश बघेल गले मिल रहे थे. शिवराज सिंह चौहान ज्योतिरादित्य सिंधिया और कमल नाथ का हाथ अपने हाथों में लिए दिखे, वसुंधरा राजे ज्योतिरादित्य को दुलार रही थीं. राहुल गांधी, वसुंधरा के आगे हाथ जोड़े नजर आ रहे थे. वसुंधरा खुशी-खुशी अशोक गहलोत से मिल रही थीं. कहीं से नजर नहीं आ रहा था कि कुछ ही दिन पहले चुनाव प्रचारों में यही लोग एक दूसरे के खिलाफ आग बरसा रहे थे. हमारा मानना है कि राजनीति होती रहेगी, लेकिन नेताओं की ऐसी तस्वीरें आते रहनी चाहिए. ऊपर भले कुछ न बदले, लेकिन राजनीति के नाम पर दिन भर जो ट्रोल्स एक-दूसरे से भिड़े रहते हैं. उन्हें थोड़ी राहत मिलेगी.
साल 2018. भारतीय फ़िल्मों के लिए बढ़िया साल रहा. लेकिन बड़े स्टार्स के लिए नहीं बल्कि उनके लिए जो अपने आप को स्थापित करने में लगे हुए थे और बड़े स्टार्स बनने की फ़िराक में लगातार लगे हुए हैं. इस साल की तीन सबसे बड़ी फ़िल्में - सलमान खान की रेस-3, आमिर खान और अमिताभ बच्चन की ठग्स ऑफ़ हिंदुस्तान और शाहरुख खान की ज़ीरो. ये तीनों फ़िल्में फ्लॉप रहीं. लोगों ने फ़िल्में पसंद कौन सी की? अंधाधुन, स्त्री, राज़ी, मुल्क, तुम्बाड, बधाई हो जैसी फ़िल्में. यानी लोगों ने चेहरों और कपड़ों से ज़्यादा कॉन्टेंट को तरजीह दी. और ये बहुत कमाल की बात है.

एक ऐसे कल्चर में जहां किसी शक्ल का पोस्टर पर छपा होना ये पक्का कर देता है कि भीड़ तो आएगी ही, उस माहौल में आयुष्मान खुराना, आलिया भट्ट, सोहम शाह, राजकुमार राव ने ये बताया कि कॉन्टेंट इज़ किंग! ये सभी छोटे बजट की फ़िल्में हैं. कोई शूं-शां नहीं. कोई बहुत ग्रैंड फॉरेन लोकेशन नहीं. ज़मीनी कहानियां, ज़मीनी ऐक्टिंग और सबसे बड़ी बात, लंतरानी नहीं और ज्ञान भी नहीं. ये वही समय है जब हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री जिसे अज्ञात कारणों से बॉलीवुड भी कहा जाता है, को ये समझना चाहिए कि जनता दिमाग घर पर रख के फ़िल्में नहीं देखना चाहती है. इसके साथ ही एक बात और अच्छी हुई है. कल ही. एकदम ताज़ा मामला है. 27 दिसंबर को एक फ़िल्म का ट्रेलर रिलीज़ हुआ. दी एक्सिदेंटल प्राइम मिनिस्टर. फ़िल्म को प्रोपोगेन्डा कहा जा रहा है और ऐसा लग भी रहा है. लेकिन अपने आप में ये फ़िल्म ऐतिहासक है. पहली बार एक फ़िल्म बनाई गई है जिसमें पॉलिटिकल हस्तियों का असली नाम इस्तेमाल किया गया है. राजनीतिक विश्लेषक संजय बारू की किताब पर बेस्ड ये फ़िल्म ट्रेलर रिलीज़ होते ही चर्चा का केंद्र बनी हुई है.
राजनीतिक विश्लेषक संजय बारू की किताब पर बेस्ड ये फ़िल्म ट्रेलर रिलीज़ होते ही चर्चा का केंद्र बनी हुई है.
राजनीतिक विश्लेषक संजय बारू की किताब पर बेस्ड ये फ़िल्म ट्रेलर रिलीज़ होते ही चर्चा का केंद्र बनी हुई है.


