ये हैं भोपाल की अनुपमा शर्मा. लिखने-पढ़ने की शौकीन और हमारी अच्छी रीडर और दोस्त.इन्होंने पहले बॉटनी पढ़ी पर वहां मन लगा नहीं तो जर्नलिज्म किया. रहने वाली हैंभोपाल की. कभी-कभी रेडियो, मैगजीन और अलग-अलग वेबसाइट्स के लिए भी लिखती हैं. एककविता रोज में पढ़िए अनुपमा की कविता -देखता हूँ अक़्सर- इंसानियत को तार-तार होतेआँखों को ज़ार-ज़ार रोतेरक्त को धमनियों से ज्यादा सड़कों पर बहतेनन्ही देश की आशाओं को गरीबी के भँवर में खोतेआबरू छलनी हुई थी कल जिसकी ,उसी की तस्वीर में माला चढ़तेराजनीति को अभिनय में बदलते दानवीय सोच को इंसानो में पनपते लोगो को ख़ामियों पर नाज़ करते खूबियों को नज़रअंदाज़ करते रहता हूँ शून्य शांति की आस मेंखोज न जाने पूरी क्यों नही होती?हूँ मैं भी दूरदर्शी,जानता हूँ दुनिया ढूंढने लगी है ख़ुशी, दूसरो के ग़मों में ध्यान रखता हूँ तभी कि आहट को भी मेरी आहट न होतभी मेरे दर्द में भी आह की आवाज़ नहीं होती।बाज़ारों में घूमता हूँकि सामान मिल जाए कोईमगर कोई सामान मिले न मिलेहैसियत का सबब ज़रूर मिल जाता हैफिर कुछ इस तरह ज़रूरतों को समझाइश देता रहता हूँ ग़ुरबत की दुहाई देते हुए हवा में उछलती है सिक्के की तरह ये किस्मतज़िन्दगी को देखता हूँ कभी जीतते हुए कभी हारते हुए--------------------------------------------------------------------------------ये कविताएं भी पढ़ें -'अदालत में चंकी पांडे ने कहा कि वह तो अबु सलेम को पहचानता ही नहीं''मैंने उन फूलों को जब भी सोचा, बहुवचन में सोचा''मैं रथ का टूटा हुआ पहिया हूं, लेकिन मुझे फेंको मत'