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सुप्रीम कोर्ट ने SBI से कहा - 'ये भी बताओ किसने-किसको चंदा दिया?'

Electoral Bond का डेटा तो चुनाव आयोग की वेबसाइट पर आ गया, मगर किसने-किसको चंदा दिया है, वो सीधे तौर पर नहीं दिख रहा था. अब सुप्रीम कोर्ट ने फिर SBI को आदेश जारी कर दिया है.

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15 मार्च 2024 (अपडेटेड: 15 मार्च 2024, 12:14 PM IST)
sbi electoral bond
CJI का स्टेट बैंक को एक और झटका. (फ़ोटो - आजतक)
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गुरुवार, 14 मार्च को भारतीय चुनाव आयोग (ECI) ने चुनावी बॉन्ड से जुड़ा डेटा जारी कर दिया. किसने-किसको चंदा दिया है, वो सीधे तौर पर नहीं दिख रहा था. मगर अब सुप्रीम कोर्ट ने फिर SBI से अलग से कहा है कि चुनावी बॉन्ड (Electoral Bond) की संख्या का भी खुलासा किया जाए. ताकि चंदा देने वाले और लेने वाले के बीच का लिंक साफ़ स्थापित हो.

मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ (CJI DY Chandrachud) की अध्यक्षता वाली पांच-जजों की बेंच ने SBI को नोटिस जारी किया है कि वो इस ‘चूक’ की व्याख्या करें. इस पर अगली सुनवाई सोमवार, 18 मार्च को होगी.

क्या पेच फंसा था?

चुनाव आयोग की वेबसाइट पर 763 पेजों की दो लिस्ट्स अपलोड कर दी गई हैं. एक लिस्ट में बॉन्ड ख़रीदने वाली कंपनियों और व्यक्तियों की जानकारी दी गई है. दूसरी लिस्ट में बॉन्ड कैश कराने वाली पार्टियों की जानकारी है. मगर इससे सीधे तौर पर समझ नहीं आ रहा कि किसने-किसको पैसा दिया है. क्यों? ये समझ लेते हैं.

पहला सवाल: क्या होते हैं इलेक्टोरल बॉन्ड? बॉन्ड माने एक तरह का नोट. जो लोग किसी राजनीतिक पार्टी को 2000 रुपए से ज़्यादा का चंदा देना चाहते हैं, उनको भारतीय स्टेट बैंक की किसी भी ब्रांच से ये बॉन्ड ख़रीदने होते थे. फिर इन बॉन्ड को ख़रीदकर अपनी पसंदीदा पार्टी को दे दिया जाता था, और वो पार्टी इन बॉन्ड्स को अपने अकाउंट में लगाकर अपने पक्ष में भुगतान करा लेती थी. ठीक वैसे ही, जैसे आप किसी को अकाउंट पेयी चेक देते हैं. 

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मगर इससे ये नहीं पता चलता कि किसने-किसको बॉन्ड जमा किया है. क्यों? क्योंकि बॉन्ड एक पन्ना है. पन्ना किसने-किसको दिया, इसका कोई रिकॉर्ड नहीं होता. जैसे, ऑनलाइन पेमेंट है – उसका रिकॉर्ड रहता है, जांचा जा सकता है. मगर कैश का कोई हिसाब नहीं होता. वैसे ही बॉन्ड ख़रीदने की जानकारी तो सार्वजनिक कर दी गई है, मगर किस कंपनी ने किस पार्टी को कितने बॉन्ड दिए, वो नहीं पता चल पा रहा. 

सुप्रीम कोर्ट ने इसी संबंध में SBI को नोटिस जारी किया है. जैसे चेक में एक यूनीक नंबर होता है, वैसे ही हर बॉन्ड पर एक अल्फ़ा-न्यूमेरिक कोड होता है. अगर उस कोड की जानकारी भी सार्वजनिक कर दी जाए, तो पता चल जाएगा कि किस कंपनी/व्यक्ति ने कौन सा बॉन्ड ख़रीदा और किस पार्टी ने वो बॉन्ड भुनाया.

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स्टेट बैंक ने बॉन्ड का डेटा जमा करने के लिए 30 जून तक की मोहलत मांगी थी. सोमवार, 11 मार्च को आला अदालत ने उनकी इस मांग को ख़ारिज कर दिया था. चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में इसी फ़ैसले में संशोधन के लिए याचिका दायर की थी. इसी पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ ने कहा कि SBI ने बॉन्ड संख्या की जानकारी नहीं दी है और उन्हें ये जानकारी देनी होगी.

वीडियो: इलेक्टोरल बॉन्ड पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद SBI ने कौन-कौन से डॉक्यूमेंट्स जमा किए?

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