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ड्रिंक-ड्राइव को मिक्स नहीं करते तो इंश्योरेंस-इन्वेस्टमेंट को क्यों मिक्स करते हो यार?

आर्टिकल में इंश्योरेंस, इन्वेस्टमेंट, सेविंग आदि के बारे में दी गईं अधिकतर परिभाषाएं आधिकारिक नहीं है और एक आम आदमी को ध्यान में रखकर लिखी गईं हैं ताकि हम सब ही, इन सब चीज़ों की अधिक से अधिक जानकारी, आसान से आसान तरीके से पा सकें. हम अनुरोध करते हैं कि इस लेख में दी गई जानकारी को अपनी रियल-लाइफ में लागू करने से पूर्व निवेश-विशेषज्ञ की राय अवश्य लें.

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# मैनेजमेंट (प्रबंधन)

प्रबंधन की परिभाषा वगैरह में पड़ने से अच्छा आपको ये बताते हैं कि इसके टोटल छः चरण होते हैं. और यदि आप इन छः चरणों को ध्यान में रखकर कोई भी काम करते हैं, तो वो मैनेजमेंट की श्रेणी में आएगा (जैसे कि – होटल मैनेजमेंट, एंगर मैनेजमेंट, रिस्क मैनेजमेंट, होम मैनेजमेंट, टाइम मैनेजमेंट आदि). लोगों को कहते भी सुना होगा आपने – अपने काम को मैनेज करना सीखो. उसका अर्थ ये ही है कि अपने काम को इन छः चरणों में करना सीखो –

1) फोरकास्टिंग (पूर्वानुमान)
2) प्लानिंग (योजना)
3) ऑर्गनाइजिंग (व्यवस्था करना)
4) कमांडिंग (नियोग)
5) को-ऑर्डनेटिंग (समन्यव)
6) कंट्रोलिंग (नियंत्रित करना)


# रिस्क मैनेजमेंट (जोख़िम प्रबंधन)

अब मैनेजमेंट का अस्तित्व ही इसलिए है कि इस एक शब्द को किसी भी कार्य से जोड़ दिया जाए तो उस कार्य में नुकसान कम और संसाधनों का उपयोग महत्तम हो जाता है. ऐसा ही रिस्क मैनेजमेंट में भी है.

रिस्क मैनेजमेंट के अंतर्गत, किसी रिस्क को कैसे टाला जाए, इससे अधिक इस बात पर ज़ोर दिया जाता है कि किसी अपरिहार्य दुर्घटना में नुकसान कैसे कम से कम हो. तभी तो रिस्क मैनेजमेंट को ध्यान में रखकर बनाई गई बिल्डिंग भूकंप-अवरोधी होती है, आग से बचने के लिए छत पर पानी वाले फव्वारे लगे होते हैं.

यदि आप किसी कार्य में होने वाले नुकसान का या उसमें निहित रिस्क का पहले से ही अनुमान लगा कर (मैनेजमेंट का प्रथम स्टेप) उसकी प्रॉपर प्लानिंग (मैनेजमेंट का द्वितीय स्टेप) करके अपने संसाधनों को उसी तरह से व्यवस्थित करते हैं (मैनेजमेंट का तीसरा स्टेप) कि – अव्वल तो दुर्घटनाएं घटे ही न और यदि घटे भी तो दुर्घटना होने की स्थिति में कम से कम नुकसान हो – तो फिर आप ‘रिस्क मैनेजमेंट’ को बहुत हद तक फॉलो करते हैं. और यदि भगवान न करे दुर्घटना हो ही गई और थोड़ा बहुत नुकसान भी हो ही गया तो – ‘पिछली बार दुर्घटना क्यूं हुई’, ‘पिछली बार जो नुकसान हुआ उसे कैसे कम किया जाए’ – आदि का भी संज्ञान लेते हैं तो आप मैनेजमेंट के अंतिम स्टेप – कंट्रोलिंग को भी फ़ॉलो करते हैं. इससे यह होगा कि हर बार आपका रिस्क मैनेजमेंट सिस्टम और अधिक – और अधिक मज़बूत होता चला जाएगा. और यूं हर बार दुर्घटना में और कम – और कम नुकसान होगा.

आपने देखा ही होगा कि ‘एंटी-वायरस’ के हर साल नए-नए, ज़्यादा कारगर वर्ज़न आते रहते हैं. यदि ‘रिस्क मैनेजमेंट’ में ‘कंट्रोलिंग’ न होती तो वही पुराना वर्ज़न चलता रहता.


