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क्या Article 35A को खत्म करने जा रही है मोदी सरकार?

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29 जुलाई- बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व ने ‘अर्जेंट मीटिंग’ के लिए जम्मू-कश्मीर के अपने कोर ग्रुप को फौरन दिल्ली बुलाया. मीटिंग 30 जुलाई को है.

28 जुलाई- प्रधानमंत्री मोदी ने अपने ‘मन की बात’ में जम्मू-कश्मीर के शोपियां में रहने वाले किसी मुहम्मद असलम का ज़िक्र करते हुए कहा कि कश्मीर के लोग विकास की मुख्यधारा में जुड़ने को बेताब हैं.

28 जुलाई- श्रीनगर के रेलवे सुरक्षा बल (RPF) में सीनियर डिविजनल सिक्यॉरिटी कमिश्नर के दफ़्तर से एक चिट्ठी जारी हुई. इसमें कर्मचारियों कहा गया था कि वो राशन और पीने का पानी जमा कर लें. ये भी ताकीद थी कि परिवार को कश्मीर में न रखें. बाद में रेलवे मंत्रालय ने चिट्ठी वापस ले ली. सफाई भी आई.

27 जुलाई- सरकार ने जम्मू-कश्मीर में अतिरिक्त पुलिस फोर्स तैनात करने का फैसला किया. तय हुआ कि 100 कंपनियां रवाना की जाएंगी. 50 कंपनियां CRPF. 30 कंपनियां सशस्र सीमा बल. 10 कंपनियां सीमा सुरक्षा बल (BSF). और, 10 कंपनियां इंडो तिब्बत बॉर्डर पुलिस (ITBP).

26 जुलाई- सेना प्रमुख बिपिन रावत बोले, ‘कोई भी स्थानीय चरमपंथी जो कि सुरक्षा बलों को खिलाफ बंदूक उठाता है, अब मिलिटेंट नहीं रहेगा. बंदूक को उससे अलग कर दिया जाएगा. वो जाएगा कब्र में और बंदूक हमारे पास आएगी.’

20 जुलाई- रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह जम्मू के कठुआ पहुंचे. उझ नदी पर हज़ार मीटर लंबे पुल का उद्घाटन करते हुए बोले, ‘कश्मीर समस्या का हल जल्दी ही होने वाला है. अगर बातचीत से नहीं, तो कैसे, हमें अच्छी तरह मालूम है. यकीन मानिए, इसका समाधान होकर रहेगा. मैं जो बोलता हूं, सोच-समझ कर बोलता हूं. ऐसे ही नहीं बोलता हूं. जो लोग कहते हैं कि कश्मीर स्वर्ग था, मैं उनसे कहता हूं कि जम्मू-कश्मीर दोबारा धरती का जन्नत बनाया जा सकता है.

जम्मू-कश्मीर में कुछ बड़ा होने जा रहा है. पिछले कुछ दिनों से लगातार इसी मिजाज़ की ख़बरें आ रही हैं. 30 जुलाई को दिल्ली में जम्मू-कश्मीर पर एक अर्जेंट मीटिंग होने की ख़बर है. इसकी अध्यक्षता बीजेपी के कार्यकारी अध्यक्ष जे पी नड्डा कर सकते हैं. नरेंद्र मोदी और अमित शाह भी इस मीटिंग में पहुंच सकते हैं. इसका क्या अजेंडा है, किस मुद्दे पर तत्काल बात होनी है, इसका कोई साफ जवाब नहीं मिला है. मगर कयास है कि ये सरगर्मी आर्टिकल 35 ए और आर्टिकल 370 को लेकर है.

