बाप को कैद कर या मारकर सिंहासन पर बैठने वालों का हिंदुस्तान में कभी ज्यादा सम्मान नहीं हुआ. औरंगजेब को सबसे ज्यादा इसी बात के लिए कोसा जाता है. भले वो अपने खर्चे के लिए कुरान लिखकर या टोपी सिलकर पैसे कमाता रहा. भले वो मुगल परचम सबसे ज्यादा बड़े जमीन के टुकड़े पर फहराने के लिए पचासों बरस फौजी लश्करों में रहा, महल के सुख छोड़.
साइकिल तो जीत लाए, पर अब ये 7 नुकसान झेलेंगे अखिलेश यादव!
अगर अखिलेश यादव के बूते यूपी जीतने का भरोसा होता, तो सपा में ये भगदड़ न मचती.

अखिलेश यादव को बार-बार औरंगजेब याद दिलाएंगे. उनकी पार्टी के बुजुर्ग. उनके विरोधी. क्योंकि अखिलेश यादव को साइकिल मिल गई है. और पैदल हो गए हैं मुलायम सिंह यादव. अब मुलायम सिंह और शिवपाल के पास खोने को क्या बचा है? खुद मुलायम बोले थे, 'मेरा तो सब कुछ जो था, बेटे को सौंप दिया. पार्टी, सत्ता, सब कुछ. अब बस आप कार्यकर्ता बचे हैं.' कार्यकर्ताओं के सामने विकट संकट. सत्ता सुख के मोह में अखिलेश की तरफ जाएंगे, मगर नेताजी के मान का क्या! और अगर कहीं किसी कैमरे के सामने मुलायम सिंह यादव रो दिए, तो 'काम बोलता है' फुस्स हो जाएगा. ये सात नुकसान होंगे अखिलेश को साइकल की इस लड़ाई को जीतने से.
1. शिवपाल को कौन संभालेगा
शिवपाल यादव को मीडिया न्यूजरूम में बैठकर खारिज करना आसान है. जमीन पर नहीं. बीस साल तक संगठन संभाला. हर जिले, ब्लॉक, तहसील में नाम से लोगों को जानते हैं. सपा का एक बड़ा तबका अखिलेश सरकार से नाराज था. जब शिवपाल अध्यक्ष बने, तो उन्हें लगा कि सुनवाई का वक्त आ गया है. मगर उसके बाद कुकरझांव शुरू हो गई. वैसे ही हर सीट पर कई दावेदार हैं. एक को टिकट मिलेगा. बाकी सब उसे हराने में लगे रहेंगे. शिवपाल को इस चुनाव में जीतना नहीं है. बस अखिलेश यादव की हार तय करनी है. और इसके लिए वह पूरी ताकत से जुटेंगे. वह भी और जिला पंचायतों और कोऑपरेटिव कमेटियों में बैठे उनके साथी भी.
2. काडर कहां से लाएंगे
https://www.youtube.com/watch?v=93EoXr-FFIIअखिलेश यादव के पास करिश्मा है. प्रचार तंत्र का. जिसके दम पर एक बरस में उन्होंने अपनी साढ़े पांच सीएम से काम करने वाले मुख्यमंत्री की छवि बना ली. लैपटॉप से लेकर सड़क तक, सब पर बात होने लगी. मगर क्या उनके पास बूथ लेवल का कैडर तंत्र है. क्योंकि जिससे मुकाबला है, वो दोनों विरोधी इस माइक्रो मैनेजमेंट में माहिर हैं. बीएसपी दो साल से मीटिंग करने में लगी है. बीजेपी के पास हर बूथ पर 20 सक्रिय कार्यकर्ताओँ की कुंडली तैयार है. अखिलेश का चेहरा और शिवपाल का ब्रूट फोर्स विनिंग कॉम्बिनेशन हो सकता था. अब नहीं होगा.
3. साथ कौन देगा
अखिलेश लड़ेंगे 290 सीटों पर. 100-120 सीटें सहयोगी दलों को. मान लिया कि अखिलेश के पक्ष में लहर चली. स्ट्राइक रेट रहा 50 फीसदी. तो सीटें जीतेंगे 145-150. बाकी सीटों पर सहयोगी भी जीत गए. सरकार बन गई. मगर ये कठपुतली सरकार होगी. जिसे कांग्रेस और अजीत सिंह अपने हिसाब से नचाने की कोशिश करेंगे. कांग्रेस की तो फिर भी मजबूरी रहेगी, क्योंकि बीजेपी और 2019 का डर है. मगर अजीत सिंह की निष्ठा कब बदल जाए, ये खुद अजीत सिंह भी नहीं जानते. अखिलेश के मुकाबले जयंत चौधरी अपना कद काढ़ने की कोशिश करेंगे. अखिलेश के पास फ्री हैंड नहीं रहेगा, क्योंकि अब परिवार की मर्यादा का हवाला दे कोई रोकेगा-टोकेगा नहीं.