# इंश्योरेंस (बीमा)

रिस्क या दुर्घटनाएं ‘आर्थिक’ भी हो सकती हैं. बल्कि हर दुर्घटना का एक आर्थिक पक्ष होता ही होता है. इसलिए ही तो इंश्योरेंस जो है, वो आता है रिस्क मैनेजमेंट के अंदर. इंश्योरेंस किसी भी तरह का हो, वो होता भविष्योन्मुखी ही है. मतलब उस नुकसान की भरपाई के लिए, जो अभी हुई ही नहीं. और इसमें मैनेजमेंट के छः स्टेप्स भी होते हैं. आगे बढ़ने से पहले एक सत्य घटना जानते हैं:

दूसरी और तीसरी सदी में यात्राएं, ख़ास तौर पर समुद्री और नदी की यात्राएं, बहुत जोखिम भरी होतीं थी. लेकिन व्यापार करने के लिए और अपने माल को बेचने के लिए ये यात्राएं अपरिहार्य भी थीं. चीनी यात्री/व्यापारी अपने सामान को अलग-अलग जहाजों में बांट लेते थे, ताकि किसी एक जहाज के डूब जाने या लुट जाने पर हर एक का थोड़ा-थोड़ा नुकसान हो, न कि एक ही को बहुत-सारा.

वहीं दूसरी ओर, बेबीलोन में एक ऐसी प्रणाली विकसित हुई जिसमें यदि एक व्यापारी अपनी यात्रा और शिपमेंट के लिए ऋण लेता था तो उसे यह सुविधा भी प्राप्त थी कि वह थोड़ी अतिरिक्त राशि का भुगतान करे और यदि सामान चोरी हो जाए या डूब जाए तो फिर ऋण न लौटाए. ऋणदाता को भी इसलिए कोई नुकसान नहीं होता था क्यूंकि यदि दस व्यापारियों ने अतिरिक्त राशि का भुगतान करे और एक जहाज डूब भी जाए, तो भी बाकी नौ लोगों की अतिरिक्त राशि से हिसाब बराबर हो जाता था.

इन दोनों कहानियों से हमें ये शिक्षा मिलती है कि ‘इंश्योरेंस’ नामक ‘रिस्क मैनेजमेंट’ एक ऐसा ‘पूल’ सिस्टम है जिसमें भविष्य में होने वाले आर्थिक नुकसान को कम नहीं किया जाता बल्कि बराबर-बराबर सभी लोगों में बांट दिया जाता है.


# गेम थ्योरी

कैसिनो में एक कहावत प्रसिद्ध है कि – हाउस नेवर लूज़ – यानी जो जुए को आर्गेनाइज करवाता है वो कभी नहीं हारता, या उसका कभी नुकसान नहीं होता. क्यूंकि जीते कोई भी, पर हर दांव लगाने वाले के पैसे में से ‘हाउस’ पहले ही अपना ‘कट’ निकाल लेता है. कैसिनो में गेम थ्योरी इसी काम आती है कि कैसे दांव निर्धारित किए जाएं कि – हाउस नेवर लूज़. सारे गुणा भाग, सारे समीकरण इसी के लिए. एक उदाहरण देखिए –

दो रूपये का एक लॉटरी का टिकट है जिसमें शून्य से लेकर नौ तक नंबर लिखे हैं. जिस किसी की भी लॉटरी खुलेगी उसको अट्ठारह रुपए मिलेंगे. अब हर दस टिकट बिकने पर ‘हाउस’ को मिलते हैं बीस रुपए और जीतने वाले अट्ठारह रुपए और जिसकी लॉटरी न खुली उसको होता है दो रुपए का नुकसान.

वैसे तो गेम थ्योरी का कांसेप्ट बहुत विशाल है और इसका उपयोग मनोविज्ञान, लॉजिक, कंप्यूटर-साइंस से लेकर लॉस वेगास के कैसिनो तक में किया जाता है लेकिन हमारा उद्देश्य गेम थ्योरी नहीं, इंश्योरेंस को समझना है.

कैसिनो या जुए की तरह का ही कुछ होता है इंश्योरेंस में भी. चूंकि जुए से उलट इंश्योरेंस एक नोबल-कॉज़ है इसलिए इसमें हाउस को कुछ नहीं मिलता (या आदर्श रूप से कुछ नहीं मिलना चाहिए, और IRDA की रूलिंग भी यही कहती है. IRDA के बारे में आगे बताते हैं.) तो ऊपर वाले उदाहरण में जुए के बदले इंश्योरेंस को फिट किया जा सकता है. बस दो अंतर हैं –

# 1 – हाउस को कुछ नहीं मिलेगा, और
# 2 – नुकसान जिसका हुआ उसे उतना ही पैसा मिलेगा जितने का उसे नुकसान हुआ है, न कि बीस रुपया. याद रखिए कि इंश्योरेंस एक नो-लॉस, नो-प्रॉफिट कांसेप्ट है.

ये मज़े की बात है न इंश्योरेंस पूरी तरह एक ‘आर्थिक’ अवधारणा होते हुए भी – नो-लॉस, नो-प्रॉफिट कांसेप्ट है.

