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देश के सबसे बुरे फैसले पर दस्तखत करने वाला राष्ट्रपति

हमारे देश में सबसे ऊंचा पद राष्ट्रपति का होता है. नाम के आगे ‘महामहिम’ लगता है. लेकिन असल ताकत प्रधनमंत्री के पास होती है. इसलिए प्रधानमंत्री ज़्यादातर लोगों को याद रह जाते हैं. राष्ट्रपतियों की याद कई बार धुंधली हो जाती है. और फखरुद्दीन अली अहमद तो उस वक्त राष्ट्रपति हुए जब देश में एक ही शक्स की तूती बोलती थी- प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की. लेकिन फखरुद्दीन अली ऐसा एक काम कर गए कि उनका नाम भूले नहीं भूलता. उनकी बरसी पर पढ़िए वो क्या था…


पुरानी दिल्ली का हौज काज़ी एरिया. यहीं पैदा हुए थे देश के पांचवे राष्ट्रपति. फखरुद्दीन अली अहमद. तारीख थी 15 मई 1905.

उनके पिता कर्नल जैलनुर अली अहमद असम के पहले व्यक्ति थे. जिन्होंने मेडिकल साइंस की पढ़ाई में एमडी किया था. फखरुद्दीन की मां मां लोहारू के नवाब की बेटी थीं. जैलनुर का परिवार असम के गोलाघाट से आकर पुरानी दिल्ली में बस गया था.

फखरुद्दीन की शुरुआती पढ़ाई गोंडा में हुई. ग्रेजुएशन दिल्ली के प्रतिष्ठित सेंट स्टीफेंस कॉलेज में. फिर वह इंग्लैंड के कैंब्रिज शहर में लॉ की पढ़ाई करने पहुंचे. यहां उनकी मुलाकात और फिर दोस्ती नेहरू से हुई. इसने उनकी आगे की जिंदगी की दिशा तय कर दी.

इंडिया वापस लौटकर फखरुद्दीन ने वकालत शुरू की. साथ ही अपने गृहप्रांत असम में कांग्रेस के आंदोलन से भी जुड़ गए. जल्द ही वह स्टेट काउंसिल के लिए चुने जाने लगे. 1937 में देश के कई राज्यों में कांग्रेस की सरकारें बनीं. असम में भी ऐसा हुआ, गोपीनाथ बारदोलाई के नेतृत्व में. इस सरकार के एक मंत्री फखरुद्दीन भी थे.

1942 के आंदोलन में वह जेल गए. साढ़े तीन बरस बाद रिहा हुए तो फिर कांग्रेस के काम को आगे बढ़ाने लगे. 1967 तक वह असम राज्य की राजनीति में सक्रिय रहे. फिर दिल्ली के हाईवे पर उनकी आमद हुई इंदिरा की पुकार पर. 1967 में इंदिरा गांधी कांग्रेस के ओल्ड गार्ड से वर्चस्व की लड़ाई लड़ रही थीं. एक तरफ थे के कामराज और निजलिंगप्पा जैसे धुरंधर नेता. जो नेहरू के जमाने कांग्रेस का संगठन संभाल रहे थे. शास्त्री की मौत के बाद उन्होंने मोरार जी देसाई के बजाय इंदिरा का सपोर्ट किया था. इस उम्मीद में कि यह गूंगी गुड़िया उनके इशारों पर चलेगी. मगर नेहरू की बेटी का कुछ और ही इरादा था.

1967 के चुनाव में संगठन और सत्ता की कलह नतीजों पर दिखी. इसी बरस इंदिरा ने नेहरू के वक्त से खानदान के वफादार रहे लोगों को अपने इर्द गिर्द जुटाना शुरू किया. फखरुद्दीन अली अहमद भी उनमें से एक थे. वह असम के बारपेटा सीट से चुनाव जीत लोकसभा पहुंचे. इंदिरा कैबिनेट में मंत्री बने.

फिर राष्ट्रपति के चुनाव को लेकर कांग्रेस दो फाड़ हो गई. कम्युनिस्टों के समर्थन से इंदिरा ने सरकार बचा ली. नई पार्टी बनी, जिसका नाम रखा गया कांग्रेस आई (आई से इंदिरा अंग्रेजी में). फखरुद्दीन अभी भी नेहरू की बेटी के साथ थे. 1972 के चुनाव में वह फिर पहले सांसद और फिर मंत्री बने. 1974 आते आते देश के सिर से 1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध की खुमारी उतरने लगी थी. सबको याद था तो बस एक नारा. इंदिरा का दिया गया. कि विपक्षी कहते हैं कि इंदिरा हटाओ. और मैं कहती हूं कि गरीबी हटाओ.

मगर गरीबी नहीं हटी थी. और लगातार सरकारी करप्शन की खबरें आ रही थीं. शुरुआत हुई गुजरात से. जहां छात्रों ने आंदोलन किया. फिर आग पहुंची बिहार तक. और यहां से पूरे देश में. इस विरोध को नैतिकता मुहैया कराई धुर गांधीवादी नेता और इंदिरा को इंदु बेटी कहने वाले जयप्रकाश नारायण ने. ऐसे वक्त में इंदिरा गांधी ने 1974 में फखरुद्दीन अली अहमद को देश का राष्ट्रपति बनाया.

