गैंग्स ऑफ वासेपुर में पीयूष मिश्रा ने गाया है- इक बगल में चांद होगा, इक बगल मेंरोटियां. यहां जबरन साइंस घुसाने के लिए माफ कीजिएगा. लेकिन चांद पर रोटी की चादरबिछाने के लिए पहले वहां फसल उगानी होगी.आज से करीब 50 साल पहले इंसान ने चांद पर कदम रखा. लेकिन हमारी जात कभी वहां टिकनहीं पाई. कहीं भी टिकने के लिए तीन चीज़ें चाहिए होती हैं. रोटी, कपड़ा और मकान.कपड़ा मान लो एस्ट्रोनॉट का सूट है. मकान यानी मून बेस भी बना लिया जाएगा. लेकिनसवाल ये है कि रोटी कहां से लाएंगे. इस सवाल का जवाब मीलों लंबा है. लेकिन साल 2022के माह-ए-मई में एक छोटा सा कदम उस तरफ बढ़ा दिया गया है.13 मई 2022 को पहली बार चांद की मिट्टी पर पौधे उगाने की पुष्टि हुई. चांद पर रोटीकी कहानी जो 50 साल पहले शुरू हुई थी, वो यहां तक कैसे पहुंची? आगे कहां तकपहुंचेगी? इस घटना के मायने क्या हैं? साइंसकारी का एक एपिसोड इसी कहानी कोसमर्पित.चांद पर 'जेसीबी की खुदाई'अंतरिक्ष की ज़्यादातर कहानियों की तरह ये कहानी भी शुरू होती है स्पेस रेस से.दूसरे विश्व युद्ध से फुरसत होने के बाद अमेरिका और रूस के बीच शीत युद्ध शुरू होगया. दोनों देश हर चीज़ में कॉम्पिटिशन करने लग गए. जब धरती से बोर हो गए, अंतरिक्षमें रेस लगाने लगे.माहौल ऐसा खिंच गया कि देखा जाने लगा कि पहले कौन क्या करता है. रूस ने पहलाअंतरिक्षयात्री स्पेस में भेजा. यूरी गगारिन नाम था उनका. अमेरिका को ये बात चिपरीलग गई. अमेरिका ने इंसान को चांद पर भेजने का टारगेट रखा. और 1969 में अमेरिका येकर दिखाया. तीन साल(1969-72) में अमेरिका ने कुल 12 लोगों को चांद पर भेजा. रूसअपना एक भी आदमी चांद पर नहीं भेज पाया.अब ऐसे माहौल में लाज़िम था कि रूस अमेरिका से कह दे. ‘ठीक है, हम अपने आदमी चांदपर नहीं भेज पाए. लेकिन तुम्हारे वाले चांद से कौनसी खाक बीन लाए?’ यहां अमेरिकालपककर जवाब दे देगा - ‘अरे मजाक-मजाक में 400 किलो सामान हो गया.'तीन साल में अमरीकी एस्ट्रोनॉट बोरा भरभर के सामान बटोर लाए. चांद से कुल 382किलोग्राम चट्टानें, कंकड़, रेत, धूल और कोर सैंपल्स पृथ्वी पर लाए गए. चांद परखुदाई करके लाए गए इस पूरे माल को ‘लूनर रिगोलिथ’ कहते हैं.लैटिन में ‘लूना’ का मतलब होता है चांद. ‘रिगोलिथ’ माने किसी ग्रह या उपग्रह कीबाहरी सतह. लूनर रिगोलिथ का मतलब हुआ चांद से ऊपर-ऊपर से खोदकर लाई गई सामग्री. इसेभाषा की सहूलियत के लिए हम चांद की मिट्टी कहेंगे. NASA ने दी 12 ग्राम मिट्टीचांद पर मनुष्य भेजने वाले इस प्रोग्राम को नासा ने ‘अपोलो प्रोग्राम’ का नाम दिया.अपोलो प्रोग्राम के लोगों ने बड़ी दूर की सोच रखी थी. उनने सोचा कि ‘यार आज तोहमारे पास कायदे की टेक्नोलॉजी नहीं है. लेकिन भविष्य में हम तरक्की करेंगे. तो ऐसाकरते हैं, ये चांद की मिट्टी बचाकर रखते हैं. और फ्यूचर में बेहतरीन टेक्नोलॉजी कीमदद से समझा जाएगा.’2022 में यही हुआ. यूनिवर्सिटी ऑफ फ्लोरिडा के कुछ वैज्ञानिक नासा के पास गए. इनवैज्ञानिकों ने कहा कि यार अपोलो मिशन में जो चांद से मिट्टी लाए थे, उसमें से हमेंचार ग्राम मिट्टी दे दो.