तो इस तरह से हमें ये समझ में आता है कि यदि आपने पांच लाख का हेल्थ इंश्योरेंस करवाया है तो ऐसा नहीं है कि आपका खर्चा तो हुआ बीस हज़ार पर आपको मिल गए पांच लाख. नहीं! आप कितने ही बड़े अमाउंट का इंश्योरेंस करवा लें, आपको मिलेंगे उतने ही जितना आपका खर्च हुआ है – इंश्योरेंस एक नो-लॉस, नो-प्रॉफिट कांसेप्ट है. साथ ही यदि आपके पांच लाख से अधिक खर्च होता है तो भी आपको केवल पांच लाख ही मिलेंगे. यानी आपको ‘महत्तम’ पांच लाख रुपए मिलेंगे.


# कवर और प्रीमियम

गेम थ्योरी का उपयोग इंश्योरेंस में इसलिए ही किया जाता है ताकि इंश्योरेंस का प्रीमियम निर्धारित किया जा सके. प्रीमियम बोले तो वो छोटी सी राशि जो आपको एक बड़ी राशि का इंश्योरेंस दिलाएगी. और दुर्घटना हो जाने की स्थिति में जो महत्तम राशि मिलेगी वो है ‘कवर’ या ‘इंश्योरेंस कवर’. और इसे निर्धारित करने के लिए बहुत से फेक्टर ध्यान में रखने पड़ते हैं. कुछ फेक्टर्स नीचे बता रहे हैं –

# 1) पूल कितना बड़ा है – जितना बड़ा ‘पूल’ होगा (यानी जितने लोग इंश्योरेंस करवाएंगे) प्रीमियम-अमाउंट उतना ही कम होता जाएगा. जैसे यदि पूल में केवल एक ही आदमी हो तो इसका मतलब तो यही हुआ कि उसको अपने नुकसान की भरपाई खुद ही करनी पड़ेगी. किंतु जैसे जैसे लोग बढ़ते जाएंगे प्रीमियम अमाउंट घटता जाएगा.

# 2) दुर्घटना की प्रायिकता क्या है – मतलब कि आम तौर पर कितने प्रतिशत लोग उस दुर्घटना के शिकार होते हैं जिसपर इंश्योरेंस आधारित है. जैसे – यदि दस में से एक आदमी कैंसर का और दो हार्ट अटैक के शिकार होते हैं, और यदि दोनों के ही इलाज के खर्च बराबर हो तो, हार्ट अटैक वाले हेल्थ इंश्योरेंस की तुलना में कैंसर वाले हेल्थ इंश्योरेंस का प्रीमियम कम होगा.
(इसलिए ही तो जिसकी जितनी उम्र उसका उतना ज़्यादा प्रीमियम, क्यूंकि बढ़ती उम्र के साथ बीमार पड़ने की प्रायिकता बढ़ जाती है.)

# 3) रिस्क कवर कितना बड़ा है – अब आपने लिया रिस्क कवर दस लाख का और दूसरे ने पांच लाख का, तो ऐसा नहीं है कि आप दोनों को बराबर रुपए देने पड़ेंगे. क्यूंकि दरअसल आप यदि दुर्घटना के शिकार हुए तो आपको ‘महत्तम’ दो लोगों के बराबर पैसा मिलेगा. (लेकिन फिर भी ऐसा नहीं है कि दस लाख वाले को पांच लाख वाले से दुगने रुपए देने पड़ेंगे, क्यूंकि अंततः हेल्थ इंश्योरेंस में आपको उतने ही रुपए मिलते हैं जितने आपने खर्च हुए, चाहे कितने का भी इंश्योरेंस कवर लिया हो. हेल्थ इंश्योरेंस ही नहीं ऐसा कमोबेश हर तरह के इंश्योरेंस में होता है, एक को छोड़कर. कौन सा और क्यूं ये भी नीचे बताया जाएगा.)

ऐसे ही कई कारक हैं जिन्हें ध्यान में रखकर न केवल प्रीमियम तय होता है बल्कि पूरी की पूरी पॉलिसीज़ का एक ढांचा बनता है.


# IRDAI

पॉलिसी बनाने वालों को आम बोलचाल की भाषा में कहते हैं – इंश्योरेंस कंपनीज़. जैसे बजाज-एलायंज़, ICICI-लोम्बार्ड, टाटा-AIG, भारती-AXA, LIC आदि.

अब एक पॉलिसी बनाने में बनाने वाला गड़बड़ी कर सकता है, जैसे कि प्रीमियम ज़्यादा ले सकता है, क्लेम के वक्त पैसे कम या नहीं दे सकता है, और सबसे बुरा – आपके प्रीमियम के पैसे लेकर भाग सकता है.

