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मूवी रिव्यू: डिब्बुक

इमरान हाशमी फिर से भूतों को रोज़गार देने के लिए लौटे हैं.

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कहानी यूनिक थी, लेकिन काश ऐसा अप्रोच को लेकर भी कहा जा सकता.
इमरान हाशमी और घोस्ट स्टोरीज़. अ नेवर एंडिंग सागा. उसी अमर प्रेम को कंटिन्यू रखते हुए उनकी नई फिल्म आई है, ‘डिब्बुक’. ये शब्द ज्यू यानी यहूदी मायथोलॉजी से आया है. एक ऐसी दुष्ट आत्मा, जिसका कोई मकसद अधूरा रह गया हो, उसे डिब्बुक कहा जाता है. इमरान हाशमी की ये फिल्म 2017 में आई मलयालम फिल्म ‘एज़रा’ का ऑफिशियल हिंदी रीमेक है. वहां लीड में पृथ्वीराज सुकुमारन थे. ओरिजिनल फिल्म के डायरेक्टर जयकृष्णन ने ही हिंदी रीमेक भी डायरेक्ट किया है.
सैम और उसकी पत्नी माही इंडिया छोड़कर मॉरीशस शिफ्ट होते हैं. बड़े से घर में अकेले रहने लगते हैं. कुछ दिनों के बाद ही अजीब-सी घटनाएं घटने लगती हैं. जिसका जवाब साइंस के पास नहीं. ऐसी घटनाओं से निजात पाने के लिए एक रैबाइ को बुलाया जाता है. रैबाइ यानी ज्यू स्पिरिचुअल लीडर. उस आत्मा ने सैम और उसकी पत्नी को ही क्यों टारगेट किया, इस सवाल का जवाब ही फिल्म का सबसे बड़ा प्लॉट पॉइंट है. फिल्म में इमरान हाशमी ने सैम का रोल निभाया. वहीं, उनकी पत्नी माही बनी हैं निकिता दत्ता. रैबाइ मार्कस के रोल में हैं मानव कौल. लेकिन भूत की कहानी में सब सेकंडरी है. क्योंकि ऑडियंस अपना टाइम और पैसा खर्च करती है भूत के पीछे. फिल्म का भूत या उसका हॉरर एलीमेंट कैसा था, अब उस पर बात करेंगे.

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