गर्मी का मौसम शुरू हो चुका है. पारा 45 डिग्री सेल्सियस के पार जाने को उतावला है. जाहिर है पानी की मांग तेजी से बढ़ने वाली है. बोतलबंद पानी का बिजनेस करने वालों के लिए ये 'गोल्डन पीरियड' होता है. लेकिन ईरान युद्ध का असर इस उद्योग पर दिखने लगा है. बीबीसी की एक रिपोर्ट बताती है कि युद्ध का असर कच्चे माल और पैकेजिंग पर भी पड़ा है. इनकी बढ़ती लागत के चलते कंपनियां दबाव में हैं. दिनों में पानी की कीमतों पर भी इसका असर पड़ सकता है.
बीयर और बोतलबंद पानी पीने वालों को ईरान युद्ध परेशान करने वाला है?
पिछले महीने बोतलबंद पानी बनाने वाली भारत की सबसे बड़ी कंपनी बिसलेरी ने कीमतों में 11% का इजाफा किया. इससे पानी का एक बॉक्स 24 रुपये महंगा हो गया. एक बॉक्स में एक लीटर की 12 बोतलें आती हैं. न्यूज एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक बिसलेरी की तरह बैली और क्लियर प्रीमियम वाटर जैसे ब्रांडों ने भी अपनी कीमतें बढ़ा दी हैं.


पिछले महीने बोतलबंद पानी बनाने वाली भारत की सबसे बड़ी कंपनी बिसलेरी ने कीमतों में 11% का इजाफा किया. इससे पानी का एक बॉक्स 24 रुपये महंगा हो गया. एक बॉक्स में एक लीटर की 12 बोतलें आती हैं. न्यूज एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक बिसलेरी की तरह बैली और क्लियर प्रीमियम वाटर जैसे ब्रांडों ने भी अपनी कीमतें बढ़ा दी हैं.
डेटा फॉर इंडिया की तरफ से किए गए एक अध्ययन के अनुसार, शहरी परिवारों में से लगभग 15% और ग्रामीण परिवारों में से 6% लोग बोतलबंद पानी खरीदते हैं. गर्मियों में पानी की काफी दिक्कत रहती है, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में तो साफ पानी मिलना काफी मुश्किल होता है.
पानी को प्योरिफाई करने और उसकी पैकिंग करने वाली कंपनियों ने चेताया है कि ईरान युद्ध से पानी और महंगा हो सकता है. दुनिया का करीब 20% तेल और प्राकृतिक गैस का आवागमन स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से होकर होता है. इस रास्ते को ईरान ने लगभग पूरी तरह से रोक रखा है. इस वजह से दुनियाभर में ईंधन की कीमतें आसमान छू रही हैं. इसकी आंच भारत में भी महसूस की जा रही है.
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कच्चे तेल का इस्तेमाल पानी की बोतल बनाने में होता हैमहाराष्ट्र बोतलबंद जल निर्माता संघ के अध्यक्ष विजय सिंह दुब्बल बताते हैं कि बोतलबंद पानी (जो आमतौर पर प्लास्टिक की बोतलों में बेचा जाता है) के महंगा होने का मुख्य कारण कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें हैं. पश्चिम एशिया में जारी लड़ाई की वजह से इस हफ्ते की शुरुआत में ब्रेंट क्रूड ऑयल के एक बैरल की कीमत 119 डॉलर तक पहुंच गई थी.
कच्चे तेल का इस्तेमाल पॉलीइथिलीन टेरेफ्थालेट (पीईटी) रेजिन पेलेट्स बनाने के लिए किया जाता है. ये एक तरह के दाने होते हैं जिन्हें गर्म करके सांचों से गुजारकर पीईटी प्रीफॉर्म तैयार होते हैं. प्लास्टिक की टेस्ट ट्यूब जैसी दिखने वाली ये प्रीफॉर्म ब्रांडों और बोतल बनाने वाली कंपनियों को बेची जाती हैं ताकि उन्हें मनचाहे आकार और साइज की प्लास्टिक की बोतलों में ढाला जा सके. दुब्बल का कहना है, “प्रीफॉर्म की लागत 115 रुपये प्रति किलो से बढ़कर लगभग 180 रुपये प्रति किलो हो गई है. इसकी सप्लाई भी घटी है.”
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ठप पड़ने लगा कामकाजउन्होंने आगे बताया कि महाराष्ट्र में बोतल बनाने वाली फैक्ट्रियों में से लगभग 20% का कामकाज ठप हो गया है. डब्बल का कहना है कि कुछ कंपनियों ने कीमतें बढ़ा दी हैं. लेकिन कई कंपनियों ने अब तक इन कीमतों को खुद झेल लिया है. लेकिन अगर ईरान युद्ध लंबा खिंचता है तो लोगों को महंगा पानी खरीदने के लिए तैयार रहना होगा.
उन्होंने आगे कहा कि रॉ मटेरियल की सप्लाई में ऐसे समय में दिक्कत आई है जब बियर कंपनियों की तरफ से भी मांग बढ़ती है. अप्रैल और मई के महीनों में बोतलबंद पानी और नॉन एल्कोहलिक बेवरेजेज की मांग में भारी इजाफा होता है.
केमको प्लास्टिक इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक वैभव सारावगी का कहना है कि प्रीफॉर्म की कीमतों में वृद्धि का असर पूरे पैकेजिंग उद्योग पर पड़ेगा, न कि सिर्फ बोतलबंद पानी पर. कांच की बोतलें बनाने वाले भी इस युद्ध की मार झेल रहे हैं. केमको भारत में पीईटी प्रीफॉर्म के सबसे बड़े सप्लायर में से एक है.
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कांच की बोतल की कीमतें बढ़ींपिछले महीने, भारतीय शराब निर्माता संघ ने रॉयटर्स समाचार एजेंसी को बताया कि कांच की बोतलों की कीमतों में लगभग 20% की वृद्धि हुई है. शराब निर्माता संघ ने इन कंपनियों (हेनेकेन और कार्ल्सबर्ग वगैरा) से कहा है कि राज्य सरकार से बात करके बीयर की कीमतों में 12-15% की बढ़ोतरी करें. एजेंसी ने बताया कि कन्फेडरेशन ऑफ इंडियन अल्कोहोलिक बेवरेज कंपनीज ने भी राज्यों को कीमतें बढ़ाने के लिए पत्र लिखा है.
कांच की बोतल बनाने वाली कंपनियां अपने भट्टों को चलाने के लिए प्राकृतिक गैस का उपयोग करती हैं. यह रेत, सोडा ऐश, चूना पत्थर और रीसाइकिल कांच को पिघलाकर पिघले हुए कांच के पिंड बनाते हैं, जिन्हें बाद में बोतलों का आकार दिया जाता है. लेकिन ईरान युद्ध शुरू के बाद से भारत ने प्राकृतिक गैस के इस्तेमाल से जुड़े नियमों को सख्त कर दिया है. प्राकृतिक गैस की आपूर्ति में 20% की कटौती की गई है. इससे कांच निर्माताओं के लिए अपनी भट्टियों को चलाना मुश्किल हो गया है.
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