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फिल्म रिव्यू: काला

'कबाली' का पाप 'काला' से धो दिया है रजनी सर ने.

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पा रंजीत और रजनीकांत इससे पहले फिल्म कबाली में भी साथ काम कर चुके हैं.
रजनीकांत की 'काला' आज के समय की सबसे प्रासंगिक फिल्मों में से एक है. इसमें वो सारी चीज़ें दिखाई गई हैं, जो असल में हो रही हैं. कुछ चीज़ें तो असलियत के इतनी करीब हैं कि उसके नाम भर में हेर-फेर कर डायरेक्टर पा रंजीत ने काम चला लिया है. जैसे डिजीटल इंडिया के नाम पर डिजीटल धारावी और स्वच्छ भारत अभियान के नाम पर क्लीन एंड प्योर धारावी. 'धारावी' यानी एशिया का सबसे बड़ा स्लम यानी गंदी बस्ती, जो मुंबई में है. इस फिल्म का नाम रखा गया है तमिल से आकर इस धारावी में बसे एक राउडी कारीकलन के नाम पर रखा गया है, जिसे प्यार और शॉर्ट में बुलाया जाता है 'काला'.
'काला' की कहानी कारीकलन की नहीं, धारावी की है. वो धारावी जिसे डिजिटल और स्वच्छ बनाने के नाम पर हथियाने का प्लान बनाया जा रहा है. ये प्लान बना रहा है, एक नेता जिसका नाम है हरि दादा उर्फ हरिदेव अभयंकर. हरि का मतलब होता है विष्णु, जिनके अनेक अवतारों में से एक हैं भगवान राम. यहां राम-रहिम (इंसान की नहीं भगवान की बात हो रही है) की बात इसलिए छेड़ी गई है क्योंकि इस फिल्म का एक बहुत अहम हिस्सा रामायण की कहानी के इर्द-गिर्द बुना गया है. लेकिन थोड़े उल्टे-पुल्टे अंदाज में. फिल्म के इस पार्ट की डीटेलिंग फिल्म के क्लाइमैक्स में खुलकर सामने आती हैं, उसी तर्ज़ पर यहां भी इसे विस्तार से नीचे ही बताया जाएगा.
हरि दादा धारावी की जमीन हथियाकर उसपर ऊंची इमारतें बनवाना चाहता है लेकिन उसके इस राह में रोड़ा बना हुआ है काला. काला मतलब वो आदमी, जो धारावी का राजा है. उसकी मर्जी के बिना वहां एक पत्ता भी नहीं हिलता. इसे ऐसे समझें कि हरि मुंबई का एक धाकड़ नेता है. उसके एक इशारे से सरकारें बदल जाती हैं. वो काला से मिलने धारावी आ तो जाता है लेकिन उसे वापस जाने के लिए काला से परमिशन लेनी पड़ती है, आधे रास्ते से लौटकर. ये हरि दादा हैं नाना पाटेकर. फिल्म के मेन विलेन. और ऐसा तगड़ा विलेन जो रजनीकांत की भद्द पीट के रख देता है.
फिल्म में नाना पाटेकर एक पारफुल नेता के रोल में हैं, जो अपने बल पर सरकार बना-गिरा देता है.
फिल्म में नाना पाटेकर एक पावरफुल नेता के रोल में हैं, जो अपने बल पर सरकार बना-गिरा देता है.

फिल्म शुरू होती है एक कार्टून टाइप वीडियो से इसमें आपको मुंबई की ऊंची इमारतों और स्लम में अंतर दिखाने के बाद जमीन की अहमियत समझाई जाती है. उसके बाद रजनीकांत की एंट्री होती. एक ऐसी एंट्री, जो आपने शायद ही पिछले कुछ सालों में देखी हो. जैसे 'कभी खुशी कभी गम' में ऋतिक रोशन की हुई थी, छक्का मारकर. उसके ठीक उलट. यहा रजनीकांत बच्चों के साथ क्रिकेट खेल रहे हैं. जीतने के लिए कुछ रन बनाने बाकि हैं लेकिन रजनी बोल्ड हो जाते हैं. यहीं आपको समझ आ जाता है कि आप क्या और कैसे देखने वाले हैं. लेकिन डायरेक्टर फौरन उनका कैरेक्टर एस्टैब्लिश करता है, एक सीन के साथ जहां जमीन पर कब्जा करने की पहली वारदात होती है और रजनी के सिर्फ खड़ेभर होने से मसला निपट जाता है.
इस फिल्म को रजनीकांत के दामाद और साउथ के सुपरस्टार धनुष ने प्रोड्यूस किया है.
इस फिल्म को रजनीकांत के दामाद और साउथ के सुपरस्टार धनुष ने प्रोड्यूस किया है.