https://www.youtube.com/watch?v=pmkfZaOFtaU&t=41s4. और मुलायम की फजीहत
https://www.youtube.com/watch?v=-SNYbzFvWdQयुवाओँ का बड़ा जोर और हल्ला है. मगर हर घर में बुजुर्ग हैं. 50 से ऊपर के लोग. जिन्हें बुढ़ापे में मुलायम सिंह की ये छीछालेदर पसंद नहीं आएगी. बूढ़ा आदमी डरा होता है, चुका नहीं. वो पूरा दम लगाएगा. ऐसे में अखिलेश का गुबार बैठ सकता है.
5. पापा का मूड बदल गया तो
सबसे बड़ी चोट. जो मुलायम सिंह ने फैसला आने के कुछ ही घंटों पहले अखिलेश पर कर दी. अखिलेश यादव को मुस्लिम विरोधी बताया जा रहा है. पापा बोले, 'जनता में मैसेज जा रहा है कि अखिलेश ने मुसलमानों को कम टिकट दिए.' जब मुलायम सिंह ही ऐसा बोल रहे हैं, तो इसे दोहराने से मायावती को कौन रोक सकता है. मायावती बोलेंगी और मुजफ्फरनगर दंगों की याद दिलाएंगी. बीजेपी भी यही चाहेगी कि हिंदी-मुस्लिम ध्रुवीकरण हो. ऐसे में सपा से मुस्लिम खिसका, तो अखिलेश का तिलिस्म ढह जाएगा, क्योंकि मायावती के पास तो 18% कोर वोटर है. मगर अखिलेश के पास कोर वोटर के नाम पर अगर यादव मान भी लें, तो 7-8% ही है. मायावती रात-दिन मुसलमानों को दुलारने में लगी है.
मुलायम का बयान उनकी मदद करेगा. इसमें छेपक भी जुड़ेंगे. मसलन, अतीक अहमद की मंच पर की अखिलेश ने बेइज्जती. अंसारी बंधुओं को सपा में शामिल करने से किया इनकार. और भी कई ऐसी ही बातें. अखिलेश यादव अपनी राजनीति को तुष्टीकरण के ब्रैंड पर नहीं टिकाना चाहते. यह स्वागतयोग्य है. मगर उन्हें ध्यान रखना होगा कि मुलायम सिंह ने मुल्ला का तमगा सहज अपना ये वोट पाए थे. ये गए, तो सपा का शिराजा बिखर जाएगा.
6. कांग्रेस से नाराजगी कौन झेलेगा
https://www.youtube.com/watch?time_continue=39&v=byNdhmK_t4Eकांग्रेस के साथ से सपा के मजबूत होने की बात कही जा रही है. पहली बात तो ये कि कांग्रेस यूपी में सबसे कमजोर हालत में है. अगर अपने दम पर चुनाव लड़ती, तो खटिया खड़ी हो जाती. चुर जाती. जैसे राहुल की खाट सभा में चुरी. इसीलिए कांग्रेस के सिटिंग विधायक आलाकमान के सामने गठबंधन की चिरौरी कर रहे थे. ये विधायक जीत भी गए, मगर देश में कांग्रेस के प्रति जो नाराजगी का भाव है, जो अभी तक गया नहीं है. जो चिढ़ है, वो अब अखिलेश के मत्थे भी मल दी जाएगी. ऐसे में अखिलेश को किस बात का फायदा होगा. अखिलेश याद रखें. कांग्रेस को जो विधानसभाओं में वोट मिलता आया है, वो सिर्फ कांग्रेस का वोटर नहीं, प्रत्य़ाशी का अपना हिस्सा भी है. ज्यादातर जगहों पर 50 फीसदी से ज्यादा. कांग्रेस के भरोसे रहे तो हाथ मलते भी रह जा सकते हैं.
7. भगदड़ क्यों मची है
आखिरी मगर दीगर बात. अगर समाजवादी पार्टी और इसके नेताओं को इस बात का भरोसा था कि अखिलेश के नेतृत्व में वो चुनाव जीत लेंगे, वो फिर पार्टी में भगदड़ क्यों मच गई. सपा के दंगल के दौरान कई नेता पार्टी छोड़ गए. नेता छोड़िए, आगरा के महेंद्र अरिदमन सिंह और उन्नाव के कुलदीप सेंगर जैसे सिटिंग विधायकों ने भी पार्टी को बाय-बाय कह दिया. ऐसे में अखिलेश के नाम पर किसके भरोसे ताल ठोंकी जा रही है. अगर पार्टी से जीते हुए नेता ही पार्टी के साथ नहीं रहेंगे, तो वोट कौन लाएगा!
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