इसके अलावा एक और बहुत ही इम्पोर्टेन्ट घटना. इंडिया में #MeToo कैम्पेन शुरू हुआ और कितने ही नाम लपेटे में आये. फ़िल्म इंडस्ट्री इससे सबसे ज़्यादा प्रभावित हुई. इसकी शुरुआत हुई एक इंटरव्यू से जिसमें थीं ऐक्टर तनुश्री दत्ता. तनुश्री ने बताया कि कैसे साल 2008 में ऐक्टर नाना पाटेकर ने उन्हें फ़िल्म हॉर्न ओके प्लीज़ के सेट पर harass किया था. इसके बाद एक बांध सा खुल गया. कितनी ही महिलाओं ने सामने आकर या अपनी पहचान छुपाकर कितने ही बड़े नामों को बेपर्दा किया. इस पूरे मामले में आलोक नाथ, एम जे अकबर, विवेक अग्निहोत्री, विकास बहल, गुरसिमरन खम्बा, कैलाश खेर, चेतन भगत, रजत कपूर और अभिजीत जैसे नाम सामने आये. इन सभी के ख़िलाफ़ महिलाओं ने सेक्शुअल हेरासमेंट के आरोप लगाए. MeToo कैम्पेन से दो अच्छी बातें हुईं. एक - सभी लोग (वो पुरुष भी हो सकते हैं और महिला भी) ये तो समझ गए कि वो अपनी इन घटिया हरकतों से अपने ओहदे और ताकत की वजह से बच नहीं सकते. और दूसरा ये कि सेक्शुअल हेरेसमेंट के केसेज़ में विक्टिम्स को सामने आकर बोलना चाहिए और उन्हें समाज का साथ ज़रूर मिलेगा.
इंडिया में #MeToo कैम्पेन शुरू हुआ और कितने ही नाम लपेटे में आये.
इंडिया में #MeToo कैम्पेन शुरू हुआ और कितने ही नाम लपेटे में आये.


कोर्ट के कुछ शानदार फैसले
कई किस्से हैं, कई बातें हैं, कई कहानियां हैं, किस-किसका ज़िक्र करूं. लेकिन अभी उन फैसलों को ज़िक्र ज़रूरी है, जिन्होंने साबित किया कि देश में कानून से ऊपर कुछ नहीं.
तारीख थी 6 सितंबर 2018. सुप्रीम कोर्ट ने कहा समलैंगिकता, यानी धारा 377. अब अपराध नहीं है. पहले Same sex के दो Adult यानी व्यस्क लोगों के बीच सेक्स को अपराध माना जाता था, 10 साल की सज़ा का भी प्रावधान था. लेकिन सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की पीठ ने इसे ये कहते हुए खारिज कर दिया, कि सेम जेंडर के बीच संबंध उनका व्यक्तिगत चुनाव है, जिसका हमें सम्मान करना चाहिए. और ये सही भी है क्योंकि सभी लोगों को अपने हिसाब से अपनी ज़िदगी जीने का पूरा हक है.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा समलैंगिकता, यानी धारा 377. अब अपराध नहीं है.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा समलैंगिकता, यानी धारा 377. अब अपराध नहीं है.

अब बात 27 सितंबर 2018 की करते हैं. कोर्ट ने कहा- पति की जागीर नहीं है पत्नी, सुप्रीम कोर्ट ने 158 साल पुरानी अडल्ट्री कानून की धारा 497 को असंवैधानिक बताया और इसे खत्म कर दिया. इस फैसले के बाद पुरुषों का किसी और की पत्नी के साथ शारीरिक संबंध बनाना अपराध नहीं रहा, पहले कानून इसे अपराध मानता था. चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा कि अडल्ट्री तलाक देने की वजह ज़रूर बन सकती है लेकिन ये कानूनन अपराध नहीं है. साथ ही उन्होंने सबसे कठोर टिप्पणी भी की- कहा, औरतों को किसी भी हाल में पति की प्रॉपर्टी नहीं समझना चाहिए.
अडल्ट्री कानून पर फैसला आने के एक दिन बाद, यानी 28 सितंबर 2018, दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली बेंच ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री पर से बैन हटा दिया. पहले मंदिर के भीतर 10 से 55 साल तक की महिलाओं का जाना मना था. कोर्ट ने कहा- मंदिर में महिलाओं का ना घुसने देना कोई धार्मिक प्रथा नहीं है. इसीलिए सभी महिलाएं भगवान अयप्पा के दर्शन कर सकती है. हालांकि ये विडंबना ही है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश का अभी भी भारी विरोध हो रहा है, और महिलाओं की मंदिर प्रशासन की तरफ से बैन बरकरार है. कोर्ट के फैसले ने चेहरे पर खुशी तो ज़रूर दी, लेकिन मंदिर प्रशासन का रवैया हमें परेशान करता है.
वैसे ट्रिपल तलाक को हम कैसे भूल सकते हैं. जिस पर कल ही संसद के भीतर इतना हो हल्ला मचा है. 22 अगस्त 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम महिलाओं के हित में एक बहुत ही ज़रूरी फैसला सुनाया. उन्होंने ट्रिपल तलाक को गैरकानूनी और असंवैधानिक बता दिया. साथ ही केंद्र सरकार को ये आदेश दिया कि जल्द ही वो ट्रिपल तलाक के ऊपर बिल लाए. कई मुस्लिम संगठनों ने ऐतराज भी जताया लेकिन जीत महिलाओं के हक की हुई. अब 27 दिसंबर यानी कल ही केंद्र सरकार ने इस बिल को लोकसभा से पास कराया है. लेकिन राज्यसभा में बिल की राह मुश्किल लग रही है. क्योंकि कांग्रेस समेत कई पार्टियां इसका विरोध कर रही है. लेकिन लल्लनटॉप हर उस बिल का समर्थन करता है जिसमें महिलाओं के हक की बात हो, समानता के अधिकार की बात हो.
22 अगस्त 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम महिलाओं के हित में एक बहुत ही ज़रूरी फैसला सुनाया.
22 अगस्त 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम महिलाओं के हित में एक बहुत ही ज़रूरी फैसला सुनाया.

