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'हम अपनी रात की उड़ान में सब पार कर आए हैं'

एक कविता रोज़ में आज पढ़िए अज्ञेय (7 मार्च, 1911 - 4 अप्रैल, 1987) की कविता - कई नगर थे.

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7 मार्च 2019 (अपडेटेड: 7 मार्च 2019, 10:55 AM IST)
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7 मार्च 1911 को उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले में जन्मे अज्ञेय जी को बचपन में इनकी सच्चाई के प्रति प्रेम के चलते 'सच्चा' नाम से पुकारा जाता था. साइंस से ग्रेजुएशन करने के बाद पोस्ट ग्रेजुएशन के लिए अंग्रेजी चुनी, लेकिन पोस्ट ग्रेजुएशन पूरी हो पाती इससे पहले ही इनके जेल दौरे शुरू हो गए थे. उसके बाद तो अपने क्रांतिकारी व्यवहार के चलते पांच-छः साल तक विभिन्न जेलों में आते जाते रहे. आर्मी ज्वॉइन की, रेडियो में काम किया, पत्रिकाओं का संपादन किया, देश विदेश की यात्राएं कीं, देश विदेश के संस्थानों में पढ़ाया और इस दौरान लगातार हिंदी साहित्य की सेवा करते रहे. कविताएं लिखीं, कहानियां लिखीं. उपन्यास, यात्रा वृतांत, निबंध, संस्मरण और डायरी विधा में भी योगदान दिया. उनके द्वारा संपादित ‘तार सप्तक’‚ ‘दूसरा सप्तक’‚ और ‘तीसरा सप्तक’ को काव्य–संकलनों के क्षेत्र में 'युग परिवर्तक' का दर्ज़ा मिला है. उनके जीवन काल में उनके द्वारा रचित कविताओं के दसियों काव्य-संग्रह प्रकाशित हुए हैं. उनके उपन्यासों में - 'शेखरः एक जीवनी' और 'नदी के द्वीप' हिंदी साहित्य में बहुत ऊंचा स्थान रखते हैं.

आइए ऐसे ही बहुमखी प्रतिभा के धनी श्री सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' जी की एक कविता आपको पढ़वाते हैं, जिसमें वे अपने किसी विमान यात्रा के दौरान के अनुभव को लुप्त हो रही संवेदनाओं के मेटाफर के रूप में प्रयोग में लाते हैं.

***कई नगर थे***

कई नगर थे जो हमें देखने थे

जिन के बारे में पहले पुस्तकों में पढ़ कर उन्हें परिचित बना लिया था और फिर अखबारों में पढ़ कर जिन से फिर अनजान हो गए थे

पर वे सब शहर- सुन्दर, मनोरम, पहचाने पराये, आतंक-भरे रात की उड़ान में अनदेखे पार हो गए

कहां हैं वे नगर? वे हैं भी?

हवाई अड्डों से निकलते यात्रियों के चेहरों में उन की छायाएं हैं-

यह: जिस के टोप और अखबार के बीच में भवें दीखती हैं- इस की आंखों में एक नगर की मुर्दा आबादी है.

यह: जो अनिच्छुक धीरे हाथों से अपना झोला दिखाने के लिए खोल रहा है- उस की उंगलियों के गट्टों में और एक नगर के खंडहर हैं.

और यह: जिस की आंखें सब की आंखों से टकराती हैं, पर जिस की दीठ किसी से मिलती नहीं, उस का चेहरा- और एक क़िलेबन्द शहर का पहरे-घिरा परकोटा है.

नगर वे हैं, पर हम अपनी रात की उड़ान में सब पार कर आए हैं एक जगमग अड्डे से और एक जगमग अड्डे तक.


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