क्या है Article 35 ए?
ये उपजा है आर्टिकल 370 से. 1954 में राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के एक आदेश से इसकी शुरुआत हुई थी. ये जम्मू-कश्मीर को अधिकार देता है कि वो अपने स्थायी बाशिंदों और उनके विशेषाधिकारों को परिभाषित करे. 1956 में जब जम्मू-कश्मीर का संविधान लागू हुआ, तो परमानेंट रेजिडेंट की व्याख्या की गई. कि जो 14 मई, 1954 को यहां रहता हो. या फिर 10 सालों से यहां का बाशिंदा हो. और उसने कानूनी तरीके से यहां अचल संपत्ति खरीदी हो. इस नियम के मुताबिक, बाहर का कोई भी इंसान जम्मू-कश्मीर में प्रॉपर्टी नहीं खरीद सकता. न ही उसे राज्य सरकार की नौकरी मिल सकती है.

इस तरह के भी काफी ट्वीट चल रहे हैं. लोग 'ओवर इन्थ्युसिआज़म' दिखाते हुए आर्टिकल 35 A खत्म होने पर ये करेंगे, वो करेंगे वाले खूब पोस्ट डाल रहे हैं.
इस तरह के भी काफी ट्वीट चल रहे हैं. लोग ‘ओवर इन्थ्युसिआज़म’ दिखाते हुए आर्टिकल 35 A खत्म होने पर ये करेंगे, वो करेंगे वाले खूब पोस्ट डाल रहे हैं.

इस नियम में खास बातें क्या हैं?

अ. जम्मू-कश्मीर के स्थायी निवासियों को इस आर्टिकल 35 ए के द्वारा विशेषाधिकार मिलते हैं.
ब. केवल स्थायी निवासियों को ही जम्मू-कश्मीर के अंदर अचल संपत्ति खरीदने और यहां स्थायी तौर पर बसने का हक़ है.
प. अगर कोई महिला राज्य के बाहर के किसी शख्स से शादी करती है, तो उसे संपत्ति का अधिकार नहीं मिलता है.
स. कंपनियां यहां बाहर के लोगों या अस्थायी निवासियों को नौकरी नहीं दे सकती हैं.

इस नियम को लेकर क्या आपत्ति है?

संविधान में देखेंगे तो आर्टिकल 35 के बाद सीधे आर्टिकल 36 आ जाता है. यानी, आर्टिकल 35 (ए) संविधान के मुख्य हिस्से में नहीं है. ये आता है अपेंडिक्स I में. वहां आर्टिकल 35 में जोड़ी जाने वाली अतिरिक्त चीजों के साथ इसका ज़िक्र आता है. ऐसे में एक आपत्ति ये उठती है कि संविधान में संशोधन का अधिकार केवल संसद को है. चूंकि इसे राष्ट्रपति के आदेश से जोड़ा गया है, सो इसके साथ संसदीय स्वीकृति शामिल नहीं है.

बीजेपी का क्या स्टैंड है इसपर?

जनसंघ के ही जमाने से पार्टी आर्टिकल 370 को रद्द किए जाने के पक्ष में है. 2019 के इलेक्शन मेनिफेस्टो में भी बीजेपी ने यही बात दोहराई थी. साथ ही, आर्टिकल 35 ए को भी खत्म किए जाने का वादा किया था बीजेपी ने. इस बारे में मेनिफेस्टो के अंदर लिखा था-

ये नियम अस्थायी निवासियों और जम्मू-कश्मीर की महिलाओं के साथ भेदभाव करता था. ये राज्य के विकास में एक बाधा है.

सुप्रीम कोर्ट में क्या चल रहा है?

आर्टिकल 35 ए की संवैधानिक मान्यता को चुनौती देती हुई सात अलग-अलग याचिकाएं हैं कोर्ट में. पहली दायर हुई थी 2014 में. ‘वी द पीपल’ नाम के एक NGO ने इसे दाखिल किया था. इसकी दलील है कि कॉन्स्टिट्यूशन ऑर्डर, 1954 (जम्मू-कश्मीर के संबंध में) जिसके द्वारा आर्टिकल 35 (ए) लाया गया, उसमें कानूनी वैधता नहीं है. बाकी याचिकाओं का कहना है कि ये पश्चिमी पाकिस्तान से आए शरणार्थियों और राज्य से बाहर के इंसान से शादी करने वाली कश्मीरी मूल की महिलाओं के साथ पक्षपात करता है. 2014 से अब तक इन याचिकाओं पर करीब 20 बार सुनवाई हो चुकी है. अब इस मामले में आखिरी फैसला आने की उम्मीद है. हालांकि ये फैसला कब आएगा, इसकी कोई तारीख़ अभी तय नहीं है.

