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यूपी का वो मुख्यमंत्री, जो रिजाइन कर रिक्शे से घर चला गया

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यूपी से हमेशा अद्भुत राजनीतिक कहानियां आती हैं. पूर्वांचल के गांधी कहे जाने वाले यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री रामनरेश यादव अपने आखिरी दिनों में व्यापम में फंसे थे. गांधी के नाम से जुड़ने वाले इंसान का नाम इतने खतरनाक खूनी खेल में आए तो ताज्जुब होता है. कभी-कभी लगता है कि यादव का पूरा जीवन भारत की बदलती राजनीति का सबूत है. यादव कभी भी बहुत बड़े नेता नहीं रहे. पर राजनीति में सेनापति के तौर पर बने रहे थे. शायद यही वजह है कि राजनीति में बहने वाले अंडरकरेंट को रामनरेश यादव की प्रोफाइल से समझा जा सकता है.


हेमवती नंदन बहुगुणा के जाने के बाद यूपी में राष्ट्रपति शासन लग गया. 30 नवंबर 1975 से लेकर 21 जनवरी 1976 तक रहा. फिर नारायण दत्त तिवारी को यूपी का मुख्यमंत्री बनाया गया. वो उस वक्त काशीपुर से विधायक थे. 30 अप्रैल 1977 को उन्होंने भी रिजाइन कर दिया. क्योंकि इमरजेंसी खत्म हो देश भर में लोकसभा चुनाव होने वाले थे. तो 30 अप्रैल 1977 से 23 जून 1977 तक राष्ट्रपति शासन लगा रहा.

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रामनरेश यादव

23 जून 1977 को रामनरेश यादव ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. वो इस पद पर 27 फरवरी 1979 तक बने रहे. इनके बाद बाबू बनारसी दास मुख्यमंत्री बने. उनके बाद 17 फरवरी 1980 को फिर राष्ट्रपति शासन लग गया. 9 जून 1980 को राजा ऑफ मांडा वी पी सिंह मुख्यमंत्री बने.

यूपी की राजनीति पहले कांग्रेस से शुरू हुई. फिर इसमें राममनोहर लोहिया आ गए. लोहिया के नाम एकदम से नये नेता आ गये. जो आदर्श तो कांग्रेस का ही फॉलो करते थे पर नाम लोहिया का लेते थे. इस नाम लेने की कला ने यूपी में ऑल्टरनेटिव पॉलिटिक्स शुरू कर दी. समाजवाद की पॉलिटिक्स. लंबे समय से आजमगढ़ समेत पूर्वांचल का इलाका समाजवाद का गढ़ रहा है. 1977 में यहां की जनता ने तत्कालीन केंद्रीय इस्पात मंत्री और इंदिरा कैबिनेट का अहम हिस्सा रहे चंद्रजीत यादव को हराकर जनता पार्टी के रामनरेश यादव को संसद भेजा था. इसके बाद से कांग्रेस यहां कभी उबर नहीं पायी. हालांकि बाद में मुलायम समाजवादी नेता हो गये और समाजवाद को यादव और मुस्लिमों के बीच बांट दिया. ये नई समाजवादी विचारधारा है.

मुलायम से ऊपर रख रामनरेश को मुख्यमंत्री बनाया गया था, पर किस्मत साथ नहीं थी

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रामनरेश यादव

इसी आजमगढ़ के आंधीपुर गांव में रामनरेश यादव का जन्म 1 जुलाई 1928 को हुआ था. लालन-पालन आम ही था. रामनरेश ने कुछ बहुत तूफानी भी नहीं किया था. शांतिप्रिय व्यक्ति थे. तो उस दौर के उग्र स्वतंत्रता सेनानियों में इनका नाम नहीं आता है. पढ़ाई लिखाई पूरी कर 1953 में आजमगढ़ में ही वकालत शुरू कर दी. इनके पिता गया प्रसाद महात्मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू और डॉ. राममनोहर लोहिया के अनुयायी थे. तो रामनरेश का भी लगभग यही झुकाव रहा. उन्होंने वाराणसी हिन्दू विश्वविद्यालय से बीए, एमए और एलएलबी की पढ़ाई की और यहीं छात्र संघ की राजनीति से भी जुड़े रहे. इसके बाद कुछ वक्त के लिए वे जौनपुर के पट्टी के नरेंद्रपुर इंटर कॉलेज में लेक्चरार भी रहे. 1953 में उन्होंने आजमगढ़ में वकालत की शुरुआत की.

