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कानपुर की संकरी गलियों से निकले, 100 देशों में फैलाया कारोबार, विजयपत सिंघानिया की कहानी

अगर सिंघानिया परिवार के इस कारोबारी साम्राज्य की जड़ों को समझना हो तो आपको मुंबई नहीं बल्कि कानपुर जाना होगा.

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विजयपत सिंघानिया ने कानपुर से 100 देशों में अपना कारोबार फैलाया. (फोटो- India Today)

रेमंड ग्रुप के पूर्व चेयरमैन विजयपति सिंघानिया का 28 मार्च को निधन हो गया. परिवार की तरफ से साझा की गई जानकारी के मुताबिक, 29 मार्च को करीब तीन बजे मुंबई में उनका अंतिम संस्कार किया गया. इस खबर के साथ एक याद भी लौट आई, जब आज के टाटा-अंबानी और अडानी की तरह सिंघानिया परिवार का नाम अक्सर सुर्खियों में छाया रहता था. फिल्मों में जब किसी किरदार को अमीर दिखाना होता तो उसके नाम के साथ 'सिंघानिया' जोड़ देना ही काफी होता था.

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वैसे तो सिंघानिया फैमिली का कारोबारी इतिहास टाटा समूह, बिरला ग्रुप जैसे घरानों की तरह काफी पुराना है लेकिन विजयपति सिंघानिया ने अपनी मेहनत से इस कारोबारी साम्राज्य को न सिर्फ आगे बढ़ाया बल्कि भारत के मिडिल क्लास का स्टेट्स सिंबल बना दिया था. विजयपति सिंघानिया ने रेमंड ग्रुप की कमान संभाली तो काफी लंबे समय से उन्होंने किसी और को रेमंड के बराबर टिकने नहीं दिया. वही, रेमंड जिसके बिना शादी में दूल्हा 'कंप्लीटमैन' नहीं समझा जाता. रेमंड की आइकोनिक टैगलाइन थी 'द कंप्लीट मैन'. यही टैगलाइन इस ब्रांड की सबसे बड़ी ताकत थी. एक दौर ऐसा था जब शादी-ब्याह में खास डिमांड होती है कि रेमंड का सूट जरूर लाना. कई बार रेमंड के सूट के बिना भांवरें रुक जाती थीं.  

अपने बिजनेस घराने को नई ऊंचाईयों पर पहुंचाने वाले विजय सिंघानिया का आखिरी वक्त निजी जीवन को लेकर काफी विवादों में घिरा रहा. उन्हें अपने बेटे के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा. आइए जानते हैं कि जिस कारोबारी विरासत को उन्होंने खड़ा किया, वो आगे कैसे बढ़ी? और आज उसे कौन संभाल रहा है?

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कमला टावर की कहानी

अगर सिंघानिया परिवार के इस कारोबारी साम्राज्य की जड़ों को समझना हो तो आपको मुंबई नहीं बल्कि कानपुर जाना होगा. जब आप कानपुर के पटकापुर मोहल्ले से होते हुए शिवाला की पतली गलियों की तरफ बढ़ते हैं तो भीड़भाड़ वाले और जनरलगंज इलाके में एक पुरानी शान से खड़ी इमारत नजर आती है. नाम है- कमला टावर. साल 1934 में बनी इस इमारत की बनावट किसी ब्रिटिशकालीन पैलेस का अहसास कराती है. इस टावर के ऊपर लगी घड़ी लंदन के किसी क्लॉक टावर की तरह दिखती है. 

कभी यही इमारत JK Group का मुख्यालय हुआ करती थी. इसे जेके हाउस कहा जाता था. यहीं से उस कारोबारी सोच ने आकार लिया, जिसने आगे चलकर देश के बड़े औद्योगिक घरानों में अपनी जगह बनाई.

JK नाम कैसे पड़ा?

आमतौर पर भारत में ज्यादातर बिजनेस घरानों के नाम उनकी जाति, सरनेम या पारिवारिक पहचान पर ही आधारित होते हैं. जैसे- Tata Group, Birla Group या Ambani या Adani . लेकिन सिंघानिया परिवार का मामला थोड़ा अलग है. सिंघानिया नाम के साथ 'JK' कैसे जुड़ा इसके पीछे भी एक दिलचस्प कहानी है. जेके नाम कमलापत और उनके पिता सेठ जुग्गीलाल के नाम के शुरुआती अक्षरों से लिया गया है. लाला जुग्गीलाल सिंघानिया और लाला कमलापत सिंघानिया ने इस समूह की नींव रखी थी. जेके ग्रुप की स्थापना 1918 में हुई थी. अब ये समहू तीन मुख्य बिजनेस ग्रुप में बंट चुका है. कानपुर से शुरू हुए इस घराने के तीन मुख्यालय हैं- कानपुर, मुंबई और दिल्ली. इस पूरे समूह को जेके ऑर्गनाइजेशन कहते हैं.

