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फिल्म रिव्यू: जंगली

2019 में बनी 70 के दशक की फिल्म.

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'जंगली' की सिनेमेटोग्राफी शानदार है.
1971 में फिल्म आई थी 'हाथी मेरे साथी'. इंसान की हाथी जैसे विशालकाय जानवर से दोस्ती की गाथा. सुपर-डुपर हिट रही थी फिल्म. लगभग आधी सदी बाद कुछ-कुछ इसी थीम पर एक और फिल्म आई है. 'जंगली'. फर्क सिर्फ इतना है कि इसमें न तो उस दौर का इमोशनल कनेक्शन है, न ही कोई नए ज़माने की कलात्मकता.

नई बोतल में पुरानी शराब

'जंगली' कहानी है चंद्रिका एलीफैंट सैंक्चुरी के हाथियों को बचाने की जद्दोजहद की. राज जानवरों का डॉक्टर है, जिसकी मुंबई में अच्छी-खासी प्रैक्टिस है. उसके पिता ओडिशा में एलीफैंट सैंक्चुरी के कर्ता-धर्ता हैं. किसी वजह से पिता से नाराज़ चल रहा राज दस साल बाद सैंक्चुरी लौटा है. जहां उसे पिता के साथ-साथ बचपन की दोस्त शंकरा भी मिलती है. साथ ही मिलते हैं दीदी और भोला नाम के दो हाथी, जिनके साथ उसका बचपन बीता था. भोला, जिसके पास दुनिया के सबसे बड़े हाथी दांत हैं. और उन्हीं की वजह से शिकारी बिरादरी उसकी जान की ग्राहक बनी हुई है. चंद दिनों के लिए चंद्रिका लौटा राज शिकारियों की क्रूरता से हक्का-बक्का रह जाता है. ख़ास तौर से तब, जब शिकारियों का एक दुर्दांत हमला उसकी ज़िंदगी में ही भूचाल ला देता है. आगे की कहानी प्लेन बॉलीवुड रिवेंज गाथा है.
फिल्म थाईलैंड की एक रियल एलीफैंट सैंक्चुरी में शूट हुई है.
फिल्म थाईलैंड की एक रियल एलीफैंट सैंक्चुरी में शूट हुई है.

क्या खटकता है?

'जंगली' एक प्रॉमिसिंग नोट पर स्टार्ट होती है और हर एक सीन के साथ निराश करती चली जाती है. यूं तो ये फिल्म 2019 में बनी है लेकिन इसका ट्रीटमेंट वही 70-80 के दशक का ही है. वही घिसी हुई स्टोरी लाइन, वही मेलोड्रामा. और तो और डायलॉग्स भी क्लीशे हैं. कई बार तो आप ऐसे सीन में हंसने लग जाते हो, जिसे डायरेक्टर ने इमोशनल बनाना चाहा था. अंत तक आते-आते तो फिल्म भयानक रूप से हास्यास्पद हो जाती है. भगवान जाने इस फिल्म को लिखने में चार राइटर क्यों लगे हैं?

देखने लायक क्या?

जब कोई फिल्म इतनी ज़्यादा अतार्किक हो तो उसमें थोड़ा सा अच्छा बटोरकर क्या ही कर लेंगे. लेकिन फिर भी रिव्यू-धर्म का पालन करते हुए बता देते हैं. फिल्म की दो ही चीज़ें अच्छी हैं. सिनेमेटोग्राफी और विद्युत् जामवाल के कुछ एक्शन सीन्स. इस फिल्म की शूटिंग थाईलैंड की एक एलीफैंट सैंक्चुरी में हुई है. बेहद खूबसूरत जगह है ये जिसे उतनी ही खूबसूरती से फिल्माया गया है. विद्युत् जामवाल एक्शन सीन्स में कितने कम्फर्टेबल होते हैं ये इससे पहले हम 'कमांडो' और 'फोर्स' जैसी फिल्मों में देख ही चुके हैं. 'जंगली' में भी वो उतनी ही सफाई से स्टंट्स करते नज़र आते हैं. ख़ास तौर से पुलिस स्टेशन वाला सीन बहुत अच्छा है. हाथियों पर फिल्माए गए कुछ सीन भी अच्छे हैं. ख़ास बात ये कि वो जेन्युइन लगते हैं.
विद्युत जामवाल इंडिया के सिल्वेस्टर स्टैलोन बन सकते हैं.
विद्युत जामवाल इंडिया के सिल्वेस्टर स्टैलोन बन सकते हैं.

लेकिन महज़ सिनेमेटोग्राफी और एक्शन के लिए ये फिल्म देखने जाने का मतलब है, बाकी बची फिल्म से खुद को टॉर्चर होने देना. न कोई किरदार डेवलप हुआ है, न ही कहानी. अंत में जो एक मेसेज देने की कोशिश है, वो भी आप तक प्रभावी ढंग से नहीं पहुंचता. इससे अच्छा तो एक ऐड बना लेते इसपर. हमारी तो यही जेन्युइन राय रहेगी कि परदे पर खूबसूरत जंगल ही देखने हैं तो मणिरत्नम की 'रावण' देख लीजिए फिर से और विद्युत के एक्शन पर फ़िदा होना है तो 'कमांडो' की डीवीडी उठा लीजिए.

अदाकारी का स्टैण्डर्ड

विद्युत जामवाल मार्शल आर्ट्स के मूव्स इतनी सफाई से करते हैं कि उनसे नज़रें नहीं हटतीं. उनको देखकर लगता है कि वो इंडिया के अर्नोल्ड या सिल्वेस्टर स्टैलोन बन सकते हैं. एक्शन तो उनका टॉप क्लास होता है, लेकिन इमोशनल सीन्स में वो थोड़े कमज़ोर लगते हैं. वही अर्नोल्ड वाला मामला. बड़ा सवाल ये है कि अतुल कुलकर्णी और मकरंद देशपांडे जैसे कमाल के अभिनेताओं ने ये फिल्म क्यों की? दोनों ही जम कर वेस्ट हुए हैं. बाकी के कलाकार फिल्म में बस होने भर के लिए हैं.
अतुल कुलकर्णी का अरसे बाद एक बुरा रोल है ये.
अतुल कुलकर्णी का अरसे बाद एक बुरा रोल है ये.

'जंगली' की एक ट्रेजेडी ये भी है कि इसका कबाड़ा हॉलीवुड के बड़े डायरेक्टर चक रसेल ने किया है. वो इससे पहले 'द मास्क', 'इरेज़र' और 'द स्कॉर्पियन किंग' जैसी बम्पर सक्सेसफुल फ़िल्में दे चुके हैं. 'जंगली' देखने के बाद आप समझ नहीं पाते कि इसे उनका सिनेमेटिक पतन माना जाए या 'अक्ल पर पत्थर' पड़ने का सिंपल उदाहरण. कई बार तो फिल्म इतनी फ्रस्ट्रेट करती है कि आपका मन करता है काश किसी हाथी ने फिल्म की रील ही कुचल दी होती.
थोड़े से हार्श शब्दों के लिए क्षमायाचना के साथ यही राय है कि स्ट्रिक्टली टीवी पर आने का वेट कीजिए.


वीडियो: फिल्म रिव्यू: नोटबुक

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