दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था माने जाने वाले चीन के पाए चरमराते दिख रहे हैं. हालिया आंकड़ों के आधार पर कहा जा रहा है कि चीन में अब डिफ्लेशन का दौर शुरू हो गया है. इसे अपस्फीति भी कहते हैं. ये स्थिति तब बनती है जब सामान के दाम लगातार घटना शुरू हो जाते हैं. अब आप कहेंगे कि दाम सस्ते होना तो अच्छी बात है. इसमें दिक्कत क्या है? लेकिन दिक्कत है. जानते हैं महंगाई कम होना नेगेटिव कैसे है और इसका चीन की इकॉनमी से क्या लेना देना है.
नौकरी-बिजनेस नहीं, रियल एस्टेट खत्म, निर्यात ध्वस्त, चीन की ऐसी गत किसने कर दी?
चीन से बुधवार को महंगाई के आंकड़े आए जो डराने वाले हैं, क्योंकि चीनी अर्थव्यवस्था के गिरने का असर भारत पर भी पड़ सकता है.
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बात तो सही है. किसी भी चीज की अति ठीक नहीं होती. इकॉनमी भी इसी नियम पर काम करती है. चीजों के दाम सामान्य स्तर से घटे-बढ़ें तो इकॉनमी को इसका फायदा मिलता है. लेकिन दाम अगर बहुत तेजी से बढ़ने या घटने लगें तो इकॉनमी को इसका खामियाजा भुगतना पड़ता है. चीन में भी यही हुआ है.
बुधवार को चीन से महंगाई के आंकड़े आए. वहां जुलाई में कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) पिछले साल की तुलना में 0.3 फीसदी नीचे पहुंच गया. इससे पहले CPI में इतनी गिरावट फरवरी 2021 में देखी गई थी. किसी सामान या सर्विस के लिए एक आम आदमी को जो पैसे देने पड़ते हैं, CPI उसी का ब्योरा देने वाला इंडेक्स है.
इसी तरह एक और इंडेक्स होता है प्रोडक्शन प्राइस इंडेक्स (PPI), जो फैक्ट्री से निकलते समय सामानों के दाम यानी फैक्ट्री रेट का ब्योरा देता है. चीन में CPI के साथ PPI इंडेक्स भी अनुमान से नीचे पहुंच गया है. जुलाई में यह 4.4 फीसदी पर आ गया. जबकि, अनुमान 4.1 फीसदी रहने का था. कंपनियां आमतौर पर फायदा जोड़कर फैक्ट्री वाला रेट तय करती हैं. इसी से उनका मुनाफा तय होता है. इसलिए, PPI घटने का मतलब है कि कंपनियों का भी फायदा घट रहा है. ये भी कह सकते हैं कि देश में कारोबारी गतिविधियां घट रही हैं.
डच बैंक के रिसर्च स्ट्रैटजिस्ट जिम रीड ने बिजनेस इनसाइडर को बताया कि चीन में CPI और PPI दोनों इंडेक्स एक साथ घट रहे हैं. ऐसी स्थिति पिछली बार 2020 में बनी थी. तब भी डिफ्लेशन का दौर नजर आया था. एक बार फिर वही स्थिति बनती दिख रही है. इसलिए ये कहा जा सकता है कि चीन में डिफ्लेशन का दौर शुरू हो गया है.
चीन डगमगाया तो दुनिया भर में दिखेगा असरचीन में खाने-पीने की चीजों, ट्रांसपोर्टेशन और घरेलू चीजों के दाम अच्छे खासे गिरे हैं. वहां मीट के रूप में सबसे ज्यादा पोर्क (सूअर का मांस) की खपत होती है. जुलाई में पोर्क के दाम 26 फीसदी घट गए हैं. सब्जियां भी डेढ़ फीसदी सस्ते हो गई हैं.
कई एक्सपर्ट कह रहे हैं कि 2020 में डिफ्लेशन कुछ ही समय रहा था. मगर इस बार यह लंबे समय तक रह सकता है. डिफ्लेशन गहराया तो सरकार को और खर्च बढ़ाना पड़ेगा. सरकार पहले से ही काफी कर्ज में है. खर्च बढ़ाने के लिए उसे और उधार लेना पड़ सकता है. जो व्यापक स्तर पर चीन की अर्थव्यवस्था के लिए नेगेटिव है.
वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के मुताबिक, चीन के जीडीपी का 1% नीचे जाने का मतलब है कि ग्लोबल जीडीपी में 0.3 फीसदी की गिरावट. इसलिए ये साफ है कि चीन की इकॉनमी कमजोर हुई तो इसका असर अमेरिका, ब्रिटेन जैसे विकसित देशों के साथ-साथ भारत जैसे देशों पर भी आएगा.
कैसे हुआ चीन का ये हाल?चीन में अर्थव्यवस्था के इस कगार पर पहुंचने का सीधा कारण है डिमांड में कमी. दरअसल, चीन ने कोविड-19 से निपटने के लिए बेहद सख्त पॉलिसी लागू की थी. नतीजा ये हुआ कि ब़ड़ी संख्या में कारोबार बंद हुए, नौकरियां गईं. आर्थिक तरक्की की रफ्तार सुस्त हो गई. इन वजहों से लोगों के पास बचत बहुत कम रह गई.
यही कारण है कि अब लोग पैसे खर्च करने से बच रहे हैं. जिनके पास पैसे हैं भी, वो इस उम्मीद में पैसे खर्च नहीं कर रहे कि दाम अभी और घट सकते हैं. इस तरह कंपनियों के पास मांग कम आ रही है. रियल एस्टेट सेक्टर में मंदी, रिटेल सेल्स के आंकड़े, एक्सपोर्ट-इंपोर्ट में गिरावट, बेरोजगारी के बढ़ते आंकड़े चौतरफा डिमांड घटने का सबूत दे रहे हैं.
दिवालिया हो रहा है रियल एस्टेट सेक्टरसबसे बुरा हाल तो चीन के रियल एस्टेट सेक्टर का बताया जाता है. चीनी रियल एस्टेट कंपनियों पर दोहरी मार पड़ रही है. मांग नहीं होने की वजह से घर बिक नहीं रहे, तो कमाई नहीं हो पा रही है. सरकारी आकड़ों के मुताबिक 2022 के सितंबर महीने में प्रॉपर्टी मार्केट की ग्रोथ 26.8 फीसदी तक घट गई थी. कमाई नहीं हो रही तो कंपनियां कर्जदारों को पैसे लौटा नहीं पा रही हैं और दिवालिया होने की कगार पर पहुंच रही हैं.
प्रॉपर्टी मार्केट में जान भरने के लिए कंपनियां हर संभव कोशिश कर रही हैं. कई तरह के लुभावने ऑफर दिए जा रहे हैं, फिर भी हाल जस के तस हैं. चीन के एक शहर में एक फ्लैट के साथ दूसरा फ्लैट फ्री दिया जा रहा है. फिर भी फ्लैट खरीदने वाला कोई नहीं है. ये हाल एक नहीं कई शहरों का है. इनमें इतने ज्यादा खाली फ्लैट्स हैं कि ये शहर ‘घोस्ट टाउन’ यानी 'भूतहा नगरी' के नाम से दुनिया भर में मशहूर हो रहे हैं. अब आप पूछेंगे कि एक फ्लैट के साथ दूसरा फ्री मिल रहा है, उसके बाद भी लोग घर क्यों नहीं खरीद रहे?
फ्लैट फ्री, फिर क्यों नहीं बिक रहे घर?दरअसल ये जो फ्लैट्स हैं, उनका दाम 1.45 मिलियन युवान है, जो भारतीय रुपये में 1.7 करोड़ के आसपास बैठता है. ये फ्लैट जिन अरबपतियों के लिए बनाए गए थे, वो अब फ्लैट्स पर खर्चा करने से बच रहे हैं. और जिस गांव में ये फ्लैट्स बने हैं, वहां के लोगों की एक महीने की औसत सैलरी ही 36-46 हजार रुपये के आसपास है. आप अंदाजा लगा सकते हैं कि 36 हजार कमाने वाले एक करोड़ रुपये के फ्लैट कहां से खरीदेंगे.
घर नहीं बिकने की वजह से रियल एस्टेट कंपनी ‘कंट्री गार्डन’ को आर्थिक तंगी हो गई है. वो कर्जदारों को ब्याज नहीं लौटा पा रही है. इसकी वजह से 9 अगस्त को उसके शेयर 16 फीसदी गिर गए और ट्रेडिंग रोक दी गई. दिवालिया होने की कगार पर पहुंचने वाली यह पहली कंपनी नहीं है. दो साल पहले ही चीन की एक और रियल एस्टेट कंपनी ‘एवरग्रांड’ भी दिवालिया होने की कगार पर पहुंच गई थी. इसका मामला अभी भी कोर्ट में है. कंट्री गार्डन और एवरग्रांड दोनों ही चीन की सबसे बड़ी रियल एस्टेट कंपनियों में से एक हैं. डिमांड घटने का ही असर है कि दोनों कंपनियां डूबने की हालत में पहुंच चुकी हैं.
