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गुजरात का वो मुख्यमंत्री जिसे बहुमत होने के बावजूद कुर्सी गंवानी पड़ी

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28 सितंबर 1995. अटल बिहारी वाजपेयी दिल्ली से अहमदाबाद के लिए उड़ान भर रहे थे. गुजरात में बीजेपी के 47 विधायक पार्टी से बगावत करके मध्यप्रदेश के खजुराहो चले गए थे. इस बगावत का नेतृत्व कर रहे थे शंकर सिंह वाघेला. वैसे तो गुजरात लालकृष्ण आडवानी का राज्य माना जाता था लेकिन इस संकट को सुलझाने के लिए उन्होंने वाजपेयी को आगे किया था. वाघेला को अटल के काफी करीब माना जाता था. वाजपेयी के अलावा राजस्थान के मुख्यमंत्री भैरो सिंह शेखावत को भी अहमदाबाद बुला लिया गया था.

अहमदाबाद पहुंचने के बाद वाजपेयी ने सबसे पहला काम किया केशुभाई से मुलाकात का. केशुभाई को संघ और बीजेपी संगठन का समर्थन मिला हुआ था. अपनी इस मुलाकात में वाजपेयी ने केशुभाई से कहा कि सूबे में दो-तिहाई बहुमत के साथ आई बीजेपी सरकार को चलाने के लिए किसी न किसी को बलिदान देना ही पड़ेगा. केशुभाई थोड़ी समझाइश के बाद मुख्यमंत्री की कुर्सी खाली करने को तैयार हो गए. उन्होंने पद छोड़ने से पहले एक शर्त रखी. पार्टी के खिलाफ बगावत करने वाले किसी भी शख्स को मुख्यमंत्री नहीं बनाया जाएगा. संघ भी लगातार इसी बात पर दबाव बना रहा था. इस शर्त को मानने में दिक्कत यह थी कि शंकर सिंह वाघेला ने सारी बगावत मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए की थी. ऐसे में उन्हें मनाना इतना आसान नहीं था. वाजपेयी इसी काम के लिए अहमदाबाद आए थे. उन्होंने काफी समझाइश के बाद वाघेला को इस बात के लिए मना लिया. बदले में वाघेला के गुट के 6 विधायकों को नए मंत्रिमंडल में जगह देने की बात तय हुई.

केशुभाई, आडवाणी और काशीराम राणा
केशुभाई, आडवाणी और काशीराम राणा

वाघेला और केशुभाई की दावेदारी खत्म होने के बाद नए नामों पर चर्चा शुरू हुई. शुरुआती दौर में काशीराम राणा का नाम काफी मजबूती से आगे बढ़ रहा था. वो उस समय पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष थे. दोपहर में काशीराम राणा इसी हैसियत से एक समाचार एजेंसी के पत्रकार से मुखातिब थे. जब उनसे उनकी उम्मीदवारी के बारे में पूछा गया वो अपनी खुशी नहीं छिपा पाए. उनकी मुस्कराहट के निहितार्थ निकालते हुए दूरदर्शन के अहमदाबाद केंद्र से प्रसारित होने वाले सात बजे के बुलेटिन में उनके नाम की घोषणा कर दी गई. अभी उनकी उम्मीदवारी पर आखिरी फैसला नहीं लिया गया था. इसी बात को मुद्दा बनाकर केशुभाई के धड़े ने शाम को बुलाई गई विधायक दल की मीटिंग में बवाल करना शुरू कर दिया. दरअसल काशीराम राणा की वाघेला से करीबी किसी से छिपी नहीं थी. ऐसे में केशुभाई की उनसे नाराज़गी स्वाभाविक थी. इस बवाल के बीच वाजपेयी यह कहते हुए पाए गए कि यह भी एक कत्ल की रात है.