अब हम आपको थोड़ा पीछे लेकर चलते है, इस फैसले का ज़िक्र भी बेहद ज़रूरी है, क्योंकि यही फैसला आपको सम्मान से जीने के बाद सम्मान से मरने का हक दिलाता है. तारीख थी 9 मार्च 2018. कोर्ट ने इच्छामृत्यु पर बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा- कि गंभीर रूप से बीमार मरीज जिनका इलाज संभव नहीं है वे इसकी मांग कर सकते हैं इसके बाद मेडिकल बोर्ड Passive Euthanasia तय करेगी. यानी कि मरीज़ को अंतिम सांस कब लेनी है. ये एक बड़ा फैसला था, जिसका ज़िक्र आज के बुलेटिन में भी बेहद ज़रूरी था.
अब इन फैसलों के बाद आधार कार्ड के ऊपर फैसला हो, निजता के अधिकार के ऊपर फैसला हो, अदालत की कार्यवाही को Live दिखाने को लेकर फैसला हो, या फिर सिनेमा घर में राष्ट्रगान बजाने की अनिवार्यता खत्म करने को लेकर फैसला हो. कई फैसले हैं, कोर्ट की कई टिप्पणियां हैं जिसका सीधा सीधा ताल्लुक आपसे और हमसे हैं. इन फैसलों ने लोगों के जीवन में बदलाव लाने का काम तो किया ही साथ ही चेहरे पर मुस्कान लाने का भी काम किया, जिसका ज़िक्र हमने शुरू में किया था.

हमने शुरुआत पुलिस वाले से की थी, अंत भी एक पुलिस वाली की बात से करेंगे. जिसने बच्चों के चेहरे पर खुशी लाने का काम किया. बात दीपावली के समय की है, यूपी के अमरोहा में बच्चे मिट्टी के दिए बेच रहे थे, इसी दौरान पुलिस का गश्ती दल वहां पहुंचा और वहां के दुकानदारों से एक लाइन में दुकानें लगाने को कहा. बच्चों ने मासूमियत से कहा कि हम दिए बेच रहे हैं लेकिन कोई खरीद नहीं रहा है, जब दिए बिक जाएंगे तो हम हट जाएंगे. बच्चों की मासूमियत सैद नगली के थानाध्यक्ष नीरज कुमार को भा गई. उन्होंने खुद भी दिए खरीदें, साथ के पुलिसवालों से भी दिए खरीदवाएं. और तो और उन्होंने लोगों से भी दिए खरीदने की अपील की. कुछ ही समय में सारा दिया बिक गया. पुलिसवालों ने उन बच्चों को दिवाली के तोहफे भी दिए और इस तरह उनकी दिवाली सही में Happy wali deepawali कर दी.
इतना ही. अपना ख्याल रखिए, इस लंबे वीकेंड में अपने परिवार का ख्याल रखिए. और वो सारी कोशिशें करते रहिए जो आपके और दूसरों के चेहरे पर मुस्कान बनाए रखें.

वीडियो: साल 2018 में इन 10 ख़बरों ने सबका दिल जीता

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