बंगाल नोबल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर और सत्यजीत रे जैसे फिल्मकारों की जन्मभूमि है. भारत में ‘रेनेशां का अग्रदूत’ माना जाता है. साहित्य, कला और संस्कृति की समृद्ध भूमि है. यहां की दुर्गा पूजा पूरे देश में प्रसिद्ध है. लेकिन चुनावी मौसम में ये सारी पहचानें पीछे हो गई हैं. बंगाली अस्मिता बस एक प्रतीक के इर्द-गिर्द घूम रही है, मछली.
मछली BJP को बंगाल जिताएगी या कांटा गले में चुभेगा? बंगाल के लोगों ने क्या बताया?
बंगाल में मछली भात लोगों की थाली का अभिन्न हिस्सा है. यहीं नहीं कई पूजा अनुष्ठानों में भी मछली का प्रसाद मिलता है. इसे शुभ माना जाता है. TMC ने इसे बंगाली पहचान और संस्कृति पर हमले का प्रतीक बनाया है. बीजेपी ने इसको भांपते हुए इस नैरेटिव को तोड़ने में पूरी ताकत झोंक दी है.


मछली खाते वक्त लोग उसका कांटा निकाल देते हैं. लेकिन गलती से कांटा छूट जाए तो गले में फंस सकता है. ममता बनर्जी का एक बयान मछली के कांटे की तरह बीजेपी के गले में फंसता दिख रहा है. उन्होंने बंगाल के पुरुलिया की एक रैली में कहा,
बीजेपी शासित राज्यों में मछली नहीं खाई जाती. अगर बीजेपी सत्ता में आई तो आपका मछली खाना बंद. बीजेपी सत्ता में आई तो आप मांस या अंडे भी नहीं खा पाएंगे.
इसके बाद से ममता बनर्जी तकरीबन अपनी हर चुनावी सभा में यह बात दोहराती दिख जाती हैं. ‘दीदी’ ने इसको बंगाली अस्मिता से जोड़ दिया है. वो कहती हैं 'माछे-भाते बंगाली'. यानी मछली-भात बंगाली की पहचान है और बीजेपी इस पर रोक लगाना चाहती है.
बंगाल में मछली भात लोगों की थाली का अभिन्न हिस्सा है. कई पूजा अनुष्ठानों में भी मछली का प्रसाद मिलता है. इसे ‘शुभ’ माना जाता है. TMC ने इसे बंगाली पहचान और संस्कृति पर हमले का प्रतीक बनाया है. बीजेपी ने इसको भांपते हुए इस नैरेटिव को तोड़ने में पूरी ताकत झोंक दी है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूर्वी मेदिनीपुर की रैली में बंगाल को मछली उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने का वादा किया. वहीं बंगाल जाने वाले बीजेपी नेताओं की थाली में मछली-भात अनिवार्य तौर पर दिखने लगा है. केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर, पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन से लेकर पार्टी के सांसद मनोज तिवारी तक बंगाल में मछली का स्वाद लेते दिखे हैं.
इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, बंगाल से आने वाले केंद्रीय मंत्री सुकांत मजूमदार ने तो ममता बनर्जी के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए यहां तक कह दिया कि बीजेपी ने अभी तक बंगाल के लिए सीएम फेस तय नहीं किया है. लेकिन इसके लिए पार्टी की एक जरूरी शर्त है कि वह व्यक्ति मांसाहारी होना चाहिए.
बीजेपी को आम तौर पर शाकाहार के शुद्धतावादी दृष्टिकोण से जोड़कर देखा जाता रहा है. बीजेपी शासित कुछ राज्यों में मांस की बिक्री से जुड़े प्रतिबंध ने इस धारणा को मजबूती दी है. TMC बार-बार प्रधानमंत्री मोदी के उस भाषण का जिक्र करती है, जिसमें उन्होंने सावन में राहुल गांधी और लालू यादव के मटन पकाने और कथित तौर पर नवरात्रि में तेजस्वी यादव के मछली खाने को मुगल मानसिकता से जोड़ा था.
TMC बार-बार इन भाषणों का जिक्र करके दावा करती है कि अगर बीजेपी सत्ता में आएगी तो मछली और अंडे पर बैन लगा देगी. यह एक ऐसा विचार है जिसको लेकर कई बंगालियों के मन में आशंका है. TMC इस आशंका को और पुष्ट करना चाहती है.