तो इन सब, और बाकी कई तरह के, फ्रॉड से आपको बचाने के लिए भारत सरकार ने गठित की है – IRDAI. यानी इंश्योरेंस रेग्युलेटरी डेवलपमेंट अथॉरिटी यानी भारतीय बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण. जैसे बैंको के लिए RBI और शेयर मार्किट के लिए SEBI वैसे ही इंश्योरेंस के लिए IRDAI.

IRDAI एक स्वायत्त, वैधानिक एजेंसी है जो भारत में बीमा उद्योगों को कंट्रोल करती है और बढ़ावा भी देती है.


# जनरल और लाइफ इंश्योरेंस के बीच अंतर

ऊपर की परिभाषाओं में जितने तरह के रिस्क कवर आ सकते हैं वो सारे दरअसल जनरल इंश्योरेंस ही हैं – कार इंश्योरेंस, हेल्थ इंश्योरेंस.

लाइफ-इंश्योरेंस तो ऊपर की परिभाषा से दरअसल ‘इंश्योरेंस’ में आता ही नहीं. क्यूंकि – लाईफ-इंश्योरेंस की सबसे आसान परिभाषा यही है कि किसी की मृत्यु पर नॉमिनी को एक निश्चित राशि मिलती है. अब ये तो इंश्योरेंस की परिभाषा से बिल्कुल उल्टा हुआ. क्यूंकि बेशक किसी की मृत्यु से आर्थिक नुकसान होगा, लेकिन ये कैसे पता लगे कि कितना नुकसान होगा/हुआ.

इसी बात को अप्रत्यक्ष रूप से स्वीकार करते हुए लाइफ इंश्योरेंस और बाकी सब इंश्योरेंस में सबसे बड़ा अंतर यह रखा जाता है कि – हर तरह के जर्नल इंश्योरेंस में जहां आपको जितना आर्थिक नुकसान हुआ और जितने का इंश्योरेंस कवर है उसमें से जो भी अमाउंट कम है उतना भुगतान किया जाता है, लेकिन लाइफ इंश्योरेंस में आपको कितना आर्थिक नुकसान हुआ ये तो कैलकुलेट किया ही नहीं जा सकता इसलिए आपने जितने का कवर लिया उतना अमाउंट आपके नॉमिनी को दिया जाता है. और आप कितने भी अमाउंट का कवर ले सकते हैं, अपनी सामर्थ्य के अनुसार.


 # टर्म और रेगुलर प्रीमियम इंश्योरेंस में अंतर

# टर्म इंश्योरेंस – यदि आपने भविष्य में होने वाली किसी दुर्घटना के आर्थिक नुकसान से बचने के लिए इंश्योरेंस कंपनी को पैसा जमा किया और ‘निश्चित अवधि’ तक वह दुर्घटना नहीं घटी या आपको कोई आर्थिक नुकसान नहीं हुआ तो आपका सारा पैसा लेप्स. इस निश्चित अवधि को ही ‘पॉलिसी का टर्म’ और इस तरह के इंश्योरेंस को ही ‘टर्म पॉलिसी’ कहते हैं. एक उदाहरण से ये समझना आसान होगा –

आपने एक पांच हज़ार रुपए प्रीमियम का एक वर्ष का ‘टर्म हेल्थ-इंश्योरेंस’ लिया. यानि इस पॉलिसी का टर्म हुआ एक वर्ष. माना इसका प्रीमियम कवर है पांच लाख. अब यदि –

1) एक वर्ष के भीतर आपकी तबियत खराब होती है और आपके बीस हज़ार रुपए खर्च होते हैं – तो इंश्योरेंस कंपनी आपको बीस हज़ार रुपए देगी.

2) एक वर्ष के भीतर आपकी तबियत खराब होती है और आपके छः लाख खर्च होते हैं – तो इंश्योरेंस कंपनी आपको पांच लाख रुपए देगी. (छः क्यूं नहीं इसके लिए ऊपर गेम-थ्योरी वाला भाग फिर देखें.)

3) आपकी एक वर्ष में तबियत खराब नहीं होती है, या होती भी है तो आप क्लेम नहीं करते (बीमा आग्रह की विषय वस्तु है) – तो आपके पांच हज़ार रुपए लेप्स और अगले साल पांच लाख का कवर लेने के लिए आपको फिर से पांच हज़ार रुपए प्रीमियम देना पड़ेगा.

4) आपकी एक साल में दो बार तबियत खराब होती है – पहली बार बीस हज़ार खर्च होता है और दूसरी बार छः लाख, तो पहली बार तो आपको मिलेंगे पूरे बीस हज़ार लेकिन दूसरी बार केवल चार लाख अस्सी हज़ार. क्यूंकि आपका एक साल का ‘टर्म कवर’ पांच लाख है इसलिए पूरे साल में आपको महत्तम पांच लाख रुपए ही मिल सकते हैं.

