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महामहिम: वो राष्ट्रपति, जिसके बाथरूम का कार्टून बदनामी की वजह बना

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10 दिसंबर 1975. देश में आपातकाल लगे हुए 6 महीने होने को आए थे. इंडियन एक्सप्रेस में एक कार्टून छपा. इसमें देश के राष्ट्रपति फखरुद्दीन को बाथटब में लेटे हुए दिखाया गया था. इस कार्टून में वो यह कहते देखे जा सकते थे, “अगर उनके पास और कोई ऑर्डिनेंस है तो उनको बोलो कि थोड़ा इंतजार करें.” आपातकाल के खिलाफ यह अबू अब्राहम का मजबूत हस्ताक्षर था. आपातकाल के 21 महीनों के दौरान कुल मिलकर 47 ऐसे कानून थे जिन्हें 9वीं अनुसूची में डाला गया था. 9वीं अनुसूची यानी वो अनुसूची जिसमें लिखे गए विधानों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती. इसी के सहारे इंदिरा गांधी की सरकार एक से एक नए कानून ला रही थी.

इस कार्टून को समझने से पहले एक कहानी सुनिए. 12 जून 1975, इलाहाबाद हाइकोर्ट में देश का राजनीतिक नक्शा बदल देने वाले मुकदमे की सुनावाई हो रही थी. कोर्ट नंबर 24 खचाखच भरा हुआ था. ठीक 10 बजे जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा कोर्ट रूम में पहुंच गए. उन्होंने आते ही यह साफ़ कर दिया कि इस मुकदमें आरोप सही पाए गए हैं. मुक़दमा 1971 के लोकसभा चुनाव के सिलसिले में था.

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सन 1971 का लोकसभा चुनाव. कांग्रेस और इंदिरा गांधी ने अपनी खोई साख फिर से हासिल की. लेकिन एक लोचा फंस गया. रायबरेली में इंदिरा के खिलाफ खड़े थे फायरब्रांड समाजवादी नेता राज नारायण. राज नारायण 1,11,810 वोटों से चुनाव हार गए. लेकिन राज नारायण हार मनाने को तैयार नहीं थे. उन्होंने चुनाव में फर्जीवाड़े और सरकारी मशीनरी का गलत इस्तेमाल करने का आरोप लगाते हुए इंदिरा गांधी पर मुकदमा दायर कर दिया. यह सुनवाई इसी मुकदमे के सिलसिले में हो रही थी.

18 फरवरी 1975, यह पहली बार हो रहा था कि देश की प्रधानमंत्री किसी मुकदमे में आरोपी की तरह पेश हो रहीं थी. 12 जून को फैसला आया. इंदिरा गांधी का चुनाव अवैध करार दे दिया गया. इंदिरा पर अगले छह साल तक कोई भी चुनाव लड़ने से रोक लगा दी गई. इस फैसले का मतलब था इंदिरा की राजनीतिक मौत. इंदिरा इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट चली गईं.

24 जून शाम दोपहर इस मुकदमे पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया. उस समय सुप्रीम कोर्ट में ग्रीष्मकालीन अवकाश चल रहा था. वेकेशनल जज कृष्ण अय्यर ने हाइकोर्ट के फैसले को स्थगित कर दिया लेकिन यह स्थगन आंशिक था. माने इंदिरा गांधी संसद की कार्यवाही में भाग तो ले सकती थीं लेकिन वोट नहीं दे सकती थी. इस फैसले के बाद इंदिरा विपक्ष के निशाने पर आ गईं.

24 जून 1975 की देर रात इंदिरा एक दस्तावेज लेकर राष्ट्रपति भवन पहुंचीं. इस दस्तावेज में दर्ज था आपातकाल. संविधान के अनुच्छेद 35 के तहत कोई भी प्रधानमंत्री तानाशाह में तब्दील हो सकता है, इसका अंदाजा संविधान गढ़ने वालों को नहीं रहा होगा. उस समय 1 रायसीना हिल्स फखरुद्दीन अली अहमद का पता हुआ करता था. इंदिरा इतनी हड़बड़ी में थीं कि इस प्रस्ताव के लिए जरूरी कैबिनेट की मंजूरी भी नहीं ली गई. राष्ट्रपति फखरुद्दीन ने बिना कोई सवाल किए इस दस्तावेज पर दस्तखत कर दिए. ऊपर जिस कार्टून की चर्चा हो रही थी वो देश के सबसे कमजोर राष्ट्रपति फखरुद्दीन का ही था.