इसी दौरान रामनरेश की दिलचस्पी पॉलिटिक्स में बढ़ती गई. उन्होंने समाजवादी विचारधारा के तहत जाति तोड़ो, बराबरी के मौके, बढ़े नहर रेट, किसानों की लगान माफी, समान शिक्षा, आमदनी और खर्च की सीमा बांधने, जमीन जोतने वालों को उनका अधिकार दिलाने, अंग्रेजी हटाओ आदि आंदोलनों को लेकर कई बार गिरफ्तारियां दीं. इमरजेंसी के दौरान वे मीसा और डीआईआर के अधीन जून 1975 से फरवरी 1977 तक आजमगढ़ जेल और केंद्रीय जेल नैनी, इलाहाबाद में बंद रहे.

70 के दशक में रामनरेश यादव किसानों के नेता के तौर पर उभरे थे. मुलायम से बड़े नेता माने जाते थे. इसीलिए 1977 में चौधरी चरण सिंह ने लगातार 3 बार से विधायक रहे मुलायम सिंह यादव को नजरअंदाज कर रामनरेश को मुख्यमंत्री बनाया था. उस वक्त रामनरेश आजमगढ़ से सांसद थे.

26 अगस्त 1977 को पिछड़ों को सरकारी नौकरियों में 15% आरक्षण देने के बाद रामनरेश यादव ने दूसरा शासनादेश जारी कर 13 जनवरी 1978 को यह भी निश्चित कर दिया कि अब प्रमोशन में भी sc/st की तरह पिछड़ों को 15%आरक्षण मिलेगा. लखनऊ की अंबेडकर यूनिवर्सिटी को सेंट्रल यूनि‍वर्सिटी का दर्जा दिलाने में भी उनका अहम योगदान था.

वर्ष 1977 के चुनाव के बाद हुए उपचुनाव में रामनरेश जनता पार्टी के टिकट पर पहली बार विधान सभा के सदस्य चुने गए. एटा के विधान सभा क्षेत्र निधौलीकलां से. चौधरी चरण सिंह ने राम नरेश से प्रभावित होकर लगातार 3 बार से विधायक रहे मुलायम सिंह यादव को नजर अंदाज कर के 1977 में राम नरेश यादव को संयुक्त उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया लेकिन उन्हें दो साल के भीतर ही अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ी.

पूर्व मंत्री सत्यदेव त्रिपाठी के मुताबिक राम नरेश यादव 77 के दशक में पूर्वांचल के गांधी कहे जाते थे. अपनी इसी ईमानदारी के चलते वह चौधरी चरण सिंह के करीबियों में एक थे. आपातकाल के बाद 1977 में वह जनता पार्टी के टिकट से आजमगढ़ लोकसभा सीट से चुनाव लड़े और कांग्रेस के दिग्गज नेता चंद्र जीत यादव को पौने तीन लाख वोटों से हराया था.

रामनरेश यादव उमा भारती के साथ

चरण सिंह राम नरेश यादव को लंबी रेस का घोड़ा मानते थे. लेकिन यादव के इस्तीफे के बाद खाली पड़ी आजमगढ़ लोक सभा सीट पर उपचुनाव में मोहसिना किदवई ने जनता पार्टी के कैंडिडेट को बुरी तरह हराया. कांग्रेस की जीत ने जनता पार्टी में भूचाल ला दिया. इंदिरा की आंधी चिकमंगलूर से चल चुकी थी. जनता पार्टी ऐसे ही बदनाम हो रखी थी. इसके बाद अचानक लोगों को लगने लगा कि इंदिरा की आंधी जनता पार्टी को ले डूबेगी. आजमगढ़ उपचुनाव में मिली करारी हार के बाद राम नरेश को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा. जिसके बाद जनता पार्टी ने डैमेज कंट्रोल करने के लिए बनारसी दास को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बना दिया.

कभी चरण सिंह यूथ ब्रिगेड के सदस्य रहे जदयू नेता केसी त्यागी के मुताबिक ”आजमगढ़ की हार चौधरी चरण सिंह के लिए बहुत ही चौंकाने वाली थी, जिसने राम नरेश यादव से उनकी मुख्यमंत्री की कुर्सी छीन ली. आजमगढ़ की हार ने चौधरी चरण सिंह को ये भी एहसास कराया कि मुलायम सिंह की अनदेखी कर राम नरेश यादव को मुख्यमंत्री बनाना उनकी बड़ी भूल थी.

राम नरेश ने जब मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया तो उसके बाद वो रिक्शे से अपने घर वापस गए. रामनरेश यादव की सरकार में ही मुलायम सिंह पहली बार राज्यमंत्री बने थे. और पहली बार उनको नेताजी भी इसी वक्त कहा गया था. सरकार तो चली नहीं और मुलायम सिंह यादव राजनारायण का साथ छोड़कर चौधरी चरण सिंह के साथ चले गए थे.