सरकार का क्या रुख है?

कुछ साफ तो नहीं है, मगर संकेत देखकर कुछ बड़ा होने के कयास लगाए जा रहे हैं. सरकार की तरफ से हुए कुछ खास डिवेलपमेंट हैं, जिनकी वजह से कहा जा रहा है कि केंद्र कुछ बड़ा कदम उठाने की तैयारी में है. इनमें से खास घटनाक्रम हैं-

1. गृह मंत्रालय संभालने के बाद अमित शाह सबसे पहले कश्मीर पहुंचे थे.

2. शाह के बाद रॉ के मुखिया सामंत गोयल भी दो दिनों के लिए घाटी गए.

3. गृह मंत्रालय ने जम्मू-कश्मीर में अतिरिक्त फोर्स तैनात करने का जो आदेश जारी किया, उससे ठीक पहले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल भी घाटी पहुंचे.

4. अचानक ही जम्मू-कश्मीर में 100 अतिरिक्त कंपनियां तैनात करने का फैसला लिया गया.

5. 30 जुलाई को आनन-फानन में जम्मू-कश्मीर को लेकर अर्जेंट मीटिंग बुलाई गई. इसके लिए कोर ग्रुप के नेताओं को 29 जुलाई को दिल्ली पहुंचना है.

इसके अलावा काफी बयानबाजियां भी हो रही हैं. विपक्ष के नेता और बीजेपी के लोग काफी कुछ कह रहे हैं. जम्मू-कश्मीर में PDP और नैशनल कॉन्फ्रेंस आर्टिकल 35 ए में किसी भी तरह की तब्दीली के सख़्त खिलाफ हैं. उनका कहना है कि ये आर या पार की लड़ाई होगी. इधर बीजेपी के लोग लगातार आर्टिकल 35 ए खत्म किए जाने की ज़रूरत का बचाव कर रहे हैं. घाटी का मूड समझने के लिए इनमें से कुछ चुनिंदा बयान पढ़िए-

फार्रूख अब्दुल्ला- 

आर्टिकल 35 A और आर्टिकल 370 नहीं हटाए जाने चाहिए. ये हमारी बुनियाद हैं. इन्हें हटाने की कोई ज़रूरत नहीं. हम हिंदुस्तानी हैं, मगर ये दोनों हमारे लिए ज़रूरी हैं.

महबूबा मुफ़्ती-

आर्टिकल 35 A के साथ छेड़छाड़ करना बारूद को हाथ लगाने के बराबर होगा- महबूबा मुफ़्ती

घाटी में 10,000 की अतिरिक्त फोर्स तैनात करने के केंद्र के फैसले से लोगों में डर का माहौल है. कश्मीर में सुरक्षा बलों की कोई कमी नहीं है. जम्मू-कश्मीर एक राजनैतिक समस्या है. इसे सैन्य तरीकों से हल नहीं किया जा सकता है. भारत सरकार को अपनी नीति पर फिर से विचार करने की ज़रूरत है.

हाल के घटनाक्रम की वजह से जम्मू-कश्मीर के लोगों में घबराहट का माहौल है. मैंने डॉक्टर फार्रुक अब्दुल्ला साहब से सभी दलों की मीटिंग बुलाने का आग्रह किया है. अभी ज़रूरत है साथ मिलकर काम करने की. कश्मीर के लोगों को एकसाथ मिलकर खड़ा होना होगा.

उमर अब्दुल्ला-

आप (बीजेपी और केंद्र) इतनी जल्दी में क्यों है? हम सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सम्मान करेंगे, जैसा कि हमने हमेशा किया है.

