हाल ही में एक सोशल मीडिया पोस्ट में लखनऊ के एक व्यक्ति ने बताया कि वह अपनी मां की हेल्थ बीमा पॉलिसी के लिए हर साल लगभग 50,000 रुपये प्रीमियम के रूप में चुकाए. लेकिन जब उनकी मां बीमार पड़ीं, तो बीमा कंपनी ने क्लेम देने से पल्ला झाड़ लिया. उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें घंटों इंतजार कराया गया. उन्होंने यह भी दावा किया कि एक एजेंट ने उनसे कहा, "हमसे पूछकर पॉलिसी थोड़ी ली थी."
हेल्थ इंश्योरेंस के बारे में ये 7 बातें जान लीजिए, बीमा कंपनी को क्लेम देना ही पड़ेगा!
हाल ही में एक सोशल मीडिया पोस्ट में लखनऊ के एक व्यक्ति ने बताया कि वह अपनी मां की हेल्थ बीमा पॉलिसी के लिए हर साल लगभग 50,000 रुपये प्रीमियम के रूप में चुकाया . लेकिन जब उनकी मां बीमार पड़ीं, तो बीमा कंपनी ने क्लेम देने से पल्ला झाड़ लिया.
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यह पूरा मामला लखनऊ का है. जिस कंपनी पर आरोप लगे उसका बीमा कंपनी का नाम स्टार हेल्थ एंड एलाइड इंश्योरेंस है. लेकिन इस घटना के बाद एक तगड़ी बहस छेड़ दी है कि क्या स्वास्थ्य बीमा खरीदना ही पर्याप्त है या असली लड़ाई तब शुरू होता है जब कोई इंश्योरेंस क्लेम करे.
लोगों की आधी बचत इलाज में खर्च हो जाती हैहेल्थ इंश्योरेंस हर परिवार की जरूरत बन चुका है. इलाज कराने की बढ़ती लागत इसकी एक बड़ी वजह है. इसके अलावा कोरोना महामारी से भी बड़ा सबक मिला है जब लोगों को अस्पताल के बिल भरने में काफी पैसा खर्च करना पड़ा था. इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट बताती है कि लोगों की करीब आधी बचत इलाज में खर्च हो जाती है. लेकिन कई बार बीमा खरीदते समय ग्राहक सभी शर्तों को ठीक से नहीं समझ पाते हैं और जब परिवार में अचानक से किसी को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ता है. उस समय उन्हें पता चलता है कि पॉलिसी में कुछ सीमाएं, शर्तें हैं. रिलायंस जनरल इंश्योरेंस के सीईओ राकेश जैन ने इकोनॉमिक टाइम्स से बाचतीत में कहा कि इंश्योरेंस क्लेम रिजेक्ट होने की कई वजहें हो सकती हैं. उनका कहना है कि पॉलिसी की शर्तों को ठीक से न समझ पाना.
पहले से मौजूद बीमारियों (pre-existing conditions) के बारे में छुपाना और जो बीमारी पॉलिसी में कवर नहीं है उसका क्लेम करना आदि.
ऐसे में आज हम आपको हेल्थ इंश्योरेंस से जुड़ी 7 ऐसी जरूरी बातें बताने जा रहे हैं ताकि आप हेल्थ बीमा खरीदते समय और क्लेम करते समय पता रहे और बाद में आपको दिक्कत का सामना न करना पड़े. अगर ये बातें आपको पहले से पता नहीं होंगी तो ये आपकी जेब पर भारी पड़ सकती हैं.
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कई ग्राहक यह मान लेते हैं कि हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी खरीदते ही उसी दिन से हर बीमारी और हर इलाज कवर हो जाएगा. लेकिन आमतौर पर ऐसा नहीं होता. हर स्वास्थ्य बीमा योजना में कुछ खास इलाज और पहले से मौजूद बीमारियों के लिए वेटिंग पीरियड तय होता है. इसका मतलब ये हुआ कि पॉलिसी लेने के बाद एक निश्चित समय तक उन बीमारियों का बीमा क्लेम नहीं मिलता. उदाहरण के लिए हर्निया या मोतियाबिंद की सर्जरी वगैरा. इसलिए पॉलिसी खरीदते समय बीमा कंपनी से जरूर पता कर लें कि पहले दिन से कौन सी बीमारियां कवर नहीं होंगी.
