स्विट्जरलैंड के दावोस में 19 जनवरी से विश्व आर्थिक मंच की बैठक चल रही है. इस बैठक में कई देशों के राष्ट्राध्यक्ष पहुंच रहे हैं. फिर चाहें अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हों या जर्मनी के चांसलर फ्रिडरिच मर्ज. इस मंच पर हर साल सैकड़ों की तादाद में बिजनेसमैन, बुद्धिजीवी और सिविल सोसाइटी के प्रतिनिधि जमा होते हैं. इस बार की बैठक में 130 से अधिक देशों के करीब 3,000 नेताओंं के आने उम्मीद है.
क्या है विश्व आर्थिक मंच? जहां हर साल जुटते हैं दुनिया के बड़े नेता, बिजनेसमैन और बुद्धजीवी
स्विट्जरलैंड के दावोस में 19 जनवरी से विश्व आर्थिक मंच की बैठक चल रही है. इस बैठक में कई देशों के राष्ट्राध्यक्ष पहुंच रहे हैं. इसमें भारत के कई राज्यों के कई सीएम भी पहुंचे हैं. लेकिन कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि ये सब वहां पिकनिक (घूमने) गए हैं


विश्व आर्थिक मंच की इस सालाना बैठक में भारत के रेलवे, सूचना एवं प्रसारण और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव , किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान और रिन्यूबल एनर्जी मिनिस्टर प्रह्लाद जोशी वगैरा हिस्सा ले रहे हैं. इसके अलावा भारत के कई राज्यों जैसे कि महाराष्ट्र के सीएम देवेंद्र फडणवीस , मध्य प्रदेश के सीएम मोहन यादव और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू समेत कई दूसरे सीएम पहुंचे हैं. लेकिन भारत में अब इसको लेकर राजनीति शुरू हो गई है. कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि भारत के मुख्यमंत्री सब वहां पिकनिक (घूमने) गए हैं. ऐसे में जानते हैं कि विश्व आर्थिक मंच क्या है? विश्व आर्थिक मंच की शुरुआत कब हुई? वहां ये सब नेता वहां जाकर करते क्या हैं? इससे फायदा क्या होता है?
विश्व आर्थिक मंच (WEF) क्या है?विश्व आर्थिक मंच को अंग्रेजी में World Economic Forum कहते हैं. संक्षेप में इसे WEF कहा जाता है. यह एक अंतरराष्ट्रीय गैर-सरकारी संस्था (NGO) और थिंक टैंक है. इसका हेड ऑफिस स्विट्जरलैंड के जिनेवा के पास कोलोग्नी नामक जगह पर है. यह संस्था दुनियाभर के नेताओंं, बिजनेसमैन और नीति-निर्माता एक मंच पर लाने का काम करती है. इस मंच पर वैश्विक समस्याओं और भविष्य की चुनौतियों पर मिलकर चर्चा की जाती है. World Economic Forum की बैठक हर साल जनवरी के आखिर में दावोस (स्विट्ज़रलैंड) में होती है.
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World Economic Forum स्थापना कब हुई?विश्व आर्थिक मंच की स्थापना 24 जनवरी 1971 को जर्मनी के इंजीनियर और प्रोफेसर क्लॉस श्वाब ने की थी. शुरुआत में इसका नाम यूरोपियन मैनेजमेंट फोरम था. साल 1987 में इसका नाम बदलकर World Economic Forum कर दिया गया.
विश्व आर्थिक मंच का मसकद क्या है?विश्व आर्थिक मंच की वेबसाइट और विकीपीडिया में बताया गया है कि विश्व आर्थिक मंच मकसद दुनिया के हालातों को बेहतर बनाना. इसके लिए यह बिजनेस, राजनीति, शिक्षा और सिविल सोसाइटी के नेताओं को एक साथ लाकर वैश्विक, क्षेत्रीय और औद्योगिक एजेंडा तय करने पर जोर दिया जाता है. विश्व आर्थिक मंच का दावा है कि दुनिया की बड़ी समस्याओं का हल अकेले कोईएक देश नहीं, बल्कि मिलकर बातचीत से निकाल सकता है.
विश्व आर्थिक मंच की ज्यादातर फंडिंग करीब 1000 बहुराष्ट्रीय कंपनियों से मिलती है. ये कंपनियां इसकी सदस्य होती हैं और मोटी सदस्यता फीस देती हैं.
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दावोस में नेता और उद्योगपति क्या करते हैं?दावोस में नेता अपने देश और राज्यों के लिए निवेश तलाशते हैं. वे कंपनियों को बताते हैं कि उनके यहां फैक्ट्री लगाने, स्टार्टअप शुरू करने या व्यापार बढ़ाने के क्या फायदे हैं. इसके अलावा इस फोरम में व्यापार, जलवायु परिवर्तन, महंगाई, ऊर्जा संकट और नई तकनीक जैसे मुद्दों पर चर्चा होती है.
वहीं, यह जगह कूटनीति का भी बड़ा मंच है. इस बैठक में कई देश अपने लड़ाई-झगड़े सुलझाने के लिए भी अलग से बैठकर बातचीत करते हैं. उदाहरण के लिए साल 1988 में ग्रीस और तुर्की के बीच तनाव कम करने में इस मंच की प्रमुख भूमिका रही है. साल 1992 में नेल्सन मंडेला और एफडब्ल्यू डी क्लार्क की मुलाकात ऐतिहासिक मानी जाती है. इसी तरह साल 1994 में इजराइल और फिलिस्तीन के बीच समझौते की बातचीत इसी मंच पर शुरू हुई थी.
आम लोगों के लिए इस मंच की बैठक के क्या मायने हैं?यहां दुनिया की बड़ी सरकारें, कॉरपोरेट घराने और वैश्विक संस्थाएं आर्थिक नीतियों, निवेश, टेक्नोलॉजी और विकास की दिशा पर मंथन करती हैं. इन्हीं चर्चाओं के आधार पर भविष्य की नीतियों का एजेंडा बनता है. इस बातचीत का असर महंगाई, रोजगार, ब्याज दरों, उद्योगों के विस्तार और सरकारी प्राथमिकताओं पर पड़ता है. वैसे तो आम आदमी के लिए विश्व आर्थिक मंच की इस बैठक का सीधा कोई बड़ा नुकसान या फायदा तो नहीं होता है. लेकिन अगर कोई देश या राज्य इस मंच पर कोई बड़ी डील कर लेते हैं तो उस राज्य में निवेश आता है. उद्योग लगते हैं. नौकरियां पैदा होती हैं और नई तकनीक आती है.
दूसरी ओर, दावोस की यह सालाना बैठक आलोचनाओं के घेरे में भी रहती है. कई आलोचक इसे अमीरों और ताकतवरों का क्लब कहते हैं. क्योंकि यहां न तो आम जनता की सीधी भागीदारी होती है और न ही जवाबदेही. जानकारों का कहना है कि यहां पर्यावरण संरक्षण, गरीबी और समानता जैसे मुद्दों पर बड़े-बड़े भाषण होते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर इनका असर सीमित होता है. इसी कारण दावोस को कई बार एक प्रभावशाली मंच होने के बावजूद आम आदमी से दूर और कॉरपोरेट हितों से प्रभावित माना जाता है.
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