पहले हाफ तक फिल्म मक्खन चलती रहती है. एक दम फन में. आप भी इंटरवल में क्या-क्या लेना है इस जोन में घुस चुके होते हैं, लेकिन तभी एक प्रॉपर मसाला एक्शन सीन आता है. इसमें रजनीकांत सिर्फ अपने छाते से पचास-एक लोगों को निपटा देते हैं. ये असंभव है, पता होते हुए भी आपको विश्वास हो जाता है कि नहीं यार ये तो हुआ ही है. कारण- बताना पड़ेगा क्या? ये एकमात्र फुल-फ्लेज्ड एक्शन सीन है जहां सिर्फ रजनीकांत लड़ते दिखाई देते हैं. बाकी के जितने भी फाइट सीक्वेंस हैं वो रजनी के सामने खड़े होने के बावजूद और दूसरे लोग लड़ते हैं. इतने सब के बाद एक स्पॉयलर टाइप घटना होती है और फर्स्ट हाफ खत्म हो जाता है. फिर शुरू होती है वो फिल्म जो आपकी एक्सपेक्टेशन से परे होती है. हरि दादा फर्स्ट हाफ में हुए उस स्पॉयलर वाली घटना का बदला लेने की ठानते हैं और फिल्म प्रेडिक्टेबल होने लगती हैं. लेकिन पा रंजीत यानी डायरेक्टर ये होने नहीं देते.
यहां से अपनी जमीन बचाने की लड़ाई शुरू होती है और फिल्म रफ्तार पकड़ लेती है. राम-रावण का ज़िक्र यहां से खुलने लगता है. सदियों से बनी-बनाई रूढ़ियां तोड़ी जाती हैं. घुमाव यहां ये है कि फिल्म का हीरो रावण है, जबकि विलेन राम है. एक सीन है जहां नाना पाटेकर की पोती उनसे काला के बारे में पूछती है, तो वो बताते हैं कि वो रावण है. जब क्लाइमैक्स अपने फ्लो में होता है तब पीछे एक रामायण की कथा चल होती है कि जिसमें बताया जाता है कि राम जैसे ही रावण का एक सिर काटते हैं दूसरा सिर आ जाता है. वो सिर काटते रहते हैं उसका सिर जुड़ता रहता है. ये 'काला' के हाई टाइम्स में से एक है. इन सिरों का मतलब है रजनीकांत के आसपास के लोगों से. फिल्म में सिर्फ रजनी ही नहीं उनके आसपास के किरदार भी उतने ही जरूरी हैं.
रजनीकांत राजनीति में करीब-करीब आ ही गए हैं, लिहाज़न ये फिल्म उनके लिए खासी मददगार साबित हो सकती है.
रजनीकांत राजनीति में करीब-करीब आ ही गए हैं, लिहाज़न ये फिल्म उनके लिए खासी मददगार साबित हो सकती है.