आखिरकार बड़ी हुज्जत के बाद दोनों धड़े एक आदमी के नाम पर सहमत हुए. इस आदमी का नाम था सुरेश मेहता. मेहता केशुभाई के मंत्रिमंडल में वित्तमंत्री हुआ करते थे. वो न तो वाघेला के बहुत करीबी हुआ करते थे और न ही केशुभाई से बहुत दूर. संघ को भी उनके नाम से कोई ख़ास एतराज नहीं था. सुरेश मेहता को खजूरिया और हजूरिया के बीच संतुलन साधने का कठिन काम करना था. 21 अक्टूबर 1995 के रोज उन्होंने बतौर मुख्यमंत्री शपथ ली. वाघेला धड़े के छह चेहरों को मंत्री बनाए जाने के अलावा मंत्रिमंडल में कोई बदलाव नहीं किया गया था. लेकिन यह सारे प्रयास नाकाफी साबित होने जा रहे थे.

अटल बिहारी वाजपेयी के लिए गुजरात का हल निकाला टेढ़ी खीर साबित हुआ
काशीराम राणा, केशुभाई और अटल बिहारी वाजपेयी

एक और बगावत

अक्टूबर 1995 में जब शंकर सिंह वाघेला ने ‘खजुराहो काण्ड’ के बाद सुरेश मेहता के नाम पर रजामंदी जाहिर की थी, तब उनके ही धड़े के कई विधायक नाराज़ हो गए थे. नाराज विधायकों का कहना था कि उन्होंने वाघेला को मुख्यमंत्री बनाने के लिए बगावत का झंडा उठाया था. वाघेला ने खुद ही अपनी उम्मीदवारी वापस लेकर उन्हें अधर-झूल में लटका दिया है. वाघेला अपने लिए केंद्र की राजनीति में जगह बनाने के प्रयास में लगे हुए थे. उन्हें गोधरा से 1996 का लोकसभा चुनाव लड़ना था.

वाघेला को उस समय लोकसभा चुनाव में अपनी जीत का पूरा भरोसा था. ऐसे में उन्होंने कोई ‘प्लान बी’ तैयार नहीं कर रखा था. लोकसभा चुनाव में वो भीतराघात के शिकार हो गए. केशुभाई के समर्थकों के अलावा विश्व हिंदू परिषद के नेताओं ने बीजेपी की टिकट पर चुनाव लड़ रहे वाघेला के खिलाफ प्रचार किया. नतीजतन वो चुनाव हार गए. इधर केंद्र में अटल बिहारी भी बहुमत साबित नहीं कर पाए. वाघेला के लिए केंद्र की राजनीति में जाने की सभी संभावना समाप्त हो चुकी थी. ऐसे में वाघेला फिर से बगावत पर उतर आए.

शंकर सिंह वाघेला ने साल भर के भीतर दूसरी बार बगावत कर दी थी
शंकर सिंह वाघेला ने साल भर के भीतर दूसरी बार बगावत कर दी थी.

20 मई 1996 को प्रधानमंत्री बनने के बाद अटल बिहारी वाजपेयी फिर अहमदाबाद पहुंचे. 1996 का लोकसभा चुनाव उन्होंने दो जगह से लड़ा था. पहला लखनऊ और दूसरा गांधी नगर. दोनों जगह से जीतने के बाद उन्होंने गांधीनगर सीट छोड़ने का फैसला किया था. ऐसे में वो यहां के लोगों को धन्यवाद देने के लिए आए थे. वाजपेयी की यह रैली गुजरात बीजेपी में नए सिरे से फूट का सूत्रधार करने जा रही थी. रैली खत्म होने के बाद वाघेला समर्थक दो विधायकों आत्माराम पटेल और दत्ताजी को केशुभाई समर्थकों ने बुरी तरह से पीटा.

शंकर सिंह वाघेला गोधरा में हार की वजह से केशुभाई के गुट से पहले से खार खाए बैठे थे. इस घटना के बाद उन्होंने खुले तौर पर बगावत का ऐलान कर दिया. मारपीट के तुरंत बाद सुरेश मेहता ने केशुभाई के समर्थकों की खुलकर निंदा की. उन्होंने कहा कि हजूरिया पार्टी का बेड़ा गर्क करने में लगे हुए हैं. लेकिन यह कड़ी निंदा उनकी सरकार बचाने में नाकाफी साबित हुई.