शाह फैसल-

कश्मीर में 100 अतिरिक्त कंपनियों की तैनाती से जुड़ी गृह मंत्रालय की विज्ञप्ति के कारण घाटी में काफी तनाव है. कोई नहीं जानता कि एकाएक इतने फोर्सेज़ को क्यों बुलाया जा रहा है. अफ़वाहें हैं कि कुछ भयानक होने वाला है. क्या ये आर्टिकल 35 A से जुड़ा है? ये एक लंबी रात होने वाली है.

सज़ाद लोन-

कश्मीर में डर और घबराहट का माहौल है. नाकाम शूरमा जोखिम उठाने पर आमादा हैं. नाकामयाब प्रयोगवादी और प्रयोग करने पर तुले हैं. घमंड में तर्क और विवेक चला जाता है.

रविंदर रैना, बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष-

अतिरिक्त सुरक्षाबलों की तैनाती आने वाले जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनावों के मद्देनज़र है.

अतिरिक्त फोर्सेज़ की तैनाती पर प्रशासन क्या कह रहा है?

सारी उहापोह के बीच हवाई और ज़मीनी रास्ते से अडिशनल फोर्सेज़ को घाटी पहुंचाया जा रहा है. यहां पहले से ही काफी तादाद में सुरक्षा बल मौजूद हैं. अमरनाथ यात्रा और बाकी सुरक्षा ज़रूरतों के मद्देनज़र पहले से ही सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्सेज़ की 450 से ज्यादा कंपनियां यहां मौजूद हैं. ऐसे में इस अतिरिक्त तैनाती को लेकर स्थानीय लोगों में काफी शंका है. सिक्यॉरिटी फोर्सेज़ का कहना है कि ये रूटीन मूवमेंट है. 27 जुलाई को अडिशनल डायरेक्टर जनरल पुलिस (ADGP) लॉ ऐंड ऑर्डर मुनीर खान ने लोगों से अफ़वाहों पर कान न देने की अपील की. उन्होंने कहा कि घाटी में करीब 200 ट्रेनिंग कंपनियां तैनात हैं. उन्हें चरणबद्ध तरीके से रिप्लेस किया जाएगा. ये 100 अतिरिक्त कंपनियां इसीलिए बुलाई गई हैं.

क्या-क्या अफ़वाहें हैं?
तमाम आश्वासनों के बावजूद घाटी में अफ़वाहें तैर रही हैं. सबसे मजबूत तो यही अफ़वाह है कि केंद्र Article 35 A खत्म करने जा रहा है. इसकी वजह से घाटी में अगर स्थितियां हिंसक होती हैं, तो उसी से निपटने के लिए ये अतिरिक्त फोर्सेज़ बुलाई गई हैं. एक अफ़वाह ये भी है कि केंद्र घाटी के अंदर चरमपंथियों के खिलाफ बड़े स्तर पर ऑपरेशन शुरू करने जा रहा है. एक संभावना ये भी है कि शायद 15 अगस्त को ध्यान में रखकर ये तैनाती की गई है.

ये मेसेज भी काफी शेयर किया जा रहा है सोशल मीडिया पर.
ये मेसेज भी काफी शेयर किया जा रहा है सोशल मीडिया पर (फोटो: ट्विटर)

जानकार क्या बता रहे हैं?
हमने जम्मू-कश्मीर के पूर्व DGP कुलदीप खोड़ा से बात की इस बारे में. उन्होंने कहा कि ऐसा लगता नहीं कि सरकार अपनी तरफ से इस मामले में कोई निर्णय लेगी. बीजेपी नेताओं की अर्जेंट मीटिंग के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि ये राजनैतिक ज्यादा लगता है. ऐसा नहीं लगता कि इस मीटिंग में Article 35 A से जुड़ी कोई बातचीत हो. मुमकिन है राज्य के विधानसभा चुनावों को लेकर बीजेपी अपनी तैयारी के बारे में बातचीत करे. Article 35 A को लेकर हो रही कयासबाजियों पर कुलदीप खोड़ा ने कहा-

