सुबह 9.30 तक सबकुछ ठीक चल रहा था. लेकिन जैसे ही आदिवासीपाड़ा के मतदाता वोट देने पहुंचे माहौल गर्माना शुरू हो गया. बाहर खड़े तृणमूल समर्थकों ने मतदाताओं को घेरना शुरू कर दिया. हर वोटर के साथ एक-दो तृणमूल समर्थक अंदर आने लगे. यह देखकर अभिजीत ने हल्ला मचाना शुरू किया. इस बूथ पर केंद्रीय अर्धसैनिक बालों की नियुक्ति थी. अभिजीत ने उनसे कहा कि जो लोग मतदाता नहीं है और मतदान को प्रभावित कर रहे हैं उन्हें बूथ से बाहर निकाला जाए. अभिजीत के विरोध के बाद स्थिति थोड़ी देर के शांत हुई. इतने में बगल के बूथ से आकर उनकी बीवी ने उन्हें बताया कि वहां फर्जी मतदान शुरू हो गया है.

इतनी सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद आसनसोल में वोटिंग के दौरान जमकर हिंसा हुई है.
अभिजीत ने इसकी शिकायत शुरू की. काफी बहस के बाद मतदान फिर से शुरू हुआ. लेकिन 15 मिनट के भीतर ही स्थिति फिर से बेकाबू हो गई. अभिजीत ने बताते हैं-
"मैंने पीठासीन अधिकारी से शिकायत की. तृणमूल समर्थक मतदाता के साथ-साथ बैलट बॉक्स तक जा रहे थे.वहां मौजूद केन्द्रीय बल तृणमूल समर्थकों के सामने बेबस थे. जवान तृणमूल समर्थकों को ऐसे हटा रहे जैसे वो स्कूली छात्र हों. जब मैंने ज्यादा प्रतिरोध किया तो तृणमूल के समर्थकों ने मेरी कॉलर पकड़ ली और घसीटकर बहार ले आए. मेरे साथ मारपीट की. मेरी बीवी यह सब देख रही थी. इसके बाद वहां रुकना ठीक नहीं था. हम घर जाने में भी सुरक्षित महसूस नहीं कर रहे थे. ऐसे में हम वहां से पार्टी के दफ्तर आ गा गए. देर शाम हम मतदान होने के बाद ही हम लोग घर जा सके. जिस समय हमें बहार निकाला गया था, दोनों बूथों को मिलाकर 190 वोट पड़े थे. शाम को सुनने में आया की 95 फीसदी के तक़रीबन वोटिंग हुई है. खुलेआम फर्जीवाड़ा हुआ है लेकिन कोई कुछ कहने वाला नहीं है."इतना सब होने के बावजूद अभिजीत भाग्यशाली थे. वो बूथ से सुरक्षित निकलने में कामयाब रहे. पांडबेश्वर विधानसभा के तहत पड़ने वाली नवग्राम पंचायत के हबीबुल को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए पुलिस को गोली चलानी पड़ी. नवग्राम के मुस्लिमपाड़ा में पड़ने वाले बूथ नंबर 118 पर हबीबुल सीपीएम की तरफ से रिलीविंग पोलिंग एजेंट थे. रिलीविंग पोलिंग एजेंट बूथ में तब तैनात किया जाता है जब पोलिंग एजेंट को खाना खाने या चाय पीने के लिए बूथ से बाहर निकलना होता है. सीपीएम ने यहां शाहरुख़ शेख को अपना पोलिंग एजेंट बनाया था. शाहरुख़ को दोपहर में खाना खाने के लिए बाहर निकलना था. लिहाजा उनकी जगह पर हबीबुल को बूथ पर बुलवाया गया. उस समय दोपहर के तकरीबन 2 बजे थे.