जब बहुमत की सरकार गिरा दी गई

18 अगस्त 1996 के रोज शंकर सिंह वाघेला 46 विधायकों के साथ राज्यपाल कृष्णपाल सिंह से मिले. बगावत की शुरुआत हो चुकी थी. इस बगावत को देखते हुए सत्ताधारी पार्टी ने 18 सितम्बर की बजाय विधानसभा का सत्र 3 सितम्बर को ही बुला लिया था. बीजेपी की कोशिश थी कि वाघेला को बीजेपी के भीतर तोड़-फोड़ का कम से कम समय मिले. 3 सितंबर को एक नाटकीय घटनाक्रम में विधानसभा के उपाध्यक्ष चंदूभाई डाभी ने बीजेपी के विद्रोही विधायकों को अलग ग्रुप की मान्यता दे दी. उस समय के दल बदल कानून के तहत किसी पार्टी से अगर 1/3 विधायक टूटकर अलग होते हैं तो उनकी सदस्यता निरस्त नहीं मानी जाती थी. डाभी कांग्रेस की टिकट पर विधानसभा पहुंचे थे और विधानसभा अध्यक्ष हरीशचंद्र पटेल की तबीयत खराब होने के बाद सदन की अध्यक्षता कर रहे थे. डाभी के इस फैसले ने कांग्रेस की नीयत को संदेह के घेरे में खड़ा कर दिया.

सियासी नाटक हर पल सनसनीखेज मोड़ ले रहा था. 46 बागी विधायकों में से 18 ने अपना अलग ग्रुप बना लिया और दोनों धड़ों से मोल-भाव में जुट गए. इन विधायकों ने आरोप लगाया कि वाघेला की तरफ से उन्हें 50 लाख रुपए देने का प्रस्ताव दिया जा रहा है. ऐसे में यह साफ़ हो गया कि इन विधयाकों की ‘घर वापसी’ तय हो गई है. 182 सीटों वाली विधानसभा में दो सीट खाली थीं. वाघेला के खेमे में अब भी 28 बागी विधायक बचे हुए थे, कांग्रेस के 43 और 13 निर्दल भी उन्हें समर्थन दे रहे थे. उन्हें बहुमत के लिए महज़ 11 विधायकों की दरकार थी. उस उठा-पटक की स्थिति में 19 सितम्बर को सुरेश मेहता को विधानसभा में बहुमत साबित करना था.

विधानसभा के उपाध्यक्ष चंदूभाई डाभी, जिनके एक निर्णय ने पूरे सियासी खेल को नया मोड़ दे दिया था
विधानसभा के उपाध्यक्ष चंदूभाई डाभी, जिनके एक निर्णय ने पूरे सियासी खेल को नया मोड़ दे दिया था

18 सितम्बर 1996. रात के 10.30 मिनट पर प्रधानमंत्री देवेगौड़ा बैंगलोर से राज्यसभा का पर्चा दाखिल करने के बाद दिल्ली लौटे. उस समय उनके दिमाग में गुजरात को लेकर कोई ख़याल नहीं था. 15 मिनट बाद गुजरात के राज्यपाल की एक चिठ्ठी उनकी मेज़ पर थी. इस चिठ्ठी में गुजरात में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश की गई थी. आनन-फानन में अगली सुबह आठ बजे कैबिनेट की मीटिंग बुलाई गई. इस मीटिंग में देवेगौड़ा ने अपने साथियों को बताया कि गुजरात में राष्ट्रपति शासन के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है. घंटे के भीतर ही कैबिनेट की सिफारिश राष्ट्रपति को भेज दी गई. मार्के की बात यह है कि इस मीटिंग के शुरू होने से ठीक पहले प्रधानमंत्री देवेगौड़ा कांग्रेस अध्यक्ष नरसिम्हा राव के साथ नाश्ता करते हुए पाए गए थे. हालांकि कांग्रेस सरकार के इस निर्णय से लगातार पल्ला झाड़ती दिखी.

तत्कालीन प्रधानमंत्री देवेगौड़ा
तत्कालीन प्रधानमंत्री देवेगौड़ा

19 सितंबर की सुबह से ही सुरेश मेहता चिंता में घिरे हुए थे. उन्हें विधानसभा में अपना बहुमत साबित करना था. उन्होंने आंख बंद करके सभी विधायकों के चेहरे याद किए जिन्होंने उनके प्रति वफादार रहने की कसम खाई थी. उन्हें इस समय तक पता नहीं था कि उनकी ये सारी कवायद शाम होते-होते बेमानी साबित हो जाएंगी.