दूसरी तरफ बीजपी का पूरा जोर बांग्ला मानस को ये यकीन दिलाना है कि हम आप में से ही एक हैं. पार्टी अपनी 'शाकाहारी' इमेज को तोड़ने का भरसक प्रयास कर रही है. बीजेपी के जिन नेताओं की शायद ही नॉन वेज खाते कोई तस्वीर पब्लिक में आई हो, वे अब खुलेआम बंगाल में इसका आनंद लेते दिख रहे हैं.
बंगाली मछली पॉलिटिक्स को कैसे देख रहे हैं?
मछली के इर्द-गिर्द चल रही राजनीति पर बंगाली जनता की पैनी नजर है. कुछ लोगों का मानना है कि TMC को इसका फायदा पहुंचेगा. वहीं कुछ लोगों की मानें तो यह अभियान बंगालियों के लिए बहुत मायने नहीं रखता. इंडिया टुडे के मुताबिक सोशल मीडिया पर एक एक्स यूजर ने लिखा, "बीजेपी के नेता चुनाव से पहले बंगाल में मछली खा रहे हैं, जबकि इनके शासित राज्यों (मध्यप्रदेश, यूपी) में छोटे बच्चों के मिड-डे मील में से अंडे तक हटा दिए गए हैं."
हुगली में ग्राउंड रिपोर्टिंग के दौरान आकाश चटर्जी नाम के एक व्यक्ति ने कहा कि मछली को लेकर बीजेपी नेताओं को ये ‘नया-नया प्रेम वोटर्स को लुभाने का हथकंडा’ मात्र है. आकाश ने कहा,
टीएमसी ने बीजेपी के खिलाफ अभियान चलाया कि ये बाहरियों की पार्टी है. इसका बंगाली संस्कृति और खान-पान से कोई संबंध नहीं है. बीजेपी बार-बार मछली खाकर टीएमसी के आरोपों को सही ही साबित कर रही है. बीजेपी का ये कहना कि हम भी मछली खाते हैं और मांसाहार से कोई आपत्ति नहीं है एक (चुनावी) तिकड़म ही लगती है. टीएमसी इस मुद्दे को भुना चुकी है. बीजेपी कुछ भी करे कोई फर्क नहीं पड़ता. उसकी छवि नहीं बदल सकती.
कोलकाता के प्रतीक चौधरी की राय भी कुछ इसी तरह की है. वो कहते हैं कि चुनावी सीजन में नेताओं के हाथ में अचानक मछलियां देखकर लगता है कि उनका संस्कृति से कनेक्शन कम है, बल्कि वे रूढ़िवादी बंगाली ज्यादा लगते हैं. प्रतीक का कहना है,
नेता जब चुनावी कैंपेन में मछली हाथ में लेते हैं तो ये (सांस्कृतिक) उत्सव कम और एक पेचीदा छवि को सुधारने का प्रयास ज्यादा लगता है. जबकि बंगाल इससे कहीं बढ़कर है.
वहीं चंदननगर के सायन गांगुली को लगता है कि मछली कैंपेन से कोई फर्क नहीं पड़ता. वो बताते हैं,
बंगाल में रहने वाले बंगालियों के लिए मछली कैंपेन ज्यादा मायने नहीं रखता. क्योंकि हमें पता है कि कोई भी राजनीतिक दल खान-पान की आदतों को लेकर वोटर्स को नाराज करने का जोखिम मोल नहीं लेगा. इस मुद्दे को मीडिया बढ़ा चढ़ा कर दिखा रही है. इसका जमीनी हकीकत से कोई लेना देना नहीं है.
दूसरी तरफ नौकरी की तलाश में दिल्ली आईं मौमिता मुखर्जी ने समझाया कि मछली राजनीतिक तौर पर इतनी कारगर क्यों है. उन्होंने बताया,
मछली यहां एक बहुत कारगर राजनीतिक हथियार है. इसके पीछे एक गहरा इमोशनल अंडरकरंट छिपा हुआ है. लोगों को डर है कि उनके खान-पान की आदत में दखल दिया जा सकता है.
बंगाल में प्रतीकों की राजनीति का महत्व रहा है. लेकिन सिर्फ इससे परिणाम तय नहीं होते. असल सवाल ये है कि कौन असल में इन परिस्थितियों को समझता है. और कौन सिर्फ वोट बटोरने की कवायद में जुटा है. इस सवाल का जवाब 4 मई को ही मिल पाएगा, जब नतीजे आने शुरू होंगे.
वीडियो: बंगाल में 'माछ-भात' पर सियासत तेज, मछली खाते हुए तस्वीरें क्यों पोस्ट कर रहे BJP नेता?



