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात का कोई इशारा नहीं दिया है कि फैसला कब आएगा. हो सकता है कि सुप्रीम कोर्ट आगे दोनों पक्षों को सुनकर सुनवाई करना चाहे. हो सकता है उन्होंने जितनी सुनवाई की, उसके आधार पर किसी फैसले पर पहुंच गए हों. सुप्रीम कोर्ट में ये मसला काफी समय से है. एडमिनिस्ट्रेशन को लगता है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ सकता है. कब आएगा, ये फैसला तो सुप्रीम कोर्ट ही करेगा. 

ये आर्टिकल 1954 से है. इसे हटाने या न हटाने की बात कई बार पहले भी चली है. जब से ये मसला सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है, तब से इस पर ज्यादा बात होने लगी है. बहुत जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट इस पर क्लियर-कट फैसला दे दे ताकि अनिश्चितता खत्म हो. बजाय इसके कि ये हर बार मुद्दा बने, लॉ ऐंड ऑर्डर की दिक्कत हो. जो भी कानूनी तौर पर सही हो, उसे सभी को मानना चाहिए. मुझे लगता है कि सरकार भी यही चाहती है.

अगर सुप्रीम कोर्ट 35 A हटाने जैसा कोई फैसला देती है, तो जाहिर है कि लॉ ऐंड ऑर्डर प्रॉब्लम हो जाएगी. उससे डील करने के लिए तैयारी करना हर सरकार का फर्ज़ है. इसमें ये कयास लगाना मुनासिब नहीं होगा कि ये हटेगा या नहीं. अगर नहीं हटेगा, तो लॉ ऐंड ऑर्डर की प्रॉब्लम नहीं होगी. हटेगा तो लॉ ऐंड ऑर्डर की प्रॉब्लम कश्मीर, और उसमें भी सिटी और टाउन्स में होगी. 

 

ऐसे कई सारे कार्ड्स शेयर हो रहे हैं सोशल मीडिया पर.  कश्मीर में लोगों को भारत के खिलाफ संगठित होने के लिए कहा जा रहा है (फोटो: ट्विटर)
ऐसे कई सारे कार्ड्स शेयर हो रहे हैं सोशल मीडिया पर. कश्मीर में लोगों को भारत के खिलाफ संगठित होने के लिए कहा जा रहा है (फोटो: ट्विटर)

इतने सेंसेटिव मुद्दे पर इतना कन्फ्यूजन?
क्या होने वाला है, मालूम नहीं. क्या आर्टिकल 35 A पर कोई भी फैसला लेने से पहले सरकार सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का इंतज़ार करेगी? क्या मोदी सरकार आर्टिकल 35 A खत्म करके अपना सबसे सख़्त कदम उठाने जा रही है? अगर ऐसा होता है, तो शायद 15 अगस्त मुफ़ीद रहे. ख़बरें बता रही हैं कि ऐसे में होने वाले मास प्रोटेस्ट से निपटने के लिए सरकार योजना बना रही है- कर्फ्यू, इंटरनेट बंद करना, आतंकवादी हमलों से सुरक्षा, संवेदनशील जगहों की अतिरिक्त सुरक्षा. सब कुछ. सोशल मीडिया पर भी काफी हो-हल्ला मचा हुआ है. दोनों तरफ के लोग- हटाए जाने के समर्थक और बरकरार रखे जाने के सपोर्टर- सब अपने अपने हिसाब से लिख रहे हैं. काफी कन्फ्यूजन का माहौल है. Article 35 A जैसे संवेदनशील मसलों पर इस तरह का कन्फ्यूज़न और टेंशन सेहतमंद तो नहीं है कश्मीर घाटी के हिसाब से. बिना किसी पुष्टि के इतना सारा ब्योरा बाहर आना, इतनी कयासबाजी, ये सब कश्मीर को और सुलगने का मौका दे सकती हैं.


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