सदन में सत्र की शुरुआत होते ही हंगामा शुरू हो गया. 18 तारीख को विधानसभा उपाध्यक्ष चंदूभाई डाभी की तबीयत नासाज़ हो गई और उन्हें अस्पताल में भर्ती होना पड़ा. ऐसे में बीजेपी विधायक दौलत देसाई को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया. देखते ही देखते स्थितियां दौलत देसाई के हाथों से फिसलने लगी. पक्ष और विपक्ष के विधायक हिंसक झड़प में उलझ गए. माइक, कुशन और लात-घूंसे चलने लगे. ऐसे में दौलत देसाई ने विपक्ष के विधायकों को सदन से बाहर निकालने के लिए मार्शल बुलवा लिए. इसके विरोध में विपक्ष के सभी विधायक सदन छोड़कर चले गए. इसके बाद भी सदन की कार्यवाही भंग करने के बजाय देसाई ने अविश्वास प्रस्ताव पर वोटिंग करवाई. नतीजे में अविश्वास प्रस्ताव 92 के मुकाबले 0 वोट से गिर गया. 92 विधायक इस बवाल के बाद भी बीजेपी के खेमे में खड़े थे. यह संख्या बहुमत से एक ज्यादा थी.

तत्कालीन राज्यपाल केपी सिंह
तत्कालीन राज्यपाल केपी सिंह

इधर राज्यपाल के पास राष्ट्रपति केआर नारायणन का आदेश आ चुका था. उन्होंने सूबे में राष्ट्रपति शासन की घोषणा कर दी. शाम चार बजे सुरेश मेहता अपने साथ 93 अन्य विधायकों को लेकर राज्यपाल के पास पहुंचे लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी. इस तरह सुरेश मेहता बहुमत होने के बावजूद सत्ता से बेदखल हुए.

सुरेश मेहता कुल 334 दिन मुख्यमंत्री रहे. वो कच्छ क्षेत्र से आने वाले पहले मुख्यमंत्री थे. कच्छ की मांडवी सीट से विधायक भी थे. 19 अगस्त 1936 के रोज पैदा हुए सुरेश मेहता पेशे से वकील थे. 1967 से 1969 के दरम्यान वो ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के पद पर भी रहे. 1969 में इस पद से रिटायर होने के बाद वो जनसंघ से जुड़ गए. 1975 के विधानसभा चुनाव में वो पहली बार मैदान में उतरे और मांडवी से विधायक बने. 1985 से 1989 तक सुरेश मेहता विधानसभा में बीजेपी विधायक दल के नेता रहे. 1989 में बनी जनता दल और बीजेपी की साझा सरकार में वो चिमनभाई पटेल के मंत्रिमंडल में उद्योग मंत्री रहे. 1995 के विधानसभा चुनाव में मांडवी से चौथी बार चुनाव जीतकर केशुभाई के मंत्रिमंडल में वित्तमंत्री बने.

नरेंद्र मोदी के साथ सुरेश मेहता
नरेंद्र मोदी के साथ सुरेश मेहता

केशुभाई से उनके संबंध काफी अच्छे थे. 2001 जब केशुभाई को हटाकर सूबे की बागडोर नरेंद्र मोदी के हाथ में दी गई. उस समय सुरेश मेहता ने नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल में मंत्री बनने से इनकार कर दिया. 2007 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले उन्होंने केशुभाई के साथ बीजेपी छोड़ दी और गुजरात परिवर्तन पार्टी के सदस्य बन गए. 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले केशुभाई ने अपनी गुजरात परिवर्तन पार्टी के बीजेपी में विलय की घोषणा की. सुरेश मेहता केशुभाई के इस कदम से खुश नहीं थे. उन्होंने गुजरात परिवर्तन पार्टी से किनारा कर लिया. फिलहाल वो राजनीति से दूर हैं और गांधी नगर में अपने रिटायरमेंट का आनंद ले रहे हैं.


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