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पहला भारतीय नेता, जिसने सदन से वॉक आउट किया था

गोपाल कृष्ण गोखले का जन्म 9 मई, 1866 को महाराष्ट्र के रत्नागिरि जिले के एक गांव में हुआ था. जबक‍ि डेथ 19 फरवरी, 1915 को मुंबई में हुई थी.

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गोपाल कृष्ण गोखले, ज‍िन्होंने सबसे पहले एक सरकारी बिल के विरोध में लेजिस्लेटिव काउंसिल से वॉक आउट किया. एक ऐसा नेता, जिसके सादगी से भरे और आंकड़ों से दुरुस्त बजट भाषणों के बारे में पढ़ने के लिए लोग अखबार का इंतजार करते थे. ऐसा नेता, जिसे गांधी और जिन्ना, दोनों ही अपना राजनीतिक गुरु मानते थे.

गोखले गरीब परिवार से थे. मगर उनके पिता शिक्षा की अहमियत समझते थे. खुद मुफलिसी में रहे. मगर बेटे को अच्छी से अच्छी शिक्षा दिलाई. बॉम्बे के एलफिस्टन कॉलेज से पढ़ाई कर गोखले मैथ्स के प्रोफेसर बन गए. कांग्रेस की स्थापना के चार बरस बाद ही वह इससे जुड़ गए. प्रेरणा मिली गुरु महादेव रानाडे से. कॉलेज में गोखले के दोस्त थे बाल गंगाधर तिलक, जो बाद में उनके सबसे मशहूर राजनीतिक प्रतिद्धंदी बने. हालात ये हुए कि गोखले के चलते तिलक को 1906 में कांग्रेस छोड़नी पड़ी और इस तरह देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी का पहली बार बंटवारा हुआ. हालांकि 10 बरस बाद इतिहास सम पर आया. गोखले का निधन हुआ और तिलक ने अपना विरोध छोड़ते हुए उन्हें श्रद्धांजलि दी. पार्टी भी एक हो गई.

गोखले को शुरुआती सानिध्य मिला रानाडे और नौरोजी का. इससे उन्हें ब्रिटिश संस्थानों और कानूनों की बारीकियां समझने का मौका मिला. बॉम्बे में तब एक लेजिस्लेटिव काउंसिल बन चुकी थी. जहां बजट और दूसरे बिल्स पर बहसें होती थीं. यहां बॉम्बे का शेर और ब्रिटेन से वकालत की पढ़ाई कर आया युवा फिरोज शाह मेहता गरजता था. वह सत्ता की आंख में आंख डाल उसे अंधा कहता था. आज के वक्त ये समझना कुछ मुश्किल होगा कि उस वक्त यानी 19वीं सदी के कमोबेश आखिर में ये कितनी बहादुरी का काम था.
19वीं सदी के आखिर में मेहता की तबीयत नासाज रहने लगी तो उन्होंने गोखले की काउंसिल में एंट्री कराई. और तभी ये वॉक आउट वाला वाकया हुआ. इसकी नौबत आई किसानों से भूमि अधिकार छीनने के लिए प्रस्तावित एक बिल के दौरान. मेहता ने बिल की धज्जियां उड़ाते हुए कहा कि ब्रिटिश हुकूमत एक ऐसा बाप बनती जा रही है, जो मां से कहती है कि बच्चों को गरीबी में भी जिंदा रखो. जबकि खुद अय्याशी करने में मगन है. मेहता आगे बोले.

एक भारतीय किसान के जीवन में क्या है. मिट्टी के कुछ नए बर्तन. कुछ जंगली किस्म के फूल. देहाती टमटम. पेट भर खाना. रद्दी सा पान सुपारी और कभी-कभी भड़कीले चांदी के गहने. यही तो वे चंद खुशियां हैं जो एक सामान्य गृहस्थ, जिसकी जिंदगी सुबह से शाम तक एक थका देने वाले श्रम की अटूट कड़ी है, त्योहार के मौके पर महसूस करता है.

