‘पुल पार करने से/ पुल पार होता है/ नदी पार नहीं होती’ यह कहने वाले नरेश सक्सेनाकी काव्य-संक्षिप्ति में अर्थ-बहुलता का जो वैभव है, वह शब्दों को मूल्यवान बनाताहै और इसलिए जब कोई इस वैभव की व्याख्या करने का प्रयास करता है, यह विवश करता हैचुप होने को. नरेश सक्सेना का कल जन्मदिन था, हम आज उन्हें शुभकामनाएं दे रहे हैं.उन्होंने शब्द-संख्या के लिहाज से बहुत छोटी और बहुत कमाल की कविताएं लिखी हैं,लेकिन आज एक कविता रोज़ में हम उनकी थोड़ी लंबी लेकिन बहुत चर्चित कविता ‘गिरना’ पढ़वारहे हैं. नरेश अपने कविता पढ़ने के अंदाज को लेकर भी कविता-प्रेमियों में काफीलोकप्रिय हैं. कविता के आखिर में इसकी बानगी देखी और सुनी जा सकती है...गिरना चीजों के गिरने के नियम होते हैं मनुष्यों के गिरने के कोई नियम नहीं होतेलेकिन चीजें कुछ भी तय नहीं कर सकतीं अपने गिरने के बारे में मनुष्य कर सकते हैंबचपन से ऐसी नसीहतें मिलती रहीं कि गिरना हो तो घर में गिरो बाहर मत गिरो यानीचिट्ठी में गिरो लिफाफे में बचे रहो यानी आंखों में गिरो चश्मे में बचे रहो यानीशब्दों में बचे रहो अर्थों में गिरो यही सोच कर गिरा भीतर कि औसत कद का मैं साढ़ेपांच फीट से ज्यादा क्या गिरूंगा लेकिन कितनी ऊंचाई थी वह कि गिरना मेरा खत्म हीनहीं हो रहा चीजों के गिरने की असलियत का पर्दाफाश हुआ सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दीके मध्य जहां पीसा की टेढ़ी मीनार की आखिरी सीढ़ी चढ़ता है गैलीलियो और चिल्ला करकहता है इटली के लोगो, अरस्तू का कथन है कि भारी चीजें तेजी से गिरती हैं और हल्कीचीजें धीरे-धीरे लेकिन अभी आप अरस्तू के इस सिद्धांत को गिरता हुआ देखेंगे गिरतेहुए देखेंगे लोहे के भारी गोलों और चिड़ियों के हल्के पंखों और कागजों और कपड़ों कीकतरनों को एक साथ, एक गति से, एक दिशा में गिरते हुए देखेंगे लेकिन सावधान हमेंइन्हें हवा के हस्तक्षेप से मुक्त करना होगा और फिर ऐसा उसने कर दिखाया चार सौ बरसबाद किसी को कुतुबमीनार से चिल्ला कर कहने की जरूरत नहीं है कि कैसी है आज की हवाऔर कैसा इसका हस्तक्षेप कि चीजों के गिरने के नियम मनुष्यों के गिरने पर लागू हो गएहैं और लोग हर कद और हर वजन के लोग खाए-पिए और अघाए लोग हम लोग और तुम लोग एक साथएक गति से एक ही दिशा में गिरते नजर आ रहे हैं इसीलिए कहता हूं कि गौर से देखो अपनेचारों तरफ चीजों का गिरना और गिरो गिरो जैसे गिरती है बर्फ ऊंची चोटियों पर जहां सेफूटती हैं मीठे पानी की नदियां गिरो प्यासे हलक में एक घूंट जल की तरह रीते पात्रमें पानी की तरह गिरो उसे भरे जाने के संगीत से भरते हुए गिरो आंसू की एक बूंद कीतरह किसी के दुख में गेंद की तरह गिरो खेलते बच्चों के बीच गिरो पतझर की पहली पत्तीकी तरह एक कोंपल के लिए जगह खाली करते हुए गाते हुए ऋतुओं का गीत कि जहां पत्तियांनहीं झरतीं वहां वसंत नहीं आता गिरो पहली ईंट की तरह नींव में किसी का घर बनाते हुएगिरो जलप्रपात की तरह टरबाइन के पंखे घुमाते हुए अंधेरे पर रोशनी की तरह गिरो गिरोगीली हवाओं पर धूप की तरह इंद्रधनुष रचते हुए लेकिन रुको आज तक सिर्फ इंद्रधनुष हीरचे गए हैं उसका कोई तीर नहीं रचा गया तो गिरो उससे छूटे तीर की तरह बंजर जमीन कोवनस्पतियों और फूलों से रंगीन बनाते हुए बारिश की तरह गिरो सूखी धरती पर पके हुए फलकी तरह धरती को अपने बीज सौंपते हुए गिरो गिर गए बाल दांत गिर गए गिर गई नजर औरस्मृतियों के खोखल से गिरते चले जा रहे हैं नाम, तारीखें और शहर और चेहरे... औररक्तचाप गिर रहा है तापमान गिर रहा है गिर रही है खून में मिकदार हीमोग्लोबीन कीखड़े क्या हो बिजूके से नरेश इससे पहले कि गिर जाए समूचा वजूद एकबारगी तय करो अपनागिरना अपने गिरने की सही वजह और वक्त और गिरो किसी दुश्मन पर गाज की तरह गिरोउल्कापात की तरह गिरो वज्रपात की तरह गिरो मैं कहता हूं गिरो *** नरेश सक्सेना कीएक और कविता ‘उसे ले गए’ यहां सुनें : https://www.youtube.com/watch?v=cLw1sJWTaKI