फिर साल आया 1975. सरकार विरोधी आंदोलन तेजी पकड़ चुका था. तभी इलाहाबाद हाई कोर्ट का एक फैसला आया. जून के महीने में. जस्टिस सिन्हा ने ये फैसला सुनाया. याचिका थी विरोधी दल के एक नेता राजनारायण की. शिकायत यह की इंदिरा गांधी ने लोकसभा के चुनाव में सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग किया. फैसला इंदिरा के खिलाफ आया. उन्होंने लोकसभा के सांसद के पद से हटने को कहा गया. साथ ही छह साल के लिए चुनाव के अयोग्य भी करार दिया गया.

fakhruddin with indira

और कोई दौर होता, तो इसके बाद सत्तारूढ़ दल की नेता कुछ वक्त के लिए ही सही सीट छोड़ देती. या फिर सुप्रीम कोर्ट में अपील करती. मगर यहां बात इंदिरा गांधी की हो रही थी. जो शीर्ष पद पर रहने के दौरान लगातार विरोधियों के हमलों के चलते असुरक्षा की शिकार थीं. और उन्हें सलाह देने वाले भी इस आग को भड़का रहे थे. इसमें सबसे खास थे उनके अपने सपूत संजय गांधी. जो पहले तो मारुति कार बनाने में खर्च हो रहे थे. और फिर नेतागीरी में घुस गए. इसके अलावा पं. बंगाल के नेता सिदार्थ शंकर रे भी इंदिरा के अहम सलाहकारों में थे उन दिनों.

सबकी सहमति बनी कि विपक्ष के आंदोलन को कुचलने का एक ही तरीका है. आंतरिक शांति भंग होने का हवाला देते हुए देश में इमरजेंसी लागू करने की संस्तुति की जाए. 25 मई को इंदिरा के दस्तखत से एक नोट राष्ट्रपति भवन पहुंचा. और रात में ही फखरुद्दीन अली अहमद ने उस पर दस्तखत कर दिए. सलाह ज्यों की त्यों नहीं मानी गई. एक बदलाव भी किया गया. सिर्फ एक ब्रैकेट जोड़ा गया.

और इसके बाद आर्टिकल 352 के सेक्शन एक के तहत देश में इमरजेंसी लग गई. इसके लिए जरूरी कैबिनेट मीटिंग भी अगले दिन यानी 26 जून को हुई. सुबह के वक्त. इंदिरा गांधी के निवास 1 अकबर रोड पर. फैसले से ज्यादातर मंत्री भी सकते में थे. मगर इंदिरा दरबार में सबको जरूरत भर बोलने की ही इजाजत थी.

इसके बाद शुरू हुआ सरकारी नीतियों को जबरन लागू करने और सेंसरशिप का दौर. फखरुद्दीन अली अहमद को जल्द समझ आ गया कि उनके हाथों कांड हो गया है. कुछ ही वक्त बाद उनकी इंदिरा और उनके बेटे से ठनाठनी होने लगी.

विकीलीक्स के खुलासों के मुताबिक एक बार तो संजय गांधी ने सार्वजनिक रूप से राष्ट्रपति के लिए अशोभनीय टिप्पणी कीं. और इसकी वजह यह थी कि फखरुद्दीन अली अहमद ने संजय की पत्नी मेनका की मैगजीन सूर्या के लिए एक लेख लिखने से मना कर दिया था. अहमद ने संजय के इस बर्ताव पर नाराजगी जताई तो इंदिरा ने माफी मांगी.

fakhruddin emergency signature

फखरुद्दीन के पास नसबंदी को लेकर हुए अत्याचारों का भी लगातार हाल पहुंच रहा था. मगर वह अपनी संवैधानिक बंदिशों में बंधे थे. 11 फरवरी 1977 के दिन राष्ट्रपति भवन के दफ्तर में वह सुबह के वक्त गिर गए. अस्पताल ले जाए गए. पता चला कि उन्हें दिल के दो दौरे पड़े. जिसके चलते देहांत हो गया. उस वक्त फखरुद्दीन की बेगम आबिदा ही उनके साथ थीं. दोनों बच्चे परवेज और समीना यूएस में थे.

राष्ट्रपति की शोकसभा में शामिल होने के लिए अमेरिका के उस वक्त के राष्ट्रपति जिमी कार्टर की मां लिलियन इंडिया आ रही थीं. उन्हीं के साथ दोनों बच्चे आए. राष्ट्रपति रहते हुए फखरुद्दीन अली अहमद निवास के पास बनी सुनहरी मस्जिद जाया करते थे. जुमे की नमाज पढ़ने. इसी के बगल में उनकी कब्र बनाई गई.

 

मार्च में चुनाव हुए. इंदिरा की सत्ता से रुखसती हुई. जनता पार्टी सत्ता में आई. और तीन बरस बाद 1980 में इंदिरा फिर सत्ता में लौटीं. मगर लोकतंत्र के सफर में इमरजेंसी हमेशा के लिए एक मील का पत्थर बन गया. एक ऐसा वजनी पत्थर जिसने हमेशा खौफ और यकीन पैदा किया. डर कि सत्ता किस कदर निरंकुश हो सकती है. और भरोसा कि आखिर में जनता जनार्दन ही तय करती है कि किस हुक्मरान को कितना बर्दाश्त करना है.

और रही बात फखरुद्दीन अली अहमद की. तो शायरी और गोल्फ के शौकीन इस नेहरू कालीन नेता की पहचान इमरजेंसी पर दस्तखत करने वाले राष्ट्रपति के रूप में दर्ज हो गई. हमेशा के लिए.

देखिए फखरुद्दीन अली अहमद की कहानी बयां करता ये वीडियो..

 


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