सिगरेट- शराब पीते हैं तो बीमा कंपनी को बताना जरूरीआपके लिए भले ही दिन में दो चार कश लगाने (सिगरेट पीने) या वीकेंड पर दोस्तों के साथ कुछ पैग लेना लाइफ स्टाइल का हिस्सा हो लेकिन बीमा कंपनियां इस तरह की आदत वाले लोगों को बीमा बेचते बारीकी से देखती हैं. कैंसर सर्वाइवर और डायबिटीज जैसी बीमारियों से ग्रसित लोगों के लिए स्वास्थ्य बीमा उपलब्ध है. लेकिन बीमा लेते समय बीमा कंपनी को मौजूदा स्वास्थ्य समस्याओं और जीवनशैली की आदतों का पूरा खुलासा करना जरूरी होता है. इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि धूम्रपान करने वालों के लिए प्रीमियम धूम्रपान न करने वालों की तुलना में काफी ज्यादा होता है. वहीं, जानकारी छिपाने के गंभीर नतीजे हो सकते हैं आपका क्लेम खारिज हो सकता है. इससे आपको पूरा चिकित्सा खर्च अपनी जेब से वहन करना पड़ सकता है.
हॉस्पिटल में कितनी कीमत का कमरा कवर है ये पता कर लेंहेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी में रूम रेंट लिमिट के बारे में भी जानना बेहद जरूरी है. आमतौर पर हर अस्पताल कई तरह के कमरे होते हैं जैसे कि जनरल वार्ड, सेमी-प्राइवेट, प्राइवेट वगैरा. इसी के हिसाब से इनका किराया होता है. हॉस्पिटल के कमरे का किराया जितना ज्यादा होता है, अक्सर उससे जुड़े अन्य खर्च भी बढ़ जाते हैं. इसलिए अगर आपने महंगा कमरा चुना, तो सिर्फ कमरे का किराया ही नहीं, बल्कि डॉक्टर की फीस, नर्सिंग चार्ज, विजिटिंग फीस और इसी के रेश्यो में दूसरे खर्चे बढ़ सकते हैं. अगर आपकी पॉलिसी में रूम रेंट पर सीमा तय है और आप उससे महंगा कमरा लेते हैं, तो बीमा कंपनी पूरे बिल का पूरा भुगतान नहीं करेगी. कुछ खर्च आपको अपनी जेब से भरने पड़ सकते हैं.
हर साल बीमा कवरेज की समीक्षा जरूरीहममें से ज्यादातर लोग इलाज का खर्च पुराने अनुभवों के आधार पर आंकते हैं. लेकिन हकीकत यह है कि पहले के मुकाबले अब इलाज कराना पहले से कहीं ज्यादा महंगा हो चुका है.
मनीकंट्रोल की पत्रकार शिल्पा अरोरा का कहना है कि भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की महंगाई दर खुदरा महंगाई की तुलना में कहीं ज्यादा रफ्तार से बढ़ रही है. अस्पतालों के बढ़ते शुल्क, नई तकनीक, महंगे टेस्ट और लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारियों की बढ़ती संख्या से इलाज का खर्च हर साल लगभग 12–14% बढ़ रहा है. इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि अब कैंसर का इलाज और हार्ट सर्जरी वगैरा का खर्चा 20–30 लाख रुपये तक पहुंच सकता है. इसलिए जरूरी है कि हर साल अपनी हेल्थ पॉलिसी की सम इंश्योर्ड बढ़ाएं . जरूरत समझें तो कवरेज बढ़ाएं या सुपर टॉप-अप प्लान जोड़ें. परिवार के सदस्यों की उम्र और स्वास्थ्य जरूरतों के मुताबिक पॉलिसी अपडेट करें.