एक घंटे बाद शाहरुख़ लौटकर आए. हबीबुल बूथ छोड़कर लौट रहे थे. जैसे ही वो कमरे के बाहर निकल रहे थे उन्होंने सामने से भीड़ को पोलिंग बूथ पर आते हुए देखा. वो रुक गए. ये सब तृणमूल समर्थक थे. इन लोगों ने जबरदस्ती बूथ में घुसने की कोशिश की. हबीबुल बूथ के दोनों दरवाजे पकड़कर खड़े हो गए ताकि तृणमूल समर्थकों को अंदर जाने से रोका जा सके. हबीबुल बताते हैं-
"सुबह से वोटिंग ठीक चल रही थी. इससे तृणमूल समर्थक स्थानीय कोल माफिया काफी परेशान हो गए और पोलिंग बूथ पर हमला बोल दिया. वो करीब 50 की तादाद में थे. वो मुझे घसीटकर बाहर ले आए. और मारना शुरू कर दिया. जब सुरक्षा बल के जवान मुझे बचाने के लिए आए तो वो लोग उन पर भी हमलावर हो गए. उनके डंडे छीन लिए गए और उन्ही डंडों से मुझे और जवानों को मारा जाने लगा. तृणमूल समर्थकों की तादाद लगातार बढती जा रही थी. जब हालात बेकाबू हो गए तो पुलिस ने हवाई फायरिंग की. इसके बाद जाकर भीड़ तितर-बितर हुई. मुझे काफी चोट लगी थी. मैं जैसे-तैसे वहां से जान बचाकर निकल पाया"

वोटिंग के दौरान टीएमसी और बीजेपी के बीच झड़प हुई.
यह दोनों घटनाएं पांडबेश्वर विधानसभा में हुई. तृणमूल के कद्दावर नेता जितेंद्र तिवारी यहां से विधायक हैं. वो आसनसोल महानगरपालिका के मेयर भी हैं. आसनसोल में सबसे ज्यादा हिंसा की वारदात भी इसी इलाके में सामने आई हैं. आसनसोल में कुल 7 विधानसभा क्षेत्र हैं. सभी विधानसभा क्षेत्रों से हिंसा की खबरें आई हैं. बीजेपी के उम्मीदवार बाबुल सुप्रियो की दो जगह टीएमसी कार्यकर्ताओं के साथ झड़प हुई. इसके आलवा उन्होंने अपने ट्वीटर हैंडल से जिन जगहों पर मतदान में फर्जीवाड़े के आरोप लगाए वो इस तरह थे.
-रानीगंज विधानसभा के दखिनखंडो ग्राम पंचायत का बूथ नंबर 215,216,217 कैप्चर हो गया है.
-रानीगंज विधानसभा में खांड्रा में बूथ नंबर 152 और 154 की ईवीएम में बीजेपी के सिम्बल पर काली पट्टी चिपका दी गई है.
-पांडबेश्वर विधानसभा में 72,81,82,83,167,173,174 पर टीएमसी के गुंडों ने कब्जा कर लिया है.
-आसनसोल साउथ विधानसभा के बूथ नंबर 106,107,108,109 और 112 पर टीएमसी के स्थानीय काउंसलर के नेतृत्व में कब्जा.
बीजेपी के अलावा दूसरे विपक्षी दल सीपीएम का भी यही हाल था. सीपीएम ने यहां से गौरांग चटर्जी को मैदान में उतरा है. गौरांग ने हमें बताया कि रात 10 बजे तक उनके पास 86 ऐसे बूथों की लिस्ट है जहां से उनके पोलिंग एजेंट्स को बाहर निकाल दिया गया है. उन्होंने स्पेशल पुलिस ऑब्जर्वर विवेक दूबे को सुबह से मतदान में गड़बड़ी के बाबत 14 मैसेज किए लेकिन इसमें से एक का भी जवाब नहीं दिया गया. जिला निर्वाचन अधिकारी को गौरांग ने 9 मैसेज किए लेकिन वहां से भी कोई जवाब नहीं मिला.आसनसोल से दो दफा लोकसभा का चुनाव जीत चुके बंशगोपाल चौधरी ने बताया की उन्होंने जिला निर्वाचन अधिकारी को 82 मैसेज किए. इसमें से उनके पास चार बार जवाब आया. दो दफा उनसे उन जगहों की लोकेशन मांगी गई जहां फर्जीवाड़ा होने की सूचना मिली थी. और दो दफा 'We are looking into the matter' लिखकर भेज दिया गया.