इसके बाद सरकार बहुमत के बल पर विधेयक पास करने पर अड़ गई, तो मेहता, गोखले और दूसरे सदस्य सदन से वॉक आउट कर गए. ये अभूतपूर्व था. ब्रिटिश परंपराओं के पोषकों को मिर्ची लग गई. उस वक्त टाइम्स ऑफ इंडिया अखबार एक इंगलिश एडिटर की कलम तले था. उसने लिखा. इन सदस्यों से फौरन इस्तीफा लिखवा लेना चाहिए.
बहरहाल, मेहता की परंपरा को गोखले ने काउंसिल में जिंदा रखा. 1902 में ब्रिटिश वित्त सचिव एडवर्ड लॉ ने 7 करोड़ की बचत का बजट पेश किया. हर तरफ उनकी वाहवाही हो रही थी. मगर गोखले ने ऐसा नहीं किया. वह बोले, मैं अपनी अंतश्चेतना के चलते सरकार को बधाई नहीं दे सकता. उन्होंने कहा कि देश की असल हालत और वित्तीय स्थिति के बीच समन्वय नहीं है. गोखले ने तार्किक आंकड़े देकर बताया कि कैसे अकाल के वक्त भी बर्तानिया सरकार ने लगान की दरें बढ़ाईं. सेना पर फिजूल खर्च किया और शिक्षा में खर्च पर कटौती की.
गोखले के इन भाषणों ने सरकार की नकली छवि को सिरे से उधेड़ दिया. स्वदेशी प्रेस ने उन्हें हाथों हाथ लिया. कांग्रेस नेता का कमाल यह था कि उन्होंने काउंसिल की आंकड़ों के बोझ से चरमराती फुसफुसाहटों को राष्ट्रवाद और अर्थव्यवस्था की जिंदा बहसों में तब्दील कर दिया. काउंसिल एक ओपन यूनिवर्सिटी बन गई. उनके भाषण की रपट पढ़ने के लिए लोग अगले दिन अखबारों का इंतजार करने लगे.
गोखले मशहूर हो गए. कांग्रेस पर उनकी पकड़ भी बढ़ गई. 1905 में वह इसके अध्यक्ष बने. मगर इसी कार्यकाल के आखिर में यानी 1906 में पार्टी का विभाजन भी हुआ. वजह बनी उनकी तिलक से अदावत. तिलक ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ उग्र ढंग से विरोध के हिमायती थे. उनका मानना था कि इन संसदीय बहसों से कुछ हासिल नहीं होगा. जबकि गोखले का मानना था कि भारतीयों को पहले शिक्षित होने की आवश्यकता है. तभी वह नागरिक के तौर पर अपना हक यानी आजादी हासिल कर पाएंगे.
बहरहाल, कांग्रेस में विभाजन हुआ तो सरकार के सामने उसकी राजनीतिक स्थिति कमजोर हो गई. इस दौरान गोखले नई प्रतिभाओं को भी दम देने का काम करते रहे. 1912 में वह बैरिस्टर मोहनदास करमचंद गांधी के न्योते पर अफ्रीका के दौरे पर गए. इसी दौरान बॉम्बे में उन्होंने प्रतिभाशाली बैरिस्टर मोहम्मद अली जिन्ना को भी राजनीतिक संरक्षण दिया.
गोखले जिन्ना की मेधा से बहुत प्रभावित थे. उनका कहना था कि जिन्ना हिंदू मुस्लिम एकता का सर्वोत्तम नमूना हैं.
गांधी जब भारत लौटे तो सबसे पहले गोखले से मिले. गोखले उनके राजनीतिक गुरु थे. उन्होंने गांधी से कहा. यदि देश को समझना है तो इसके करीब जाओ. पूरे देश को देखो. समझो. तब ही अपनी रणनीति बनाओ. गांधी ने ये बात मरते दम तक अमल में रखी. वह देशवासियों से लगातार उनके घरों में, गांवों में, खेतों में मिलते रहे.
19 फरवरी 1915 को गोखले का मुंबई में निधन हो गया. महज 48 साल की उम्र में. लगातार सफर और सक्रियता के चलते वह बीमार रहने लगे थे. उनकी मौत से देश और खासतौर पर बॉम्बे का बौद्धिक तबका सन्न रह गया.
धुर विरोधी तिलक ने सम्मान में जो कहा, वो आज की राजनीतिक रस्साकशी के दौर में याद करना जरूरी है. तिलक गोखले की चिता को देखते हुए बोले. ये भारत का रत्न सो रहा है. देशवासियों को जीवन में इनका अनुकऱण करना चाहिए. वहीं गांधी ने अपने गुरु को याद करते हुए कहा.

गोखले क्रिस्टल की तरफ साफ थे. एक मेमने की तरह दयालु थे. एक शेर की तरह साहसी थे. और इन राजनीतिक हालात में आदर्श पुरुष थे.

आज के वक्त में गोखले को याद करना संसदीय बहस की स्वस्थ परंपराओं को याद करना है. राजनीतिक असहमतियों के बीच व्यक्तिगत राग द्वेष से परे रहने की कला को याद करना है. और ये भी याद करना है कि आखिर में आपकी मेहनत और नीयत ही तारीख में कद तय करती है.

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