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कल्याण सिंह को चुनाव आयोग ने दोषी माना, इससे पहले ऐसे राज्यपाल के साथ क्या हुआ था

क्या चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन पर हटाए जाएंगे राज्यपाल कल्याण सिंह?

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कल्याण सिंह का बयान सोशल मीडिया पर वायरल होते ही लोगों ने उनका विरोध शुरू कर दिया. फाइल फोटो. इंडिया टुडे.
राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह की मुश्किलें बढ़ सकती हैं. उन पर चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन का आरोप है. चुनाव आयोग ने इसे आपत्तिजनक माना है. आयोग ने इस बारे में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को चिट्ठी लिखने का फैसला किया है. चुनाव आयोग ने अलीगढ़ के डीएम के जरिए पूरी रिपोर्ट हासिल कर ली है.
पिछली बार राज्यपाल के आचार संहिता का उल्लंघन करने पर क्या हुआ था? नब्बे के दशक में हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल गुलशेर अहमद को चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन पर अपना पद छोड़ना पड़ा था. राज्यपाल रहते गुलशेर अहमद अपने बेटे सईद अहमद का चुनाव प्रचार करने पहुंच गए थे. चुनाव आयोग ने इस पर नाराजगी जाहिर की थी. फिर गुलशेर अहमद को अपना पद छोड़ना पड़ा.
क्या कहा था कल्याण सिंह ने? कल्याण सिंह ने अपने बयान में कार्यकर्ताओं से भाजपा और नरेंद्र मोदी को जिताने की अपील की थी. कल्याण सिंह ने अलीगढ़ में कहा,
'हम सभी लोग बीजेपी के कार्यकर्ता हैं. और इस नाते से हम जरूर चाहेंगे कि बीजेपी विजयी हो. सब चाहेंगे एक फिर से केंद्र में मोदी जी प्रधानमंत्री बनें. मोदी का प्रधानमंत्री बनना ये देश के लिए आवश्यक है. समाज के लिए आवश्यक है.'
कल्याण सिंह ने ये बयान उस वक्त दिया, जब भाजपा कार्यकर्ता अलीगढ़ के मौजूदा सांसद सतीश गौतम का विरोध कर रहे थे. असल में 21 मार्च को भाजपा ने अपने उम्मीदवारों की सूची जारी की थी. इसमें अलीगढ़ से मौजूदा सांसद सतीश गौतम को एक बार फिर कैंडिडेट बनाया गया है. इसको लेकर भाजपा के बहुत से कार्यकर्ता नाराज थे. वे नारेबाजी करते हुए कल्याण सिंह के अलीगढ़ आवास पर पहुंच गए. सतीश गौतम भी कल्याण सिंह से मिलने पहुंचे थे. पहले तो कल्याण सिंह ने सतीश गौतम से मिलने से इनकार कर दिया.
बाद में जब भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने साफ कर दिया कि टिकट में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा, तब कल्याण सिंह ने कार्यकर्ताओं को शांत किया. बाद में वे सतीश गौतम से मिले भी. इसी दौरान कल्याण सिंह ने ये बयान दिया.
राज्यपाल की जवाबदेही संविधान के प्रति मानी जाती है. फाइल फोटो.
राज्यपाल की जवाबदेही संविधान के प्रति मानी जाती है. फाइल फोटो.

राज्यपाल की संवैधानिक स्थिति क्या है? राज्यपाल न्यू्ट्रल ही रहेंगे, ऐसी कोई संवैधानिक बाध्यता नहीं है. सरकार संविधान के अनुच्छेद 156 के तहत राज्यपाल नियुक्त करती है. सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस केजी बालाक़ष्णन की अगुवाई वाली संवैधानिक पीठ ने साल 2010 में इससे जुड़ा एक फैसला जरूर दिया था. इसके मुताबिक 'कुछ लोग राजनीतिक बैकग्राउंड से आते हैं. फिर भी उनकी जवाबदेही संविधान के प्रति है. किसी राजनीतिक दल के प्रति नहीं. उनकी जिम्मेदारी है कि वे संविधान की रक्षा और बचाव करें.'
इन सबके बाद भी पहले भी राज्यपालों पर इस तरह के आरोप लगते रहे हैं. वे अपने से जुड़े राजनीतिक दलों के हित साधते नजर आते रहे हैं.
कल्याण सिंह के बयान की आलोचना कल्याण सिंह का ये बयान सोशल मीडिया पर वायरल होते ही लोगों ने उनका विरोध शुरू कर दिया. राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने ट्वीट किया, 'कल्याण सिंह जी का निजी तौर पर हम सब उनका बहुत सम्मान करते हैं... राज्यपाल का पद संवैधानिक होता है. लोकतंत्र में ये आशा की जाती है कि राज्यपाल पार्टी पॉलिटिक्स से दूरी बनाकर रहें. ये बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है. उनका बयान पद की गरिमा के अऩुरूप नहीं है.'
राजस्थान के उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट ने भी कल्याण सिंह के बयान की आलोचना करते हुए कहा, 'हम राज्यपाल का सम्मान करते हैं और उनसे सम्मानजनक व्यवहार की उम्मीद करते हैं. पर ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि राज्यपाल ने जो बयान दिया है, वो एक पार्टी के पक्ष में है.


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