कोयले की कालिख से लिखी लोकतंत्र की इबारत

आसनसोल की राजनीतिक हिंसा को समझने के लिए हमें इतिहास के दो सिरे पकड़ने होंगे. पहला सिरा अंग्रेजों के दौर का है. 1757 में पलासी की लड़ाई के बाद बंगाल पर अंग्रेजों का कब्जा हो गया था. इसके तकरीबन दो दशक बाद 1774 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के मताहत काम करने वाले दो अंग्रेजों सुएटोनियस ग्रांट हेटली और जॉन समर छोटा नागपुर के पठार की तराई में कोयले के अवशेष देखे. जगह का नाम था एथोरा. इसे बाद में सालनपुर के नाम से जाना गया. यह भारत में खोजी गई पहली कोयले की खदान थी जिसने कंपनी को अकूत दौलत दिलवाई. करीब 500 स्क्वायर मील में फैले कोयले का यह भण्डार आज भी इस इलाके का मुस्तकबिल तय करता है.
कोयले की वजह से आसनसोल झारखंड के संथालों से लेकर पुरबिया मजदूरों तक रोटी का दूसरा नाम बन गया. 1973 में कोल माइंस अथोरिटी ऑफ़ इंडिया ने कोल इंडिया लिमिटेड की एक और सब्सिडरी कंपनी बनाई. ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड. इसके बाद रानीगंज कोलफिल्ड का राष्ट्रीयकरण हुआ. यहां से शुरू हुआ कोयले के अवैध खनन का खेल. आसनसोल में कोयला माफिया चुनाव जितवाने के खले में सबसे निर्णायक भूमिका निभाता है.
कोयला खदान मजदूरों के साथ 5 दशक से काम कर रहे एक मजदूर नेता ने हमें बताया कि किस तरह से तृणमूल ने कोयला माफिया के साथ मिलकर इस इलाके में अपनी पकड़ कायम की है. उनका कहना था कि वाममोर्चा सरकार में यहां कोल माफिया सक्रीय थे लेकिन तब उनका काम चोरी तक सिमित था. वो खदान में तिनात अफसरों के साथ साठ-गांठ करके ज्यादा तादाद में कोयला उठवा लेते थे. तृणमूल ने इस पूरे अपराध को संस्थागत कर दिया. इस इलाके में अभी दर्जनों जगह पर अवैध खनन हो रहा है. एक स्थानीय माफिया जिस पर टीएमसी के बड़े नेताओं का हाथ इस पूरे नेटवर्क को संभालता है. कोयला किसी भी अवैध खान से खोदा जा रहा हो, बिकता इसी माफिया के जरिए है. मजदूर नेता बताते हैं कि इस सब नेताओं को तृणमूल की तरफ से टारगेट मिलता है कि हमें इतने वोट की लीड चाहिए. अगर ऐसा नहीं होता है तो उसका धंधा चौपट कर दिया जाएगा. ऐसे में कोल माफिया के पास कोई ख़ास विकल्प बचता नहीं है. ये लोग तृणमूल के लिए अपने बाहुबल का प्रयोग करते हैं.

ममता बनर्जी के कार्यकाल में हिंसा में बढ़ोतरी हुई है, जिसकी शुरुआत सिद्धार्थ शंकर रॉय के कार्यकाल में हुई थी.