यही तो इंश्योरेंस की परिभाषा है – कि कुछ लोग थोड़े थोड़े पैसे जमा करें, उन कुछ लोगों में से जिसका नुकसान हो उसे उस पूल में से पैसे दिए जाएं और बाकियों के पैसे लेप्स. न ज़्यादा गणित लगाना न ज़्यादा दिमाग. इसलिए ही टर्म इंश्योरेंस ही परिभाषा के हिसाब से असली इश्योरेंस है और उधर ‘रेगुलर प्रीमियम इंश्योरेंस’ परिभाषा से ‘इंश्योरेंस’ के अंतर्गत आता ही नहीं. कैसे? आइये समझें:

# रेगुलर प्रीमियम इंश्योरेंस – इसमें आप हर माह या हर साल या हर छः माह में एक निश्चित राशि देते हैं और ऐसा ‘रेगुलरली’ करते हैं. इस राशि को प्रीमियम कहते हैं. ऐसा आप एक अपेक्षाकृत लंबे समय तक – माना बीस वर्ष तक करते हैं. अब यदि बीस वर्ष तक आपने क्लेम नहीं किया तो आपको आपके सारे पैसे वापस मिल जाते हैं और साथ ही थोड़ा बढ़ कर.

कुछ चीज़ें गौर करें –

# पहली ये कि ‘रेगुलर प्रीमियम इंश्योरेंस’ का कोई ऑफिसियल नाम नहीं है. चूंकि हम इसे ही असली इंश्योरेंस समझते आ रहे हैं इसलिए इसे सिर्फ ‘इंश्योरेंस’ भी कह देते हैं. मगर आप समझ ही गए होंगे कि ये तो सेविंग और इंश्योरेंस का मिला जुला रूप है.

# दूसरी ये कि ‘रेगुलर प्रीमियम इंश्योरेंस’ ज़्यादातर ‘लाइफ इंश्योरेंस’ ही होते हैं. क्यूंकि इंसान दो बार नहीं मर सकता. लेकिन बीमार कई बार पड़ सकता है. बीस या तीस वर्ष में एक बार तो पड़ेगा ही. तो यदि ‘कार इंश्योरेंस’ और ‘हेल्थ इंश्योरेंस’ भी ‘रेगुलर प्रीमियम इंश्योरेंस’ हों अजीब सी स्थिती उत्पन्न हो जाएगी.


# सेविंग और इन्वेस्टमेंट:

आप हर महीने कुछ रुपया इकट्ठा करते हैं – ये सेविंग का उदाहरण है.

आप अपना रुपया बढ़ाते हैं या बढ़ाने की इच्छा से कहीं पैसा खर्च करते हैं – ये इन्वेस्टमेंट का उदाहरण है.

सेविंग उधार लेकर नहीं होती, न होनी चाहिए, लेकिन इन्वेस्टमेंट उधार या लोन लेकर भी किया जा सकता है. क्यूंकि अंततः आपको पता है (या उम्मीद है) कि जहां इन्वेस्ट किया है वहां से इतना माल वापस आ जाएगा कि न केवल उधार और उसका ब्याज़ वापस होगा बल्कि कुछ पैसा अपने लिए भी बच जाएगा.

अब यदि आप हर हर महीने कुछ रुपया इकट्ठा करते हैं और उस रुपए को बढ़ाना भी चाहते हैं – सेविंग प्लस इन्वेस्टमेंट.

कोई भी सेविंग प्योर सेविंग नहीं होती और कोई भी इन्वेस्टमेंट प्योर इन्वेस्टमेंट नहीं होता. मगर ‘सेविंग प्लस इन्वेस्टमेंट’ में सेविंग वाला पार्ट जितना ज़्यादा होगा रिस्क उतना कम लेकिन रिटर्न भी उतना ही कम होगा और इन्वेस्टमेंट वाला पार्ट जितना अधिक होगा रिस्क उतना ज़्यादा मगर रिटर्न भी उतना ही अधिक होगा.


# इंश्योरेंस, सेविंग्स और इन्वेस्टमेंट का घालमेल महंगा है:

अब तक के आर्टिकल से आपको पता चल गया होगा कि टर्म और रेगुलर इंश्योरेंस में, टर्म इंश्योरेंस रियल या तुलनात्मक रूप से ज्यादा रियल इंश्योरेंस है और लाइफ और जनरल इंश्योरेंस में जनरल इंश्योरेंस ज्यादा रियल इंश्योरेंस है. लेकिन हम ने तो हद्द ही कर रखी है हममें से ज्यादा लोगों के पास जो इंश्योरेंस से वो रेगुलर-प्रीमियम-लाइफ-इश्योरेंस है. यानी दो नकली इंश्योरेंस का घालमेल.

