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यूपी के इस मुख्यमंत्री की कहानी कांग्रेस के पतन की कहानी है

सुल्तानपुर के एक गांव की राजनीति से निकलकर ये राज्य के सीएम बने. इनके दौर में कांग्रेस में गुटबंदी ने ज़ोर पकड़ा.

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29 जनवरी 2017 (अपडेटेड: 28 जनवरी 2017, 03:13 AM IST)
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यूपी की राजनीति में 90 का दशक बड़ा महत्वपूर्ण रहा है. इस दौर में कांग्रेस का जनाधार लगातार खिसकता गया. राम मंदिर और हिंदुत्व के मुद्दे पर भाजपा का जनाधार बढ़ता गया. उसी दौर में मुलायम सिंह यादव ने भी अपनी राजनीति खड़ी कर ली. कांग्रेस यूपी में ब्राह्मण नेताओं के भरोसे रहती थी. पर उस वक्त इतने नेता और इतने 'ब्राह्मण' नेता हो गए कि कांग्रेस की राजनीति ही भस गई. संयोग की बात है कि बॉलीवुड में भी ये पतन का ही दौर था. राममंदिर, शाहबानो और बोफोर्स पर चलती कांग्रेस के अंत की ये शुरुआत भी फिल्मी थी. इस दौर में एक मुख्यमंत्री हुए थे. श्रीपति मिश्रा. गांव की राजनीति से निकलकर लखनऊ तक पहुंचने वाले मिश्रा की स्टोरी कांग्रेस की स्टोरी है.



शुरुआत सोशलिस्ट पार्टी से हुई, पर सफलता कांग्रेस में मिली

श्रीपति मिश्रा का जन्म सुल्तानपुर और जौनपुर के बॉर्डर पर के गांव शेषपुर में हुआ. इनके पिता रामप्रसाद मिश्रा राजवैद्य थे. शुरुआती पढ़ाई के बाद वो बनारस चले गए. वहीं पढ़ाई के दौरान ही श्रीपति छात्र आंदोलन में आ गए. 1941 में मिश्रा बीएचयू में यूनियन के सचिव चुने गए. फिर मिश्रा ने लखनऊ से वकालत पढ़कर सुल्तानपुर में ही 1949 में वकालत शुरू की. पर राजनीति से जुड़ाव के चलते चुनावों में किस्मत आजमाते रहे. 1952 में सोशलिस्ट पार्टी से सुल्तानपुर लोकसभा सीट से लड़े. पर हार गए. इसी बीच वो 1954 में जूडिशियल मजिस्ट्रेट हो गये. पर चार साल के अंदर ही 1958 में सरकारी नौकरी से रिजाइन कर फिर वकालत शुरू कर दी. इरादा राजनीति में जाने का था. इसके बाद उन्होंने लोकल राजनीति में ही कांग्रेस का दामन थाम लिया. लोकल पैठ थी ही.
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श्रीपति मिश्रा (4 दिसंबर 1923 - 8 दिसंबर 2002)

1962 के यूपी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के टिकट से विधायकी जीत गए. और विधानसभा के उपाध्यक्ष बने. उस वक्त कांग्रेस में भयानक राजनीतिक उथल-पुथल मची हुई थी. क्योंकि एक ही कद के कई नेता थे. संपूर्णानंद, चंद्रभानु गुप्ता, कमलापति त्रिपाठी, त्रिभुवन नारायण सिंह जैसे नेता एक साथ रह नहीं पा रहे थे. हमेशा लगता कि हर कोई एक-दूसरे को पटखनी दे रहा है. इसी में चौधरी चरण सिंह ने लोहियावाद से प्रभावित हो अपनी अलग पार्टी बना ली. श्रीपति मिश्रा इनके साथ हो लिए. 1969 में श्रीपति चौधरी चरण सिंह की भारतीय क्रांति दल से सांसद चुने गए. पर उस वक्त यूपी की राजनीति में चरण सिंह का दखल बढ़ रहा था. चरण के कहने पर श्रीपति मिश्रा ने सांसदी से रिजाइन कर दिया. यूपी विधान परिषद में आ गए. फरवरी 1970 से अक्टूबर 1970 तक चरण सिंह के मंत्रिमंडल में रहे. फिर अप्रैल 1971 तक त्रिभुवन नारायण सिंह के मंत्रिमंडल में रहे. सरकार में एजुकेशन मिनिस्टर बने. 1970 से 1976 तक वो विधान परिषद में रहे. इस दौरान कांग्रेस से उनकी नजदीकी फिर बढ़ गई. ये भारत में बड़ी ही उथल-पुथल का दौर था. इमरजेंसी ने कई राजनीतिक समीकरण बना-बिगाड़ दिए. चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री बने. पर तब तक श्रीपति मिश्रा उनसे अलग हो चुके थे. पर यूपी की राजनीति में बराबर बने रहे.