मसला सिर्फ इतना नहीं है. चीन की इकॉनमी में रियल एस्टेट सेक्टर का 30 फीसदी योगदान बताया जाता है. अंदाजा लगा सकते हैं कि ये दोनों कंपनियां डूबती हैं तो चीन की इकॉनमी को कितना बड़ा धक्का लगेगा.
निर्यात-आयात की नैया भी डूब रहीरियल एस्टेट के अलावा आयात-निर्यात के आंकड़े भी हताश करने वाले संकेत दे रहे हैं. किसी देश के आयात-निर्यात के आकड़े सीधे-सीधे अर्थव्यवस्था की दशा-दिशा को बताते हैं. चीन का निर्यात-आयात कुछ महीनों से लगातार घट ही रहा है. चीन के निर्यात में सालाना आधार पर 14.5 फीसदी कमी आई है. फरवरी 2020 यानी महामारी शुरू होने से यह सबसे बड़ी गिरावट है.
चूंकि, चीन की इकॉनमी में निर्यात का भी बहुत बड़ा योगदान है. इसलिए ये आकड़े भी चीनी सरकार के लिए चिंता खड़ी कर रहे हैं. निर्यात घटने का कारण वैश्विक मांग में सुस्ती को माना जा सकता है. वजह जो भी हो असर पड़ना तो तय है. आयात भी लगातार पांचवें महीने गिरा है. आंकड़ों के मुताबिक आयात जुलाई में 12.4 फीसदी गिरा है. जो एक बार फिर घरेलू स्तर पर घटती मांग की तरफ इशारा करता है.
चीन को ले डूबी उसकी कोविड पाबंदीचीन के सरकार का निजी कंपनियों के कारोबार में भी काफी दखल है. ये दखलअंदाजी वैसे ही कंपनियों को रास नहीं आ रही थी. बाद में कोविड की सख्त पाबंदियों से उनका मन पूरी तरह चीन से उखड़ गया. नतीजा ये हुआ है कि विदेशी कंपनियां अब चीन छोड़कर दूसरे देशों में फैक्ट्री लगा रही हैं. चीन में एफडीआई, जो कभी रिकॉर्ड स्तर पर था, वो अब रिकॉर्ड निचले स्तर पर जा चुका है.
शंघाई, जो चीन का आर्थिक केंद्र था, उस इलाके में घरों को किराया करीबन 10,000 डॉलर के आसपास होता था. यानी करीब 8 लाख 26 हजार रुपये. इन घरों में विदेशी कंपनियों के अधिकारी रहते थे. लेकिन चीनी सरकार के उल्टे-सीधे कानूनों की वजह से बड़ी-बड़ी कंपनियों के सीईओ चीन छोड़कर दूसरे देश जाने लगे हैं. कंपनियां बंद होने की वजह से रोजगार घट रहे हैं. इसलिए वहां बेरोजगारी भी रिकॉर्ड स्तरों पर पहुंच रही है.
एशियन डेवलपमेंट बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक चीन में 10 में से 6 लोगों के पास ही नौकरी है. बाकी लोग बेरोजगार बैठे हुए हैं. सरकारी आकड़ों के मुताबिक 16 से 24 साल के बेरोजगारों की संख्या 21.3% बढ़कर 1 करोड़ 20 लाख पर पहुंच गई है.
सरकार के पास क्या उपाय है?चीन की सरकार का अब पूरा फोकस इकॉनमी में मांग बढ़ाने पर है. इसके लिए सरकार नीतियों का सहारा ले सकती है. लेकिन अकेले डिमांड बढ़ाने से उसकी परेशानी दूर नहीं होगी. जानकारों के मुताबिक अगर रोजगार की समस्या दूर करनी है तो उसे कंपनियों के लिए कारोबारी माहौल आसान बनाना होगा. तभी कंपनियां जमकर कारोबार शुरू कर सकेंगी और लोगों को रोजगार दे सकेंगी. तभी लोगों के पास पैसे भी आएंगे और खुलकर खर्च भी देखने को मिलेगा.














