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भारत के स्टार्टअप्स में पैसा लागने से क्यों बच रही हैं विदेशी कंपनियां?

दुनिया के बड़े स्टार्टअप्स निवेशक जैसे टाइगर ग्लोबल, सिकोइया कैपिटल, सॉफ्टबैंक, एक्सेल और वाय कॉम्बीनेटर जैसी विदेशी वीसी फर्मों ने भारतीय स्टार्टअप्स की फंडिंग करीब-करीब बंद कर दी है.

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टाइगर ग्लोबल और एक्सेल ने पिछले साल के मुकाबले इस साल जनवरी से अब तक भारतीय स्टार्टअप्स में 97 फीसदी कम निवेश किया है

देश के स्टार्टअप्स के सामने पैसों की किल्लत हो गई है. दुनिया की बड़ी-बड़ी वेंचर कैपिटल फर्म भारतीय स्टार्टअप्स में पैसा लगाने से बच रही हैं. समाचार पत्र बिजनेस स्टैंडर्ड की एक रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई है. आगे बढ़ने से पहले जानते हैं कि वेंचर कैपिटल या वीसी फर्म क्या होती हैं. दरअसल वेंचर कैपिटल फर्म एक तरह से प्राइवेट इन्वेस्टर हैं जो अपना पैसा स्टार्टअप कंपनियों और छोटे बिजनेस में लगाते हैं. आमतौर वीसी फर्म ऐसे स्टार्टअप्स में पैसा लगाते हैं जिनके बारे में माना जाता है कि वे लॉन्ग-टर्म में अच्छा खासा मुनाफा देने की क्षमता रखते हैं. ये वेंचर कैपिटल फर्में निवेश के बदले में उस कंपनी में हिस्सेदारी लेती हैं.

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रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के बड़े स्टार्टअप्स निवेशक जैसे टाइगर ग्लोबल, सिकोइया कैपिटल, सॉफ्टबैंक, एक्सेल और वाय कॉम्बीनेटर (Y Combinator) जैसी विदेशी वीसी फर्मों ने भारतीय स्टार्टअप्स की फंडिंग करीब-करीब बंद कर दी है. मार्केट इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म Trackxn के आंकड़ों के मुताबिक टाइगर ग्लोबल और एक्सेल ने पिछले साल के मुकाबले इस साल जनवरी से अब तक भारतीय स्टार्टअप्स में 97 फीसदी कम निवेश किया है. सिकोइया कैपिटल ने इस दौरान भारतीय स्टार्टअप्स में 95 फीसदी कम निवेश किया है. इसी तरह से वाई कॉम्बिनेटर ने पिछले साल के मुकाबले भारतीय स्टार्टअप्स में इस साल अब तक 87 फीसदी कम निवेश किया है जबकि सॉफ्टबैंक ने भारतीय स्टार्टअप्स में 80 फीसदी कम फंडिंग की है. ये वीसी फर्में भारत की उभरती कंपनियों में मोटा पैसा लगाती रही हैं. उदाहरण के तौर पर सिकोइया कैपिटल ने क्रेड, डेलीहंट, हेल्थकार्ट और मीशो में काफी पैसा लगा रखा है. इसी तरह से वाई कांबीनेटर का जेप्टो, ग्रो और मीशो में मोटा निवेश है. 

अब समझते हैं कि ये विदेशी पैसा भारतीय स्टार्टअप्स की तरक्की के लिए कितना जरूरी है. आंकड़ों के मुताबिक 2022 में भारतीय स्टार्टअप्स ने करीब दो लाख 21 हजार 430 करोड़ रुपये जुटाए थे. इनमें से करीब 2 लाख 15 हजार करोड़ रुपये का विदेशी निवेशकों से आया था. इस तरह से देखें तो भारतीय स्टार्टअप्स विदेशी निवेशकों के पैसे की बदौलत ही उड़ान भर रहे थे. लेकिन इन विदेशी निवेशकों की तरफ से हाथ सिकोड़ने से इन स्टार्टअप्स की मुश्किलें बढ़ सकती हैं. इस साल जनवरी से अब तक भारत के स्टार्टअप्स में विदेशी निवेश 72 फीसदी घटकर सिर्फ 38 हजार करोड़ रुपये रह गया है, जबकि पिछले साल इसी दौरान करीब 1 लाख 34 हजार करोड़ रुपये का विदेशी निवेश इन स्टार्टअप्स को हासिल हुआ था.

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टाइगर ग्लोबल को भारत में यूनिकॉर्न पैदा करने की मशीन कहा जाता है. यूनिकॉर्न का मतलब ऐसा स्टार्टअप जिसकी वैल्यूएशन एक अरब डालर (आज की तारीख में मोटा मोटी करीब 8250 करोड़ रुपये) से ज्यादा हो. फ्लिपकार्ट, ओला, ज़ोमैटो और 37 अन्य स्टार्टअप आगे चलकर यूनिकॉर्न बन गए. इन सभी स्टार्टअप्स में टाइगर ग्लोबल ने पैसा लगा रखा था. कई कंपनियों में अब भी इसका मोटा निवेश है. वीसी फर्म एक्सेल की बात करें तो फ्लिपकार्ट और फ्रेशवर्क्स में सीड फंडिग यानी शुरुआती निवेश किया था. इसी तरह से जापान के सॉफ्टबैंक ने ओयो, डेल्हीवरी, पेटीएम, मीशो, ब्लिंकिट, लेंसकार्ट और कई दूसरी कंपनियों में निवेश किया है.

हालांकि विदेशी वेंचर कैपिटल फर्में भले ही भारतीय स्टार्टअप्स मैं पैसा लगाने से किनारा कर रहे हों लेकिन भारत के वीसी फर्मों ने भारतीय स्टार्टअप्स को कुछ राहत दी है. भारतीय वीसी फर्मों ने पिछले दो महीने में भारतीय स्टार्टअप्स के लिए पैसे का जुगाड़ किया है. इस मामले में वीसी फर्म मल्टीपल्स अल्टरनेट एसेट मैनेजमेंट सबसे आगे है. इस वीसी फर्म ने 5300 करोड़ रुपये,  3 वन 4 कैपिटल ने 1650 करोड़ रुपये, चिरेटा वेंचर्स करीब 1000 करोड़ रुपये और स्ट्राइड वेंचर्स 826 करोड़ रुपये की रकम भारतीय स्टार्टअप्स के लिए जुटाई है. लेकिन यह रकम भारतीय स्टार्टअप्स के लिए काफी कम है. इस वजह से भारतीय स्टार्टअप्स को न सिर्फ अपनी विस्तार योजना पर ब्रेक लगाना पड़ रहा है बल्कि लागत घटाने के लिए अपने कर्मचारियों की छंटनी भी करनी पड़ रही है.  आपको बता दें कि आंकड़ों के अनुसार, पिछले साल से फंडिंग की कमी की समस्या का सामना कर रहे भारतीय स्टार्टअप अब तक करीब 27 हजार लोगों की छंटनी कर चुके हैं. 

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