अब कहने वाले कहेंगे नाम से क्या फर्क पड़ता है. हमें इंश्योरेंस और इन्वेस्टमेंट एक साथ मिल रहा है.

बिलकुल सहमत, जिस तरह कमल में कमलत्व नहीं वैसे ही इंश्योरेंस में इंश्योरेंसत्व न हो तो क्या फर्क पड़ता है. लेकिन केवल गलत परिभाषा भर होती तो इतना बड़ा लेख ये सब समझाने के लिए लिखा ही नहीं जाता. लेकिन हमें निजी रूप से प्रभावित करने वाली दिक्कतें दो हैं – पहली तो ये कि जब हम इन्वेस्टमेंट या सेविंग्स के नाम पर कोई रेगुलर-प्रीमियम-लाइफ-इश्योरेंस लेते हैं तो जानकारों के सामने बेवकूफ साबित होते हैं और दूसरी और सबसे महत्वपूर्ण दिक्कत ये कि यदि आप इंश्योरेंस और इन्वेस्टमेंट और सेविंग्स तीनों को अलग अलग रखते हैं तो आप तुलनात्मक रूप से अपने पैसों को अधिक बेहतर तरीके से व्यवस्थित करते हैं और जहां एक तरफ कम पैसों में अधिक रिटर्न पाते हैं वहीं दूसरी तरफ एक बड़ी राशि का इंश्योरेंस पाते हैं.

याद रखिए कि ‘इंश्योरेंस’ में पैसे ‘इन्वेस्ट’ करना ऐसा ही है जैसे ‘ईएनटी विशेषज्ञ ‘से दांतों का इलाज करवाना. ऑफ कोर्स वो भी किया जा सकता है, क्यूंकि अंततः वो डॉक्टर ही है और ह्यूमन एनाटोमी के विषय में थोड़ा बहुत तो जानता ही होगा. लेकिन फिर भी यदि आपको ‘दंत-चिकित्सक’ और ‘ईएनटी-विशेषज्ञ ‘में एक चुनने का विकल्प मिले तो आप क्या चुनेंगे?

ठीक वैसे ही, ‘इंश्योरेंस’ में ‘इन्वेस्टमेंट’ कर आप बेशक ‘आर्थिक विशेषज्ञों’ को ही अपनी राशि सौंप रहे हैं लेकिन सबसेट अलग हैं. और जहां इंश्योरेंस नो-लॉस, नो प्रॉफिट कांसेप्ट है वहीं इन्वेस्टमेंट का एकमात्र उद्देश्य ही प्रॉफिट है.


क्या करें # 1: एक उदाहरण से आसानी से समझ आएगा. माना आपके पास पांच हज़ार रुपए हर माह बच जाते हैं और आप इसे इन्वेस्ट करना चाह रहे हैं, अगले बीस सालों तक. लेकिन आपको तो साथ ही साथ पच्चीस लाख का लाइफ-इंश्योरेंस भी चाहिए ताकि अगले बीस सालों तक आपको कुछ हो जाने की स्थिति में आपके नॉमिनी को पच्चीस लाख मिलें.

तो सबसे पहले तो तीन हजार प्रति-वर्ष से कम रुपए में बीस वर्ष का टर्म लाइफ इंश्योरेंस ले लें. बेशक आपको हर साल तीन हजार रुपए देने पड़ेंगे जो कि क्लेम न करने की स्थिति में वर्ष-दर-वर्ष लेप्स होते जाएंगे. लेकिन इन बीस सालों में आपको यदि कुछ हो जाता है, ईश्वर न करे, तो आपके नॉमिनी को पच्चीस लाख रुपए मिल जाएंगे. और एक बार आप तीन हज़ार रुपए वार्षिक देकर लाइफ इंश्योरेंस वाले टेंशन से मुक्त हुए तो आपके पास सालाना बच जाएगें सालाना सत्तावन हज़ार रुपए. अब इन सत्तावन हज़ार रुपए को वहां लगाएं जहां पर प्योर इन्वेस्टमेंट होता हो और इंश्योरेंस का नाम-ओ-निशान न हो. गुणा भाग करके देख लें, कहीं ज़्यादा फायदा हो रहा होगा.

क्या न करें # 1: हर महीने पूरे के पूरे पांच हज़ार रूपये इंश्योरेंस में इन्वेस्ट न करें. बल्कि एक रुपया भी ‘इंश्योरेंस’ में ‘इन्वेस्ट’ न करें. इंश्योरेंस अलग से लें और इन्वेस्टमेंट अलग करें.


