पश्चिम एशिया पर युद्ध के बादल मंडरा रहे हैं. अगर अमेरिका ईरान पर हमला करता है तो भारत पर भी इसका असर दिख सकता है. इंडिया टुडे के पत्रकार एमजी अरुण की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि इन हालात में अगर कच्चा तेल महंगा होगा तो भारत को इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है. कच्चे तेल का इस्तेमाल केमिकल्स, पेंट, पेट्रोकेमिकल्स और सिंथेटिक कपड़ों को तैयार करने में इस्तेमाल होता है. कीमतें बढ़ने का इन क्षेत्रों पर भारी असर पड़ सकता है.
ईरान-अमेरिका की लड़ाई बिगाड़ेगी तेल का खेल, भारत का क्या होगा?
विश्लेषकों का अनुमान है कि अगर अमेरिका ईरान पर हमला करता है तो कच्चे तेल की कीमतें उछलकर 90 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच सकती हैं. दुनियाभर में इंटरनेशनल बेंचमार्क वाला ब्रेंट क्रूड का भाव पहले से ही बढ़ रहा है.
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विश्लेषकों का अनुमान है कि अगर अमेरिका ईरान पर हमला करता है तो कच्चे तेल की कीमतें उछलकर 90 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच सकती हैं. दुनियाभर में इंटरनेशनल बेंचमार्क वाला ब्रेंट क्रूड का भाव पहले से ही बढ़ रहा है. 20 फरवरी को इसका भाव 70 डॉलर प्रति बैरल का आंकड़ा पार कर गया. 25 फरवरी को ब्रेंट क्रूड लगभग 71 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा था.
ईरान स्थित भारतीय दूतावास ने 23 फरवरी को एहतियाती तौर पर भारत के नागरिकों को ईरान छोड़ने की सलाह दी है. ईरान के कुछ हिस्सों में हाल ही में सरकार विरोधी प्रदर्शनों के मद्देनजर भारतीय दूतावास ने यह सलाह दी थी. अगर ईरान वाला कच्चा तेल इंटरनेशनल मार्केट में बिक्री के लिए उपलब्ध नहीं हो पाता है तो 2026 की दूसरी तिमाही में ब्रेंट क्रूड की कीमतें औसतन 71 डॉलर प्रति बैरल तक रह सकती हैं. न्यूज एजेंसी ब्लूमबर्ग के एक अनुमान के मुताबिक अगर आगे भी ईरानी कच्चा तेल बाजार से बाहर रहता है तो 2026 की चौथी तिमाही (अक्टूबर-दिसंबर के बीच) में ब्रेंट की कीमतें औसतन 91 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं.
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भारत ने वित्त वर्ष 2025 में खरीदा 14 लाख 64 हजार करोड़ का तेलकच्चे तेल का दाम 1 डॉलर बढ़ने से भारत का सालाना इंपोर्ट बिल लगभग 1 अरब डॉलर ( करीब 9000 करोड़ रुपये) बढ़ जाता है. क्रूड इंपोर्ट बिल वह कुल रकम है जो भारत विदेशों से कच्चा तेल खरीदने पर चुकाता है. भारत अपनी तेल जरूरत का करीब 85% विदेश से खरीदता है. भारत ने वित्त वर्ष 2024-2025 में कई देशों से 161 अरब डॉलर कीमत का कच्चा तेल आयात किया था. भारतीय मुद्रा में यह रकम 14 लाख 64 हजार करोड़ रुपये के अल्ले-पल्ले बैठती है.
डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन ने अपने पहले कार्यकाल में ईरान पर प्रतिबंध लगा दिए थे. इसके बाद से भारत ने ईरान से तेल आयात बंद कर दिया है. इसलिए ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनातनी से भारत पर सीधा प्रभाव नहीं पड़ेगा. हालांकि, अगर भारत को ज्यादा कीमतों पर तेल आयात करने के लिए मजबूर होना पड़ता है, तो इससे उसके आयात बिल पर असर पड़ेगा और राजकोषीय घाटा बढ़ जाएगा.
दरअसल ईरान का कच्चा तेल बाजार से हटेगा तो वैश्विक सप्लाई में कमी आएगी. इससे भविष्य में दाम ऊपर जाने की आशंका है. जब सरकार का कुल खर्च उसकी कुल कमाई से ज्यादा हो जाता है तो इस सिचुएशन को राजकोषीय घाटा कहते हैं.
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इन क्षेत्रों को भी नुकसान हो सकता हैरेटिंग एजेंसी क्रिसिल की एक रिपोर्ट के अनुसार, "अगर ईरान और अमेरिका के बीच झगड़ा जारी रहता है या बढ़ता है तो कच्चे तेल की कीमतें बढ़ेंगी. इसके चलते ऑयल रिफाइनिंग, हवाई जहाज का तेल और कच्चे तेल से जुड़े दूसरे क्षेत्र जैसे रसायन, पेंट, पेट्रोकेमिकल्स और सिंथेटिक कपड़ों का कारोबार प्रभावित हो सकता है."
इसके अलावा बासमती चावल, फल और मेवों के बिजनेस में शामिल कंपनियों पर भी इसका बुरा प्रभाव पड़ सकता है.
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