पांडवों ने कौरवों से पांच गांव मांगे थे. वो नहीं दिए, सो महाभारत हो गई. इसलिएनासा वालों ने समझदारी दिखाई. नासा ने कहा, ‘अरे कैसी बात कर रहे हो. ये लो 12ग्राम मिट्टी रखो.’नासा से 12 ग्राम चांद की मिट्टी पाने के बाद ये फ्लोरिडा यूनिवर्सिटी के साइंटिस्टकाम पे जुट गए. उनको पता करना था कि क्या चांद की मिट्टी पर पौधे उगाए जा सकते हैं?महीनों शोध के बाद जवाब मिला, हां ऐसा किया जा सकता है. स्पेस वाले बागवान इस एक्सपेरिमेंट के लिए एक खास पौधे का इस्तेमाल किया गया. Arabidopsis thaliana.इस पौधे का नाम आपने शायद ही पहले कभी सुना हो. इसके बारे में इतना जान लीजिए कि येब्रॉकली और फूल-गोभी का रिश्तेदार है.लेकिन इसी पौधे को क्यों चुना गया? क्योंकि ये एक ऐसा पौधा है जिसके ऊपर बहुतरिसर्च हो चुकी है. वैज्ञानिकों को इसके बारे में ऑलरेडी बहुत कुछ पता है. इसकाजेनेटिक कोड भी रिकॉर्ड किया जा चुका है. तो किसी भी नए एक्सपेरिमेंट में इस पौधेमें होने वाले बदलाव को बेहतर ढंग से स्टडी किया जा सकता है. इसलिए चांद की मिट्टीपर उगाने के लिए इस पौधे को चुना गया.इस एक्सपेरिमेंट के लिए अपोलो 11, 12 और 17 मिशन की एक-एक ग्राम चांद वाली मिट्टीली गई. ये तीनों मिशन चांद के अलग-अलग इलाकों में लैंड हुए थे. इन तीनों इलाकों कीमिट्टी डिफरेंट है. एक-एक ग्राम मिट्टी को तीन छोटे ट्यूब्स में पानी और बीज के साथमिलाया गया. और पोषण के लिए इनमें रोज़ाना एक न्यूट्रिएंट सॉल्यूशन डाला गया.इन तीन के अलावा अन्य चीज़ों में भी उसी समय ये बीज लगाए गए. जैसे कि ज्वालामुखी कीराख और पृथ्वी के कुछ दुर्गम इलाकों से लिए गए सैम्पल्स. इन्हें तुलनात्मक अध्यन केलिए रखा गया. ये देखने के लिए कि पृथ्वी के कठोर इलाकों की तुलना में चांद कीमिट्टी कैसे परफॉर्म करती है.कुल-मिलाकर वैज्ञानिकों के पास कुल छह सैंपल्स हो गए. जिनमें से तीन चांद की मिट्टीके थे. और तीन पृथ्वी के. फिर शुरू हुआ खेल. ये तो सफर-सफर की बात हैबीज रोपने के दो दिन बाद ये सभी अंकुरित होने लगे. ये देखकर वैज्ञानिक बहुत खुशहुए. उन्हें उम्मीद नहीं थी कि चांद की मिट्टी वाले पौधे उगेंगे. इससे ये पुष्टिहुई कि पौधों के अंकुरित होने में चांद की मिट्टी कोई दिक्कत पैदा नहीं करती. छठवेंदिन तक करीब हर पौधा एक-जैैसा दिख रहा था. लेकिन छठवें दिन के बाद पौधों ने अलग-अलगरास्ते पकड़ लिए. चांद की मिट्टी वाले पौधे जूझने लगे. उनकी ग्रोथ धीमी हो गई. इनकीकुछ पत्तियों में लाल निशान पड़ने लगे. और कुछ पत्तियां पूरी तरह विकसित नहीं होपाईं. खैर, आधे और धीमे ही सही, लेकिन चांद की मिट्टी पर भी पौधे बढ़ रहे थे.खास बात ये थी कि चांद की मिट्टी के ही अलग-अलग सैंपल्स अलग-अलग प्रतिक्रिया दिखारहे थे. अपोलो 11 का सैंपल बाकी दो के मुकाबले कमज़ोर पड़ने लगा. ऐसा शायद इसलिएहुआ क्योंकि चांद के अलग-अलग इलाकों में सूर्य से आने वाले रेडिएशन की मात्रा अलगहोती है. इससे वहां की मिट्टी में फर्क पड़ता है. कुछ और दिन बाद कोई भी नंगी आंखोंसे देखकर बता सकता था कि चांद वाले तीन पौधे बाकी तीन से अलग दिखाई दे रहे हैं.