ये पूरी फिल्म विद्रोह और क्रांति के बारे में बात करती है. जो आपका हक है वो आपसे छीनने की हरसंभव कोशिश की जाएगी लेकिन उसके लिए आपको लड़ना होगा. नहीं तो हरि जैसे लोग हमाका हक खाने के लिए हमेशा अपना मुंब बाए बैठे रहते हैं. वुमन एंपावरमेंट वगैरह वाले मुद्दों को लेकर भी फिल्म में खासी गंभीरता बरती गई है. महिलाओं के किरदार मजबूती से लिखे गए हैं, सिर्फ हुमा कुरैशी को छोड़कर. वो फिल्म में काला की एक्स-गर्लफ्रेंड ज़रीना के रोल में है, जो अब एनजीओ के साथ जुड़कर स्लम में रहने वाले लोगों की ज़िंदगी बेहतर बनाने का काम करती है. पहले अफ्रीका में काम कर रही थी बड़े दिनों बाद लौटकर वो धारावी आई है लेकिन काला अब फैमिली मैन है और अपनी पत्नी से बहुत प्यार करता है. इसलिए वो ज़रीना से कह देता है कि उसके मन में उसके लिए प्यार है लेकिन वो अपनी पत्नी के लिए उसे बचा लेना चाहता है. इससे काला का कैरेक्टर और मजबूत हो जाता है. लेकिन हुमा को कोई फायदा नहीं होता. लेकिन उनके हिस्से भी कुछ मजबूत और सीन्स हैं. एक सीन है जहां कुछ खास किरदारों के मौत के बाद हुमा गुस्से में पूछती हैं- 'कोई भी सवाल करेगा तो उसे मार दिया जाएगा. ये फास्सिज़्म है.' इसे आप जिस बैकड्रॉप में समझना चाहें समझ ले.
'काला' में हुमा ने एक सिंगल मदर का रोल किया है.
'काला' में हुमा ने एक सिंगल मदर का रोल किया है.

काला की पत्नी सेल्वि का रोल किया है ईश्वरी ने राव ने. उनके फिल्म में बहुत सारे सीन्स हैं और सभी में चमकती हैं. काला और उसके बीच फिल्माए गए रोमैंटिक सीन्स फिल्म को एकदम फ्रेश रखते हैं. फिल्म में अंजली पाटिल भी हैं. अंजली ने क्रांतिकारी का रोल किया है जिसे लोग 'तूफान' के नाम से बुलाते हैं. उनका फिल्म में एक सीन है, जब पुलिस वालों को पीट रही होती हैं. पुलिसवाले उन्हें जेंडर शेम कर रोकने के मकसद से उनका पजामा उतार देते हैं. डंडा और पजामा दोनों उनके सामने गिरे होते हैं. लेकिन वो डंडा चुनती हैं और पुलिसवालों को वापस पीटने लगती हैं. ये सीन बताता है कि लड़का-लड़की में कोई फर्क नहीं होता. कोई जेंडर कमजोर नहीं होता. ये बस आपका देखने का नज़रिया है, जो आपको मजबूत या कमजोर बनाता है.
नाना पाटेकर का स्क्रीन पर बहुत कम समय के लिए दिखाई देते हैं लेकिन वो किसी भी एक्टर पर भारी पड़ते दिखाई देते हैं. फिल्म के क्लाइमैक्स में नाना और रजनी का एक सीन है. ये सीन जितना कमाल है उससे आला इसमें नाना का काम है. रजनी के साथ ऐसा है कि उनके पास रजनीकांत होने का बेनेफिट है बावजूद इसके नाना उनपर भारी पड़ते हैं. ये सीन्स अपने बैकग्राउंड म्यूज़िक के चलते और ज़्यादा भारी लगते हैं और इस तरह का म्यूज़िक आपको पूरी फिल्म में सुनने को मिलता है. किसी भी सीन के बाद रैपर्स का आके उस बारे में रैप करना बात के इंपैक्ट को बढ़ा देता है. ऊपर से इसका टाइटल ट्रैक बहुत कमाल है लिरिक्स और म्यूज़िक दोनों मामले में.
ये फिल्म रजनीकांत के बिना भी बनाई जा सकती थी लेकिन उससे इसकी पहुंच कम हो जाती. और 'काला' एक ऐसी फिल्म है, जो ज़्यादा से ज़्यादा लोग तक पहुंचनी चाहिए. पा रंजीत के हिम्मत की दाद देनी चाहिए इस कॉन्सेप्ट को चुनने के लिए और अपनी बात इतने सीधे और सरल तरीके से कहने के लिए. पॉलिटिकल और कई सारे लूपहोल्स लिए होने के बावजूद 'काला' एक सुलझी हुई फिल्म है.


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