भारत की अर्थव्यवस्था में हर साल कैश की मात्रा बढ़ रही है. हर साल रिजर्व बैंक को लगभग 2 लाख ऐसे नोटों को नष्ट करना पड़ता है जो इस्तेमाल करने लायक नहीं रह जाते. इनमें से ज्यादातर 100, 200 और 500 के होते हैं. टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक हर साल देश में लगभग 2 लाख नकली नोट पकड़े जाते हैं. इनमें 500 रुपये के नकली नोटों की संख्या लगातार बढ़ रही है.
प्लास्टिक के नोट नकली करेंसी की समस्या खत्म कर देंगे?
अब RBI की तरफ से हाल ही में जारी सालाना रिपोर्ट के आंकड़ों से पता चला है कि साल 2018 से अर्थव्यवस्था में कैश का इस्तेमाल हर साल बढ़ता जा रहा है. देश में जितनी करेंसी चलन में है उसमें से कैश का 90% से अधिक हिस्सा करेंसी नोटों के रूप में है, बाकी सिक्के हैं.


कई देशों ने प्लास्टिक नोटों का इस्तेमाल शुरू कर दिया है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने साल 2007 में प्लास्टिक नोट शुरू करने की योजना बनाई थी. लेकिन 5 शहरों में पायलट प्रोजेक्ट की योजना बनाए जाने के बावजूद प्लास्टिक के नोट अब तक चलन में नहीं आ पाए. फिर साल 2016 में नोटबंदी और ऑनलाइन पेमेंट की शुरुआत से भारतीय अर्थव्यवस्था में नकदी लेनदेन में भारी गिरावट आई थी.
अब RBI की तरफ से हाल ही में जारी सालाना रिपोर्ट के आंकड़ों से पता चला है कि साल 2018 से अर्थव्यवस्था में कैश का इस्तेमाल हर साल बढ़ता जा रहा है. देश में जितनी करेंसी चलन में है उसमें से कैश का 90% से अधिक हिस्सा करेंसी नोटों के रूप में है, बाकी सिक्के हैं.
ये भी पढ़ें: भारत में बंद हो जाएंगे कागज के नोट? RBI कुछ बड़ा करने वाला है
हर साल नष्ट होते हैं करोड़ों कीमत के नोटफिलहाल जो नोट बाजार में चल रहे हैं वे कपास के गूदे (कॉटन पल्प) से बने कागज पर छपे होते हैं. कपास के रेशों से कॉटन पल्प तैयार होता है. लेकिन ज्यादा इस्तेमाल और भारत की उमस भरी जलवायु के कारण ये नोट जल्दी खराब हो जाते हैं.
RBI ने पिछले साल 1 लाख 70 हजार से कुछ ज्यादा कटे-फटे नोट नष्ट किए. यह पिछले दो सालों की तुलना में थोड़ा कम है. नष्ट किए गए नोटों में से ज्यादातर 100 रुपये और 500 रुपये के थे और इनकी कुल कीमत 3.5 करोड़ रुपये थी.
इसका जबाव है हां. काफी हद तक ये दिक्कत खत्म हो जाएगी. वे कागज के नोटों की तुलना में कम खराब होते हैं. अनुमान है कि कम मूल्य वाले जैसे 10-20 वगैरा कागजी नोटों का जीवनकाल 1-2 साल होता है. ये नोट काफी चलन में आते हैं और एक हाथ से दूसरे हाथ में जल्दी जल्दी जाते रहते हैं. वहीं, बड़े नोटों का जीवनकाल लगभग 5-7 साल होता है.
बैंक ऑफ इंग्लैंड की तरफ से साल 2013 में किए गए एक अध्ययन में कहा गया था कि कम कीमत की करेंसी के मामले में प्लास्टिक के नोट कागज के नोटों की तुलना में कम से कम दोगुने समय तक चल सकते हैं और बड़े नोट पांच गुना ज्यादा. यह भी कहा गया था कि प्लास्टिक के नोटों के इस्तेमाल से पर्यावरण को भी फायदा है, क्योंकि ये नोट लंबे समय तक चलते हैं और कागज के नोटों की तुलना में इन्हें बार-बार छापने की जरूरत नहीं होती है.
ये भी पढ़ें: ताइवान का शेयर बाजार भारत से बड़ा कैसे हो गया? इस कंपनी ने खेला कर दिया
क्या नकली नोट खत्म हो जाएंगे?किसी भी करेंसी नोट के साथ एक बड़ी समस्या नकली नोटों का खतरा होता है. साल 2016 में नोटबंदी का एक प्रमुख उद्देश्य नकली नोटों पर लगाम लगाना था. भारत के नोटों में काफी सेफ्टी फीचर हैं लेकिन इसके बाद भी नकली नोट बढ़े हैं.
RBI के आंकड़ों के मुताबिक साल 2025-26 में पाए गए 500 रुपये के जाली नोटों की संख्या पिछले दो सालों की तुलना में ज्यादा थी. टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट बताती है कि प्लास्टिक नोटों की नकल करना मुश्किल माना जाता है. ऑस्ट्रेलिया ने 1970 के दशक में पॉलिमर नोटों पर प्रयोग शुरू किए और 1990 के दशक में इन्हें औपचारिक रूप से अर्थव्यवस्था में शामिल किया.
ऑस्ट्रेलिया के रॉयल बैंक की हाल ही में जारी सालाना रिपोर्ट के मुताबिक वित्त वर्ष 2024-25 में नए करेंसी नोटों की केवल 118 नकली प्रतियां ही पकड़ी गईं. इसके अलावा जिन दूसरे देशों में नकली नोट इस्तेमाल होते हैं वहां ज्यादातर नकली करेंसी कागज की बनी होती हैं. इससे इसे पहचानना आसान हो जाता है.
वीडियो: 'धर्मेंद्र प्रधान को बर्खास्त करो', CBSE के अध्यक्ष और सचिव के तबादले पर राहुल गांधी का हमला






