बीस दिन के बाद इन पौधों की जेनेटिक स्टडी की जाने लगी. जीन्स हर जीव की बुनियाद तयकरते हैं. वैज्ञानिक ये देखना चाहते थे कि पौधों में किस तरह के जेनेटिक बदलाव आरहे हैं. जेनेटिक स्टडी से पता चला कि चांद की मिट्टी में लगे पौधे तनाव महसूस कररहे हैं. इस तरह का तनाव तब देखा जाता है, जब मिट्टी में बहुत ज़्यादा सॉल्ट औरहैवी मेटल्स होते हैं.तो कुल-जमा बात ये है कि· चांद की मिट्टी पर पौधे उगाए जा सकते हैं. · चांद की मिट्टी में पौधों के लिए एक स्ट्रेस भरा माहौल है. यानी ये पौधे तनावमहसूस करते हैं. · चांद के अलग-अलग इलाकों की मिट्टी में पौधे अलग तरीके से रिएक्ट करते हैं.अब आगे क्या होगा? अब भविष्य के लिए बहुत सारे सवाल हैं. आगे ये देखा जाना है कि पौधे लगाने से चांदकी मिट्टी में क्या बदलाव आते हैं? क्या इन पौधों के जीन्स में इस तरह छेड़खानी कीजा सकती है कि ये उस तनाव को झेल पाएं? क्या चांद की इस स्टडी से हमें मंगल ग्रह परपौधे उगाने में कुछ मदद मिल सकती है? इस तरह के कई छोटे-बड़े सवाल हैं.लेकिन मन में एक सवाल शुरू से उठ रहा होगा कि ये सब करने की क्या ज़रूरत है?आपको शुरू में अपोलो मिशन्स के बारे में बताया था. उन अपोलो मिशन्स के बारे में एकऔर फैक्ट ये है कि आखिरी अपोलो मिशन 1972 में गया है. उसके बाद नासा ने लोगों कोचांद पर भेजना बंद कर दिया. अमेरिका के अलावा कोई और देश कभी चांद पर किसी इंसान कोनहीं पहुंचा पाया. मतलब 50 साल से चांद पर कोई होमो सेपियन नहीं गया है.लेकिन अमेरिका दोबारा चांद पर जाने की तैयारी कर रहा है. नासा के इस प्रोग्राम कानाम है - ‘आर्टेमिस प्रोग्राम’. चांद पर पहला मिशन साल 2025 में भेजने का प्लान है.पिछली बार(अपोलो) की तरह इस बार नासा चांद पर टहलने नहीं जा रहा है. इस बार प्लानलंबा रुकने का है. We are going to the Moon — to stay. इस तरह के ट्वीट आ रहे हैंनासा की तरफ से. We are going to the Moon — to stay.We will build sustainable infrastructure to support missions to Mars and beyond.This is what we’re building. This is what we’re training for. We are going.#Moon2024 pic.twitter.com/dgL6NoZ2Rj— NASA (@NASA) May 14, 2019ऐसे में, ये रिसर्च चांद पर भोजन और ऑक्सीजन की बुनियाद बन सकती है. सिर्फ चांद परही नहीं, बल्की मंगल और बाहरी अंतरिक्ष में डेरा जमाने के लिए भी ये रिसर्च मददगारसाबित होगी.इस रिसर्च का एक बोनस पॉइंट है. इस तरह के प्रयोग से खेती-किसानी में इनोवेशन आसलगी रहती है. पृथ्वी के वो इलाके, जहां कुछ भी उगाना बहुत मुश्किल है, जहां भोजन कीकमी है, वहां इससे मदद मिल सकती है. ये समझने में मदद मिलेगी कि पौधे तनावयुक्तमाहौल में कैसे फल-फूल सकते हैं.त्रिभुवन ने कहा है - ‘उन्हें मंगल पर जीवन की तलाश है, मंगलमय जीवन की नहीं.’ तोमंगल पर जीवन ठीक है, लेकिन धरती पर जीवन भी मंगलमय हो. ये जीवन मंगलमय होना चाहिएकि नहीं होना चाहिए? इस रिसर्च के बारे में अपनी राय हमें कॉमेंट सेक्शन में बताइए.