# अब ये यूलिप क्या बला है?

इसका फुल-फॉर्म होता है – यूनिट लिंक्ड इंश्योरेंस प्लान. यदि आपने ‘क्या करें # 1’ को फ़ॉलो किया है या करने की सोच रहे हैं तो आपको इसकी चिंता करने की या जानने की बिलकुल ज़रूरत नहीं. लेकिन यदि आप इंश्योरेंस और इन्वेस्टमेंट दोनों एक ही पॉलिसी के माध्यम से लेना/करना चाहते हैं या यूलिप के विषय में ऐसे ही ज्ञानवर्धक-जानकारी चाहते हैं तो आगे पढ़िए.

जो लोग इंश्योरेंस में अपना पैसा इन्वेस्ट करते हैं या यूं कहें कि ‘रेगुलर-प्रीमियम-लाइफ-इंश्योरेंस’ लेते हैं उनके पास दो विकल्प होते हैं. एक तो पारंपरिक इन्श्योरेंस प्लान लिया जाए, जिसमें आपको इंश्योरेंस तो मिलता ही है साथ ही साथ एक निश्चित अवधि के बाद अपना पैसा थोड़ा बहुत बढ़ के वापस मिलता है. और दूसरा यूलिप – जिसमें इंश्योरेंस तो आपको ठीक पारंपरिक इन्श्योरेंस की तरह ही मिलता है लेकिन साथ ही इन्श्योरेंस कंपनी, आपका और आप जैसे अन्य यूलिप ग्राहकों का पैसा इकट्ठा करके कई जगहों में एक साथ इन्वेस्ट करती है – जैसे शेयर मार्किट में, सरकारी परियोजनाओं में, किसान विकास पत्र और कमोडिटी मार्किट में.

‘यूनिट लिंक इंश्योरेंस प्लान’ में ‘यूनिट लिंक’ का मतलब है कि आपके पैसे को एक ‘यूनिट’ यानी इकाई के साथ लिंक कर दिया जाता है. जैसे-जैसे वह यूनिट बढ़ती है उसी अनुपात में आपके पैसे, जो उस यूनिट से लिंक हैं, वो भी बढ़ते हैं. जब इंश्योरेंस कंपनी कोई पॉलिसी मार्किट में लाती है तो उस पॉलिसी की यूनिट ‘दस’ होती है. और यदि वो कभी बीस हो जाती है तो इसका मतलब कि आपके पैसे दुगने हो गए हैं. ये यूनिट के बढ़ने का अर्थ यही है कि आपके पैसे इंश्योरेंस कंपनी ने जहां इन्वेस्ट किए थे वहां पर कंपनी और इसलिए आपको लाभ हो रहा है. ऐसी पॉलिसी लेते वक्त देखें कि खरीदते वक्त यूनिट प्राइस क्या चल रहा है और नज़र बनाए रक्खें कि उसमें क्या उतार  चढ़ाव आ रहे हैं.

पारंपरिक इंश्योरेंस में रिस्क कम या शून्य होता है क्यूंकि आपको जितना वादा किया जाता है उतना पैसा वापस मिलता है, जबकि यूनिट लिंक इंश्योरेंस प्लान में रिस्क अधिक होता है क्यूंकि आपको प्रोमिस किया ही नहीं जाता कि कितना पैसा वापस मिलेगा, लेकिन हमने ऊपर जाना है कि जितना ज़्यादा रिस्क उतना अधिक रिटर्न.

अब थोड़ी सोचिए – इंश्योरेंस की मूल प्रकृति थी थोड़ी पैसे ज़ेब से देकर भविष्य में होने वाले रिस्क से अपने को सुरक्षित करना, लेकिन यूलिप ने इंशोयरेंस के ठीक उल्ट काम किया – थोड़ी ज़्यादा रिस्क लेकर थोड़ी पैसे जेब में डालना.


क्या करें # 2 – यूलिप लेने के बदले वही तीन हज़ार सालाना वाला इंश्योरेंस लें – टर्मलाइफ इंश्योरेंस, और बाकी के पैसे शेयर मार्केट में सीधे लगाएं, एसआईपी लें.

क्या न करें # 2 – इंश्योरेंस का अर्थ होता है थोड़ा सा पैसे देकर भविष्य में आने वाली आर्थिक मुसीबतों से अपने को निश्चिन्त करना, ऐसा न भी करें तो भी इसका उल्टा तो बिलकुल भी न करें. और करें भी तो उसे कम-से-कम इंश्योरेंस तो न ही कहें.


# पोर्टफोलियो और एसआईपी

चूंकि हमने ऊपर कहा है कि यूलिप लेने के बजाय शेयर मार्किट में लगाएं इसलिए हमारी ज़िम्मेदारी बन जाती है कि आपको तीन चार चीज़ें अंत में और बता दें –

# पहला, यदि आप शेयर मार्किट में पैसा लगा रहे हैं तो जुए के उद्देश्य से नहीं इन्वेस्टमेंट के उद्देश्य से लगाएं – यानी पैसे एक दो दिन के लिए नहीं लांग-टर्म के लिए लगाएं.

