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अधिकारी ने अस्पतालों के नाम उर्दू में भी लिखने का आदेश दिया था, यूपी सरकार ने सस्पेंड किया

उर्दू उत्तर प्रदेश की दूसरी राजभाषा है. अधिकारी तबस्सुम खान ने एक शिकायत के आधार पर दिया था ये आदेश.

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UP hospitals urdu name
सांकेतिक फोटो. (फोटो: सोशल मीडिया)
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धीरज मिश्रा
14 सितंबर 2022 (अपडेटेड: 14 सितंबर 2022, 06:42 PM IST)
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उत्तर प्रदेश सरकार (UP Government) ने राज्य की उस अधिकारी को निलंबित कर दिया है, जिसने कुछ दिन पहले ही एक आदेश दिया था कि अस्पतालों के साइनबोर्ड उर्दू (Urdu) में भी लिखे जाएं. इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, यूपी स्वास्थ्य विभाग ने संयुक्त निदेशक (स्वास्थ्य) तबस्सुम खान को निलंबित कर दिया है. उन्होंने प्रदेश के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और डॉक्टरों के नाम हिंदी की तरह उर्दू में भी लिखने का आदेश दिया था.

रिपोर्ट्स के मुताबिक, तबस्सुम खान ने ये फैसला अचानक से नहीं लिया था. उन्हें यूपी के उन्नाव से एक शिकायत मिली थी, जिसमें शिकायतकर्ता ने साल 2013 के उस आदेश को लागू करने की मांग की थी, जिसमें उर्दू भाषा में भी साइनबोर्ड लगाने के लिए कहा गया था. हालांकि राज्य के स्वास्थ्य विभाग का कहना है, 

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इससे पहले तबस्सुम खान ने एक सितंबर को जारी अपने आदेश में कहा था कि उन्नाव के रहने वाले मोहम्मद हारून ने शिकायत की है कि कई सरकारी विभाग उर्दू भाषा में साइनबोर्ड नहीं लगा रहे हैं, जबकि ये राज्य की दूसरी राजभाषा है. हारून ने अपनी शिकायत में कहा था कि जब साल 1989 में उर्दू को उत्तर प्रदेश की दूसरी राजभाषा का दर्जा दिया जा चुका है, तो फिर अस्पतालों और अधिकारियों के नाम हिंदू और उर्दू में क्यों नहीं लिखे जा रहे हैं.

कोर्ट में दी गई थी चुनौती

इस शिकायत पर कार्रवाई करते हुए अधिकारी ने कहा था, 

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सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर, 2014 में दिए अपने एक आदेश के जरिए उर्दू को यूपी की दूसरी राजभाषा बनाने के फैसले को बरकरार रखा था. कोर्ट ने कहा था कि राज्य में उपयोग की जाने वाली किसी भाषा को राज्य की विधायिका द्वारा संविधान के अनुच्छेद 345 के तहत राजभाषा घोषित किया जा सकता है. पांच जजों की पीठ ने ये फैसला दिया था.

दरअसल, उत्तर प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर कर उर्दू को दूसरी राजभाषा बनाने के फैसले को चुनौती दी थी. हालांकि, उच्च न्यायालय ने इस फैसले को बरकरार रखा था, जिसके बाद ये मामला साल 1997 में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था. फिर 25 सालों बाद सर्वोच्च अदालत ने इसकी संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा था.

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