देश का सबसे कमजोर राष्ट्रपति
पुरानी दिल्ली में एक जगह हुई है, तुर्कमानगेट. जब शाहजहां ने अपनी दिल्ली बसानी शरू की तो 12वीं सदी के सूफी संत तुर्कमान बयाबानी की मजार के पास एक दरवाजा बुलंद करवाया. इस दरवाजे को उन्हीं का नाम दिया गया. 1976 में संजय गांधी के आदेश के बाद सूफी संत की यह मजार वीभत्स पुलिस अत्याचार की गवाह बनी.

दमन का शिकार हुए लोग जब राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के पास पहुंचे तो उनके सामने एक बेबस इंसान था. इस घटना का जिक्र जनक राज जे. की किताब ‘ Commissions and Omissions by Indian Presidents ‘ में मिलता है. किताब के हिसाब से जब राम चरण अग्रवाल, इनायतुल्ला और कृष्णगोपाल शर्मा के नेतृत्व में नागरिकों का प्रतिनिधि मंडल राष्ट्रपति से मिलने पहुंचा तो फखरुद्दीन का जवाब था, “यह लड़का (संजय गांधी) कांग्रेस का बंटाधार करेगा.” इस मामले में कार्रवाही करने पर उन्होंने सलाह देते हुए कहा, “आप लोग बड़ी हवेली क्यों नहीं जाते. आपको पता है ना कि मेरे हाथ बंधे हुए हैं.”

संजय गांधी और इंदिरा गांधी
संजय गांधी और इंदिरा गांधी

उस दौर में बड़ी हवेली का मतलब 1 सफदरजंग रोड हुआ करता था. माने कि प्रधानमंत्री आवास. आपातकाल के दौरान अफसरशाहों में एक जुमला बहुत लोकप्रिय था, “सरकार पीएमओ से नहीं पीएमएच से चलती है.”

1 रायसीना हिल्स को इतिहास में इतना कमजोर कभी नहीं देखा गया. 33 साल की उम्र में असम सरकार में मंत्री बने एक जहीन शख्स के जीवन का शर्मनाक चैप्टर था. 2013 के विकीलीक्स के खुलासे से ने उनकी मजबूरी एक खाका खींचा जा सकता है. बात आपातकाल के दौर की है. इंदिरा के मुखौटे पर संजय गांधी की नीतियां थोपी जा रहीं थीं. मेनका गांधी कांग्रेस के प्रचार के लिए नई पत्रिका शुरू करने जा रही थीं. पत्रिका का नाम था, सूर्या. संजय चाहते थे कि राष्ट्रपति फखरुद्दीन इसके लॉन्चिंग एडिशन के लिए कुछ लिख कर दें. फखरुद्दीन ने ऐसा करने से मना कर दिया. संजय इससे नाराज हो गए और उन्होंने फखरुद्दीन के बारे में कई लोगों से आपत्तिजनक बातें कहीं. यह बात राष्ट्रपति के कानों में पड़ी. वो इससे काफी नाराज हुए. उन्होंने इसकी शिकायत इंदिरा से की उन्होंने अपने बेटे की तरफ से माफ़ी मांगी. संजय ने किसी भी किस्म की माफ़ी मांगने से इंकार कर दिया.

