आठवीं क्लास तक मुझे मैथ्स कतई पसंद नहीं थी. दिमाग की दही हो जाती थी. क्लास होतीथी, बस मन करता था किस कोने में छिप जाऊं जहां उस खड़ूस शर्मा की नजर मुझ पर नपड़े. मैथ्स होमवर्क करना पहाड़ पर चढ़ने के बराबर लगता था. एक्जाम में बस पासिंगनंबर आ जाते थे. नौवीं में दूसरे टीचर आए. मैथ्स को बड़ी आसानी से भेजे में घुसानेलगे. मजा आने लगा क्लास में. जाहिर सी बात है फिर अच्छे नंबर भी आने लगे.वैसे ये मेरे अकेले की कहानी नहीं है. मेरे जैसे कई स्टूडेंट होंगे जिनके लिए मैथ्सकिसी जंग से कम नहीं होगा. सोचती हूं मैथ्स टीचर अगर अपने फेवरेट सुपर हीरो केकॉस्ट्यूम या फिर 'तारे जमीं पर' मूवी के आमिर खान की तरह पढ़ाने आते तो शायद मैथ्समें कोई बच्चा फेल ही नहीं होता. और उन पेरेंट्स के दिल के टुकड़े नहीं होते जोअपने बच्चों को इंजीनियर बनाना चाहते थे.मेक्सिको यूनिवर्सिटी में बैठे कंप्यूटर साइंस के बच्चे कितने लकी हैं. क्योंकिउनका पाला शर्मा जैसे टीचर से नहीं पड़ा. उनके सीएस के प्रोफेसर स्पाइडर मैन बनकरउनको पढ़ाने आते हैं. न खड़ूस सी शक्ल और न ही बोरियत क्लास. अपने फेवरेट कैरेक्टरसे पढ़ना मतलब कॉस्ट्यूम के जरिए ही सही, कितना मजेदार होता होगा. क्लास तो बंककरने का ख्याल सपने में भी नहीं आता होगा.Source : ReutersSource : Reutersमॉयसेज वासक्वेज, मेक्सिको यूनिवर्सिटी के साइंस डिपार्टमेंट में कंप्यूटर साइंस केअसिस्टेंट प्रोफेसर हैं. 26 साल के हैं. कॉलेज में लोग उन्हें 'स्पाइडर मॉय' के नामसे बुलाते हैं. क्योंकि वो क्लास में कोट-टाई लगा कर नहीं जाते. बल्कि स्पाइडर मैनबनकर जाते हैं. वैसी ही क्लास भी लेते हैं.Source : Reutersउनका कहना है कि मैं क्लास को एक बेटर प्लेस बनाना चाहता हूं. जहां स्टूडेंट्समजे-मजे में पढ़ाई कर सकें. ये धांसू सा आइडिया उनके दिमाग में कॉमिक्स पढ़कर आया.प्रोफेसर मॉय की इस हरकत से उनके घरवाले टेंशन में आ गए थे. उनको लगा कि कहीं उनकेबेटे को अपनी नौकरी से हाथ न धोना पड़े.Source : Reutersकरीब दो साल होने को है, मॉय ऐसे ही बच्चों को पढ़ा रहे हैं. स्टूडेंस के साथ-साथयूनिवर्सिटी के टीचर्स का भी फुल अटेंशन ले रहे हैं. उनका कहना है कि शुरू में तोथोड़ा अजीब लगा उनको पर बाद में सब सेट. मेक्सिको के लोग जब उन्हें ऐसे देखते हैंतो उनको विश्वास नहीं होता कि मॉय एक प्रोफेसर हैं.Source : ReutersSource : Reuters