# दूसरा, पोर्टफोलियो डाइवर्स रखें. हिंदी में कहें तो एक ही शेयर में पैसे न लगाएं. कुछ पैसे एक शेयर में और कुछ दूसरे और कुछ तीसरे. साथ ही एक शेयर यदि इन्फ्रास्ट्रक्चर का हो तो दूसरा केमिकल्स का तीसरा एफएमसीजी का.

# तीसरा, एसआईपी यानी सिस्टमेटिक इन्वेस्टमेंट प्लान को अपनाएं. यानी एक बार में ही पैसे को लगा देना और एक बार में ही पैसे को निकाल लेना इन्वेस्टमेंट या सेविंग नहीं, जुए की श्रेणी में आता है. जबकि आप अगर हर महीने थोड़ा थोड़ा इन्वेस्ट करते हैं और अपने पोर्टफोलियो को भी अच्छे से मैनेज कर पाते हैं तो आपका रिस्क कम और रिटर्न अधिक होगा.


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खचाखच भरे स्टेडियम में भागने वाली लड़कियां जो जीवित हैं और जो मर गईं.

अलग हाव-भाव के चलते हिजड़ा कहते थे लोग, समलैंगिक लड़के ने फेसबुक पोस्ट लिखकर सुसाइड कर लिया

'मैं लड़का हूं. सब जानते हैं ये. बस मेरा चलना और सोचना, भावनाएं, मेरा बोलना, सब लड़कियों जैसा है.'

ब्लॉग: शराब पीकर 'टाइट' लड़कियां

यानी आउट ऑफ़ कंट्रोल, यौन शोषण के लिए आमंत्रित करते शरीर.

औरतों को बिना इजाज़त नग्न करती टेक्नोलॉजी

महिला पत्रकारों से मशहूर एक्ट्रेसेज तक, कोई इससे नहीं बचा.

सौरभ से सवाल

दिव्या भारती की मौत कैसे हुई?

खिड़की पर बैठी दिव्या ने लिविंग रूम की तरफ मुड़कर देखा. और अपना एक हाथ खिड़की की चौखट को मजबूती से पकड़ने के लिए बढ़ाया.

कहां है 'सिर्फ तुम' की हीरोइन प्रिया गिल, जिसने स्वेटर पर दीपक बनाकर संजय कपूर को भेजा था?

'सिर्फ तुम' के बाद क्या-क्या किया उन्होंने?

बॉलीवुड में सबसे बड़ा खान कौन है?

सबसे बड़े खान का नाम सुनकर आपका फिल्मी ज्ञान जमीन पर लोटने लगेगा. और जो झटका लगेगा तो हमेशा के लिए बुद्धि खुल जाएगी आपकी.

'कसौटी ज़िंदगी की' वाली प्रेरणा, जो अनुराग और मिस्टर बजाज से बार-बार शादी करती रही

कहां है टेलीविज़न का वो आइकॉनिक किरदार निभाने वाली ऐक्ट्रेस श्वेता तिवारी?

एक्ट्रेस मंदाकिनी आज की डेट में कहां हैं?

मंदाकिनी जिन्हें 99 फीसदी भारतीय सिर्फ दो वजहों से याद करते हैं

सर, मेरा सवाल है कि एक्ट्रेस मीनाक्षी शेषाद्री आजकल कहां हैं. काफी सालों से उनका कोई पता नहीं.

‘दामिनी’ के जरिए नई ऊंचाई तक पहुंचा मीनाक्षी का करियर . फिर घातक के बाद 1996 में उन्होंने मुंबई फिल्म इंडस्ट्री को बाय बोल दिया.

ये KRK कौन है. हमेशा सुर्खियों में क्यों रहता है?

केआरके इंटरनेट एज का ऐसा प्रॉडक्ट हैं, जो हर दिन कुछ ऐसा नया गंधाता करना रचना चाहता है.

एक्ट्रेस किमी काटकर अब कहां हैं?

एडवेंचर ऑफ टॉर्जन की हिरोइन किमी काटकर अब ऑस्ट्रेलिया में हैं. सीधी सादी लाइफ बिना किसी एडवेंचर के

चाय बनाने को 'जैसे पापात्माओं को नर्क में उबाला जा रहा हो' कौन सी कहानी में कहा है?

बहुत समय पहले से बहुत समय बाद की बात है. इलाहाबाद में थे. जेब में थे रुपये 20. खरीदी हंस...

सर आजकल मुझे अजीब सा फील होता है क्या करूं?

खुड्डी पर बैठा था. ऊपर से हेलिकॉप्टर निकला. मुझे लगा. बाबा ने बांस गहरे बोए होते तो ऊंचे उगते.