रामनरेश जब मुख्यमंत्री थे तब लोग कहा करते थे- रामनरेश वापस जाओ,लाठी लेकर भैंस चराओ. ये वो दौर था जब जाति को लेकर ही आइडेंटिटी क्रिएट की जाती थी. हालांकि दौर अभी भी बदला नहीं है. अभी वही चल रहा है.

जिस कांग्रेस के खिलाफ राजनीति खड़ी की, उसी में शरण लेनी पड़ी

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शिवराज सिंह चौहान राज्यपाल रामनरेश यादव की विदाई करते हुए

इसके बाद वे बनारसी दास के मंत्रीमंडल में उपमुख्यमंत्री रहे लेकिन 17 फरवरी 1980 को उनकी ये कुर्सी भी चली गई. 1982 में वे चरण सिंह के लोकदल के प्रदेश अध्यक्ष बने. 1985 में लोकदल से ही विधायक बनने पर उन्हें नेता विरोधी दल की भूमिका मिली. चरण सिंह के लिए अपना विश्वास खो चुके राम नरेश यादव धीरे-धीरे राज नारायण के करीबी बन गए जो खुद एक बागी थे. राजनीति में खासा मोड़ तब आया जब राम नरेश यादव मुलायम सिंह यादव का मुकाबला करने के लिए चरण सिंह के बेटे अजीत सिंह की बनाई पार्टी में शामिल हो गए और यही वह वक्त था जब वो कांग्रेस में शामिल होने के लिए प्रेरित हुए.

1985 में फिरोजाबाद के विधान सभा क्षेत्र शिकोहाबाद का प्रतिनिधित्व किया. रामनरेश 1988 में राज्यसभा सदस्य बने और 12 अप्रैल 1989 को राज्यसभा के अंदर उप नेता, पार्टी के महामंत्री और अन्य पदों से त्यागपत्र देकर तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस में आ गये.  आयरनी ये है कि उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत कांग्रेस विरोधी गतिविधियों से की थी. वे इंदिरा गांधी के खिलाफ केस करके उनके चुनाव को अवैध साबित करने वाले राजनारायण के साथी थे. उनकी विचारधारा से प्रभावित होकर जनता पार्टी में शामिल हुए थे. रामनरेश यादव इमरजेंसी से पहले लगभग 10 बार गिरफ्तार हुए थे. इमरजेंसी के दौरान 19 महीने जेल में रहे.

1988 से 1989 तक लोकदल से राज्य सभा में रहे. 1989 से 1994 तक कांग्रेस से राज्य सभा पहुंचे थे. संसद की पहली मानव संसाधन विभाग की संयुक्त संसदीय समिति के पहले अध्यक्ष (1993) राज्यसभा में राष्ट्रीय जनता पार्टी के उप नेता रहे. 1996 से 2007 तक वो आजमगढ़ के फूलपुर से विधायक रहे. 2009 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने राम नरेश यादव का सावधानी से इस्तेमाल किया. राम नरेश को कांग्रेस ने राज्यसभा में पहुंचा दिया और फिर उन्हें कांग्रेस कार्यसमिति की सदस्यता भी मिल गई. पार्टी ने उनको यादवों के बीच कैंपेन करने की भी जिम्मेदारी दी थी. 2011 में जब कांग्रेस उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के लिए  तैयारी कर रही थी, तो उसी दौरान राम नरेश को मध्य प्रदेश का राज्यपाल बना दिया गया.

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रामनरेश यादव IAS प्रोबेशनर्स के साथ

राज्यपाल बनने के बाद रामनरेश के वो दिन आये जो उन्होंने कभी सोचा भी नहीं होगा. फरवरी का महीना हमेशा उनके लिए समस्या बनकर आया है. मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री का पद उनको फरवरी में ही छोड़ना पड़ा था. और फरवरी 2016 में ही इनका नाम मध्य प्रदेश के व्यापम घोटाले में आया. वो घोटाला जिसमें 50 से ऊपर लोग मार दिये गये. रामनरेश का बेटा शैलेश यादव भी इस मामले में फंसा था.

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आज तक से साभार

कांग्रेस इसके बाद इनसे इस्तीफा मांगने लगी पर इन्होंने इस्तीफा नहीं दिया. जब इनका काफिला राजभवन से रवाना हो रहा था तव एनसीपी के नेता मनोज त्रिपाठी ने आत्मदाह कर लिया. हालांकि पुलिस ने उसे बचा लिया. इससे पहले राज्यपाल के तौर पर 2013 में वो मध्य प्रदेश विधानसभा सत्र को खत्म करने के मसले पर सोनिया गांधी से मिलने गए थे. इस बात को लेकर बहुत विवाद हुआ कि राज्यपाल एक पार्टी प्रेसिडेंट के पास क्यों जा रहा है. 22 नवंबर 2016 को रामनरेश यादव की डेथ हो गई.


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