कांग्रेस से ही बने मुख्यमंत्री, पर राजीव का कोपभाजन बनना पड़ा

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1980 के विधान सभा चुनाव में कांग्रेस की वापसी हुई. श्रीपति मिश्रा भी 1962 और 1967 के बाद तीसरी बार फिर विधायकी जीते. और विधान सभा अध्यक्ष बने. ये दौर यूपी पॉलिटिक्स में अहम था. क्योंकि दनादन मुख्यमंत्री बदले जा रहे थे. 1980 से 1985 तक कांग्रेस के तीन मुख्यमंत्री रहे यूपी में. पहले वी पी सिंह मुख्यमंत्री थे. उस वक्त बुंदेलखंड में डाकुओं का बड़ा आतंक था. वी पी ने ऐलान किया था कि डाकुओं को खत्म कर दूंगा नहीं तो रिजाइन कर दूंगा. डाकुओं ने उनके भाई को ही मार दिया. हालांकि ये अनजाने में हुआ था. पर वी पी ने रिजाइन कर दिया. तो आनन-फानन में श्रीपति मिश्रा को 1982 में मुख्यमंत्री बनाया गया. पर इस दौरान राजीव से उनकी तल्खी बढ़ती गई. जुलाई 1984 में श्रीपति मिश्र को अपना पद छोड़ना पड़ा. हालांकि कार्यकाल भी लगभग पूरा हो चुका था. पर इतना भी इंतजार नहीं किया गया. मिश्रा ने अपने इस्तीफे में वजह दी कि स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता.
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1984 की यूपी यात्रा में राजीव गांधी से जब किसी ने पूछा कि क्या वो श्रीपति मिश्रा के काम से संतुष्ट हैं तो उन्होंने कहा - "कोई किसी से कभी भी पूरी तरह से संतुष्ट नहीं हो सकता, लेकिन लोग संतुष्ट हैं."

1980 के चुनाव में श्रीपति मिश्रा इसौली से विधायक बने थे. अपने मुख्यमंत्री काल में श्रीपति मिश्रा ने इसौली में सड़कें और पुल बनवाए.


श्रीपति मिश्रा की राजनीति का अंत बिल्कुल कांग्रेस की राजनीति की तरह है

फिर 1985 से 1989 तक मछलीशहर से सांसद रहे. उसके बाद एक्टिव राजनीति से संन्यास ले लिया. 2002 में बलरामपुर हॉस्पिटल में इनकी मौत हो गई. श्रीपति मिश्रा को आखिरी दिनों में कांग्रेस ने कोई तवज्जो नहीं दी. इंदिरा गांंधी की हत्या होने के बाद राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने. 1984 में ही उन्होंने चुनाव की घोषणा कर दी. पर कांग्रेस को भी बदलने लगे. पुराने नेताओं की जगह नए लोगों को लेने लगे. उनके कई नए साथी आ गए. जो कि मंत्रियों से भी ज्यादा ताकतवर माने जाते थे. कहा तो यहां तक जाता है कि राजीव के करीबी अरुण नेहरू तो पुराने नेताओं के साथ बहुत बुरा बर्ताव करते थे. श्रीपति मिश्रा को श्रीपति कह के बुलाते थे. किसी की इज्जत नहीं करते थे.
arun nehru अरुण नेहरू. (क्रेडिटः फोटो डिविजन, भारत सरकार)

श्रीपति मिश्रा के दौर से ही कांग्रेस में गुटबाजी चरम सीमा पर पहुंच गई थी. लोग एक-दूसरे की टांग खींचने में लगे थे. कांग्रेस के सत्ता गंवाने के बाद मुलायम सिंह यादव 1989 में मुख्यमंत्री बने थे. कांग्रेस ने ही समर्थन दिया था. क्योंकि कांग्रेस की धुर-विरोधी भाजपा भी अपना जनाधार बढ़ा चुकी थी. इसी पॉलिटिक्स में कांग्रेस ने मुलायम से सपोर्ट खींचने का फैसला किया. पर कहा जाता है कि आपसी पॉलिटिक्स में ही किसी ने मुलायम को ये खबर लीक कर दी. मुलायम ठहरे स्मार्ट नेता. अब बुढ़ौती में ना हारे हैं. उस वक्त कुछ और हुआ करते थे. भोर होते ही मुलायम राज्यपाल के पास पहुंच गए. उस वक्त के राज्यपाल सत्यनारायण रेड्डी मुलायम के दोस्त हो गए थे. इस दोस्ती की भी कई कहानियां हैं कि राज्यपाल कैसे मुलायम को बचाते थे. जब तक नारायण दत्त तिवारी राज्यपाल के पास समर्थन वापसी के लिए पहुंचते राज्यपाल ने विधानसभा भंग कर दी थी.
इनके मरने के बाद इनके बेटों की भी कांग्रेस में कोई खास इज्जत नहीं हुई. हालांकि बड़े बेटे राकेश MLC बने थे. पर 2016 में वो भी भाजपा में शामिल हो गए. एक और कांग्रेसी हेमवती नंदन बहुगुणा की बेटी रीता बहुगुणा जोशी के कहने पर. रीता ने खुद भाजपा जॉइन कर लिया. श्रीपति मिश्रा का छोटा बेटा प्रमोद मिश्रा भी राजनीति में है. पर अपेक्षित सफलता नहीं मिली है.


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