बंगाल में राजनीतिक हिंसा का दूसरा सिरा जाता है 1972 के विधानसभा चुनाव में. दरअसल कहानी की शुरुआत होती है 1967 के विधानसभा चुनाव से. इस चुनाव में 282 सीटों वाली विधानसभा में पहली मर्तबा गैर कांग्रेसी सरकार बनती है. अजय मुखर्जी के नेतृत्व में. कम्युनिस्ट पार्टियों का असर दिखाई देना शुरू होता है. इसके साल भर बाद फरवरी 1970 में बंगाल में राष्ट्रपति शासन लग जाता है. 1971 में नए सिरे से चुनाव होते हैं. इंदिरा की लोकप्रियता बंगाल में बेअसर साबित होती है. वाम मोर्चा फिर से सत्ता में आ जाता है. 87 दिन के भीतर इस सरकार को हटाकर राष्ट्रपति शासन लगा दिया जाता है. बड़े पैमाने पर गैर कांग्रेसी नेताओं की धरपकड़ शुरू होती है. सबसे ज्यादा कहर बरपा होता है कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं पर. फैक्ट्री के गेट से निकल रहे मजदूर नेताओं की सरेआम हत्याएं शुरू होती है. ऐसे माहौल में आता है 1972 का चुनाव.
1971 में सरकार गिराए जाने के बाद आसनसोल में सीपीएम के नेता ज्योति बसु की सभा होने वाली होती है. ओंडाल मोड़ पर. उससे ठीक पहले तीन कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं की हत्या हो जाती है. इसमें से एक को पुलिस थाने के सामने मारा जाता है. पुलिस कानून व्यवस्था का हवाला देकर सभा करने की इजाजत नहीं देती है. जिले में धारा 144 लगा दी जाती है. फिर भी सभा होती है और लोग हजारों की तादाद में सभा में पहुंचते हैं. आसनसोल और बर्दमान जिला कम्युनिस्टों का उस दौर का सबसे मजबूत गढ़ था. इसलिए सबसे ज्यादा हिंसा यहीं होती है.
1972 के बंगाल विधानसभा चुनाव हिंसा के माहौल में होते हैं. बड़े पैमाने पर बूथ कैप्चरिंग होती है. नतीजे में कांग्रेस पार्टी फिर से सत्ता में आती है. 282 में से 217 सीटें कांग्रेस के खाते में जाती हैं और सिद्धार्थ शंकर रे बंगाल के नए मुख्यमंत्री बनते हैं. पूरे आपातकाल में वो बंगाल के मुख्यमंत्री रहते हैं. इन छह सालों में पुलिस अत्याचार और राजनितिक हत्याओं की दर्जनों वारदात होती हैं. 1977 बंगाल में सीपीएम पूर्ण बहुमत की सरकार बनाती है. यह शासन अगले 34 साल तक चलता है.

बंगाल चुनाव के दौरान की एक वॉल राइटिंग
करीब साढ़े तीन दशक के शासन काल में सीपीएम बंगाल के सामाजिक ढांचे को बदलकर रख देती है. इस नए ढांचे को कई समाजशास्त्री 'पार्टी समाज' का नाम देते हैं. सीपीएम के शासनकाल में सभी चीजें संस्थागत होनी शुरू होती हैं. मोहल्ला कमिटी से लेकर जोनल और डिस्ट्रिक कमिटी तक. पार्टी का तंत्र समानान्तर सरकार चलाना शुरू करता है. गली-गली में क्लब खुलते हैं जिन पर पार्टी का नियंत्रण होता है. दुर्गा पूजा से ईद तक मियां-बीवी के झगड़े से हत्या तक सभी चीजों की पहली सुनवाई पार्टी की स्थानीय कमिटी में होने लगती है. यहां तक की अपने राजनीतिक विरोधियों को काबू में रखने के लिए 'गुंडा कमिटी' तक बनाई जाती है. यह पार्टी की कोई आधिकारिक कमिटी नहीं होती. ना कोई लिखत ना पढ़त. बस मौजूद होती है, जहां भी ज़रुरत पड़े.