कुछ पॉलिसियों में बीमा क्लेम दावा राशि का एक हिस्सा (10-20%) आपको खुद देना पड़ता है. हेल्थ बीमा में को-पेमेंट का मतलब है कि किसी भी अस्पताल में इलाज या क्लेम के समय कुल बिल का कुछ हिस्सा पॉलिसी होल्डर्स खुद चुकाएगा. बाकी पैसा बीमा कंपनी भरेगी. जैसे, अगर पॉलिसी में 10% को‑पेमेंट है और बिल 1 लाख रुपये का है, तो 10,000 रुपये आपको खुद देने होंगे और बाकी 90,000 रुपये कंपनी कवर करेगी. को‑पेमेंट की शर्तें पॉलिसी में लिखी होती हैं.
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क्लेम सेटलमेंट रेशियो चेक करेंकिसी बीमा कंपनी ने कितने क्लेम स्वीकार किये और कितने रिजेक्ट किए क्लेम सेटलमेंट रेशियो से पता चलता है. उदाहरण के लिए अगर किसी बीमा कंपनी ने एक साल में 1,000 क्लेम रिसीव किए और उनमें से 950 क्लेम स्वीकृत किए, तो उसका क्लेम सेटलमेंट रेशियो 95% होगा. इकोनॉमिक टाइम्स की पत्रकार अंशिका जैन की एक रिपोर्ट के मुताबिक क्लेम सेटलमेंट रेशियो खासतौर से 3 महीने के भीतर निपटाए गए दावों का परसेंट और बीमा कंपनी के आकलन करने का एक भरोसेमंद तरीका है. भारतीय बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण (IRDAI) हर साल सभी स्वास्थ्य और सामान्य बीमा कंपनियों द्वारा किए गए दावों के निपटान की सूची जारी करता है. वित्त वर्ष 2024-25 के नवीनतम आंकड़े फरवरी 2026 में जारी किए गए हैं.
बीमा एजेंट पर आंख मूंदकर भरोसा न करेंये बात सही है कि किसी भी बीमा पॉलिसी को लेने में बीमा एजेंट और बीमा सलाहकार महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. लेकिन पॉलिसी को समझने की अंतिम जिम्मेदारी ग्राहक की ही होती है.
लेकिन सिर्फ बीमा एजेंट के भरोसे न रहें. खुद समय निकालकर हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी के डॉक्यूमेंट्स पढ़ें ताकि आपकी पॉलिसी के बारे में अच्छे से पता चल सके. पॉलिसी डॉक्यूमेंट्स को ध्यान से पढ़ने से आपको बीमा कवरेज की सीमा, वेटिंग पीरियड, रूम रेंट लिमिट समेत दूसरी शर्तों के बारे में पहले से पता चल जाएगा और किसी इमरजेंसी की स्थिति में आपको मानसिक तनाव कम होगा.
जाते-जाते लखनऊ वाले केस में बीमा कंपनी की सफाई भी देख लेते हैं. कंपनी ने आरोपों को खारिज किया. स्टार हेल्थ एंड एलाइड इंश्योरेंस ने लल्लनटॉप के साथ साझा किये बयान में कहा, स्वास्थ्य से जुड़े मामले भावनात्मक रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं. कंपनी का कहना है कि कई मीडिया रिपोर्ट्स में भ्रामक और अधूरी जानकारी दी गई है. इसमें कई महत्वपूर्ण तथ्य शामिल नहीं किए गए हैं. कंपनी का कहना है कि लखनऊ के जिस मामले को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं कंपनी को इस क्लेम के मूल्यांकन के दौरान प्री-एग्जिस्टिंग डिजीज (पॉलिसी लेने से पहले की बीमारी) के संकेत मिले थे. ग्राहक से जरूरी दस्तावेज मांगे गए, लेकिन बार-बार अनुरोध करने के बावजूद उन्हें उपलब्ध नहीं कराया गया.
कंपनी का कहना है कि इस निर्णय को पूरी तरह पॉलिसी के नियमों और शर्तों के अनुसार लिया गया है.
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