कैसे पहुंचे लोकतंत्र की सबसे ऊंची सीढ़ी तक
नेहरू परिवार से फखरुद्दीन का रिश्ता पांच दशक पुराना था. 1925 में वो कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के सेंट कैथरीन कॉलेज में पढ़ रहे थे. यहां उनकी मुलाकात जवाहर लाल नेहरू से हुई. जब वो लंदन से वकालत करके लौटे तो नेहरू के कहने पर उन्होंने कांग्रेस की सदस्यता ली. 1937 के लेजिस्लेटिव असेंबली चुनाव में उन्होंने असम से चुनाव लड़ा. इस चुनाव के बाद सूबे में कांग्रेस की सरकार बनी और गोपीनाथ बारदलोई मुख्यमंत्री चुने गए. वो महज 33 साल की उम्र में इस सरकार में वित्त मंत्री के तौर पर शामिल हुए. लेकिन अब तक फखरुद्दीन का कद राष्ट्रीय स्तर के नेता का नहीं हुआ था.

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1962 में आजाद भारत के तीसरे चुनाव में कांग्रेस को भारी बहुमत मिला था. नेहरू उस समय फखरुद्दीन को केंद्रीय मंत्रीमंडल में शामिल करना चाहते थे. उस समय असम के मुख्यमंत्री बिमला प्रसाद ने उन्हें केंद्र की सियासत में जाने की इजाजत नहीं दी. 1966 में जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं तो उन्होंने अपने पिता की इच्छा को पूरा किया. वो 1966 में पहली बार कैबिनेट मिनिस्टर के तौर पर शामिल हुए. उन्हें सिंचाई और उर्जा मंत्रालय सौंपा गया. 1967 और 71 का चुनाव वो असम की बारापेट सीट से जीते और राष्ट्रपति बनने तक इंदिरा सरकार में मंत्री बने रहे.

1974 के राष्ट्रपति चुनाव

1974 में वीवी गिरी का कार्यकाल पूरा हो रहा था. इंदिरा ऐसा राष्ट्रपति चाहती थीं जिनके साथ वो सहज रहें. उनकी नजर में फखरुद्दीन अली अहमद से बेहतर आदमी नहीं था. नेहरू के जमाने से वो उनके पारिवारिक मित्र थे. इंदिरा के पोते-पोती राहुल और प्रियंका उनके पोते समीर के अच्छे दोस्त थे. दोनों परिवार जन्मदिन से लेकर शादी तक एक दूसरे के हर किस्म के आयोजन में शिरकत करते.

इंदिरा अपने इस कदम से मुस्लिम मतदाताओं में पकड़ को और मजबूत बनाना चाहती थीं. 3 जुलाई 1974 को फखरुद्दीन अली अहमद राष्ट्रपति चुनाव के लिए कांग्रेस के आधिकारिक उम्मीदवार घोषित हुए. उनके खिलाफ विपक्ष ने त्रिदिब चौधरी को मैदान में उतारा. ये लेफ्ट पार्टियों की तरफ से खड़े किए प्रत्याशी थे. चौधरी रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी के संस्थापक सदस्य थे. वो 1952 से लगातार लोकसभा सदस्य रहे. यह लड़ाई सांकेतिक थी. फखरुद्दीन अली अहमद 754,113 लेकर इस चुनाव में विजेता घोषित हुए. उनके निकटतम प्रतिद्वंदी त्रिदिब चौधरी 189,196 वोट ही हासिल कर सके.

एक और राष्ट्रपति ने बाथरूम में दम तोड़ दिया

फरवरी 1977 में वो मलेशिया, फिलीपिंस और बर्मा के आधिकारिक दौरे पर थे. 10 फरवरी को इस यात्रा के दौरान उनका स्वास्थ्य बिगड़ गया. उन्हें उसी दिन भारत लौटना पड़ा. 11 फरवरी की सुबह वो जब उठे तो तबीयत ठीक ही लग रही थी. करीब 9 बजे वो अपने बिस्तर से उठे और बाथरूम की तरफ बढ़े. बाथरूम में उन्हें दो हार्ट अटैक आए और उन्होंने मौके पर ही दम तोड़ दिया. यह वही बाथरूम था जिसमें कुछ साल पहले उनके दोस्त जाकिर हुसैन का इंतकाल हुआ था.

फखरुद्दीन और जाकिर हुसैन में काफी समानताएं थी. दोनों उर्दू के शौकीन थे. दोनों अल्पसंख्यक समुदाय से आते थे  और दोनों राष्ट्रपतियों ने अपना कार्यकाल पूरा नहीं किया.


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