2011 में सत्ता का पहिया घूमता है. बंगाल में राजनीतिक हिंसा के खिलाफ नई ताकत खड़ी होती है. ममता बनर्जी सिंगुर और नंदीग्राम आन्दोलन के बाद प्रतिरोध का चेहरा बन जाती हैं. वाम मोर्चे की करारी हार के बाद वो सत्ता में आती हैं. क्लबों के झंडे बदल जाते हैं. गुंडा कमिटी की वफादारी बदल जाती है. बंगाल के समाज में पार्टी का हस्तक्षेप जस का तस जारी रहता है.
तो तृणमूल और सीपीएम के राज में चुनावी फर्जीवाड़े में क्या अंतर हैं? आसनसोल के एक पुराने पत्रकार बताते हैं. सीपीएम चुनाव से पहले रेकी करती थी. जो मतदता कहीं बाहर गए हुए हैं, उनके वोट सीपीएम कार्यकर्ता डालते थे. दूसरी पार्टी के वोटर को बूथ तक जाने से रोका ज़रुर जाता था लेकिन वो इतना खुलेआम नहीं हुआ करता था. अब हालात और बिगड़ गए हैं. तृणमूल राजनीतिक हिंसा का विरोध करते हुए सत्ता में आई थी. उसके दौर में हिंसा और ज्यादा बढ़ी है. जैसे सीपीएम ने कांग्रेस से चुनावी धांधली सीखकर सत्ता पर अपनी पैठ जमाई थी, तृणमूल ने वही पाठ सीपीएम से पढ़ा. इस कुचक्र का कोई फौरी हल दिखाई नहीं देता.
हम तीन दिन से आसनसोल में हैं. यहां पर हम लगातार यह महसूस कर रहे हैं की सत्ता के खिलाफ बोलने में आदमी बेतरह डरा हुआ है. कोई भी खुलकर बोलना नहीं चाहता. एक बीजेपी कार्यकर्ता ने चुनाव के एक दिन पहले कहा था कि देखना कल सुबह से यहां बूथ लूटने की शुरुआत हो जाएगी. ऐसा हुआ भी. हमारी साथी पत्रकार मनोज्ञा लोइवाल को यह कहते हुए घूंसे मारे गए की तुमने बीजेपी से कितना पैसा खाया है? जबकि वो चुनावी हिंसा पर बीजेपी के उम्मीदवार का बयान भर ले रही थीं.

आसनसोल में हिंसा पर बाबुल सुप्रियो और मुनमुन सेन ने एक दूसरे पर आरोप लगाए. फाइल फोटो.
देर रात जब हमारी टीम बाबुल सुप्रियो के घर पहुंची ताकि उनसे चुनावी धांधली के बारे में बयान लिया जा सके. बाबुल के बगल में बैठे उनके एक सहयोगी ने हमसे पूछा कि आप लोग वही हैं जो कल मुंशी बाजार में कवरेज कर रहे थे. हमने हां में जवाब दिया. उस शख्स ने बाबुल को बंगाली में कहा कि इनका कवरेज पूरा नेगेटिव था. इसके बाद वो वहां से उठकर चले गए. उनके पीए ने हमसे कहा कि वो बॉस से पूछकर बताएंगे कि हमें डाटा देना है या नहीं. अभी तक हमारे पास उनकी तरफ से कोई जवाब नहीं आया.
यही बंगाल है. यहां हर चीज को राजनीतिक रंग में रंग दिया गया है. अगर आप साथ नहीं तो आप विरोधी हैं. चाहे आप वकील हैं या मजदूर या पत्रकार. आसनसोल में लोकतंत्र पर कोयले की कालिख पुती है.यहां चुनाव होता नहीं, वो सच में लड़ा जाता है. दीवार पर पोस्टर चिपकाने से लेकर, बूथ में वोट डालने तक हर मौके पर.
ममता बनर्जी के पश्चिम बंगाल में वोटिंग के दिन हिंसा के पीछे कौन? |दी लल्लनटॉप शो| Episode 203