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जेके मंदिर कानपुर के अभिलेखों के मुताबिक, सिंघानिया फैमिली 1775 में राजस्थान के झुंझुनू जिले के एक छोटे से कस्बे सिंघाना से कानपुर के पास फर्रुखाबाद (उस समय एक छोटा व्यापारिक कस्बा) में बस गए. उन्होंने बैंकर के रूप में शुरुआत की और अपना बिजनेस बढ़ाया. बाद में इनका परिवार कानपुर आया. कमलापत के बाद उनके तीन बेटों सर पदमपत सिंघानिया, लाला कैलाशपत और लाला लक्ष्मीपत ने कारोबार संभाला. पदमपत सिंघानिया कानपुर से कारोबार संभालते रहे, जबकि उनके छोटे भाई मुंबई और कोलकाता चले गए. आज की तारीख में जेके ऑर्गनाइजेशन का बिजनेस दुनिया के 100 से भी ज्यादा देशों में फैल चुका है.

जेके ग्रुप का कारोबारी साम्राज्य कितना बड़ा

जेके ऑर्गनाइजेशन (JK Organisation) आज भी भारत के सबसे बड़े समूहों में से एक है. समूह की कई कंपनियां शेयर बाजार में लिस्टेड हैं. जैसे जेके टायर, जेके सीमेंट, जेके लक्ष्मी सीमेंट, जेके पेपर, जेके एंटरप्राइजेज, जेके एग्री जेनेटिक्स (जेके सीड्स) और जेके डेयरी (उमंग डेयरीज) में बहुसंख्यक हिस्सेदारी है. परिवार की कुछ निजी स्वामित्व वाली कंपनियां रेमंड ग्रुप, जेके एंसेल, जेके टेक, जेके फेनर, जेके इंश्योरेंस ब्रोकर्स और ग्लोबल स्ट्रेटेजिक टेक्नोलॉजीज हैं. 

पूरे देश में कानपुर में जेके ग्रुप की सबसे ज्यादा मिले रहीं हैं. इनमें कपड़ा, जूट, स्पिनिंग से लेकर कई मिले हैं. इस समूह की जेके कॉटन स्पिनिंग और वीविंग मिल्स (JK Cotton Spinning and Weaving Mills) इसमें सबसे खास थी.  इनमें से कई मिलें अब बंद हो चुकी हैं. कानपुर का जेके मंदिर (राधा कृष्ण) भी सिंघानिया फैमिली का है. जेके ऑर्गनाइजेशन शेयर बाजार में लिस्टेड नहीं हैं लेकिन इसके तहत कई कंपनियां काम कर रही हैं जो बाजार में लिस्टेड हैं. इस वजह से जेके ऑर्गनाइजेशन का कुल नेटवर्थ कितना है ये बताना मुश्किल है. कुछ रिपोर्ट्स में इस समूह का कुल नेटवर्थ 50-60 हजार करोड़ रुपये के आसपास बताया गया है.

विजयपति सिंघानिया का कारोबारी सफर

विजयपत सिंघानिया लाला कैलाशपत सिंघानिया के बेटे थे. उनका जन्म 4 अक्टूबर 1938 को हुआ था. उन्होंने 1980 में रेमंड का नेतृत्व संभाला और साल 2000 तक रेमंड ग्रुप के अध्यक्ष और एमडी के रूप में काम किया. वहीं, वे एक सफल कारोबारी के साथ बहुत ही अच्छे पायलट थे. उनका दिल आसमान में बसता था. साल 1988 में उन्होंने लंदन से अहमदाबाद तक एक माइक्रोलाइट विमान को अकेले उड़ाकर दुनिया को चकित कर दिया. 9,000 किलोमीटर से अधिक की इस यात्रा ने उन्हें एक पायलट के रूप में स्थापित कर दिया. वे यहीं नहीं रुके. साल 2005 में 67 साल की आयु में उन्होंने गर्म हवा के गुब्बारे में सबसे ऊची उड़ान का विश्व रिकॉर्ड बनाया. साल 2006 में उन्हें पदम भूषण से सम्मानित किया गया.  

जब लिखनी पड़ी ‘Incomplete Man’

रेमंड समूह को आगे बढ़ाने वाले विजयपत सिंघानिया के जिंदगी का सबसे दर्दनाक मोड़ तब आया जब उन्हें अपने बेटे गौतम सिंघानिया के खिलाफ अदालत  का दरवाजा खटखटाना पड़ा. इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट बताती है कि साल 2015 में उन्होंने रेमंड ग्रुप में अपनी पूरी 37% हिस्सेदारी (करीब 1000 करोड़ रुपये) अपने छोटे बेटे और रेमंड के तत्कालीन अध्यक्ष गौतम सिंघानिया को दे दी थी. बाद में एक इंटरव्यू में उन्होंने अपने इस फैसले को सबसे बड़ी गलती बताया. हालात ऐसे बने कि कभी ग्रुप के चेयरमैन रहे विजयपत सिंघानिया को अपने ही घर में रहने के लिए कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी.

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