यूपी में एकमत हुए बिना बिहार की विपक्षी एकता किस काम आएगी?
लोकसभा चुनाव की तैयारियों के सिलसिले में पटना में विपक्षी एकता के लिए बड़ी बैठक हो रही है. इस बीच एक सवाल ये खड़ा हो रहा है कि क्या उत्तर प्रदेश का समीकरण साधे बिना विपक्ष का BJP को हराने का प्लान क़ामयाब हो सकता है?

देश का सबसे बड़ा चुनाव यानी लोकसभा का चुनाव अगले 10 महीनों में होने वाला है. सत्ता पक्ष से लेकर विपक्ष तक इस सबसे बड़े चुनाव की तैयारियों में लग गए हैं. इस बीच केंद्र में पीएम मोदी को हराने के लिए विपक्ष एकजुट होने की क़वायद कर रहा है. इसी सिलसिले में शुक्रवार 23 जून को पटना में एक बैठक हो रही है जिसमें मोदी सरकार के कई धुर विरोधी एक साथ बैठकर विपक्षी एकता क़ायम करने की कोशिश में हैं.
इस बीच एक सवाल ये खड़ा हो रहा है कि क्या उत्तर प्रदेश का समीकरण साधे बिना विपक्ष का BJP को हराने का प्लान क़ामयाब हो सकता है? ये सवाल इसलिए क्योंकि 80 सीटों वाले यूपी में सपा के संबंध किसी दल से ठीक नहीं हैं और बिना गठबंधन किए BJP को यूपी में हराने की 3 कोशिशें विफ़ल हो चुकी हैं.

दरअसल, उत्तर प्रदेश में 2014 के बाद जितने चुनाव हुए हैं, उन सभी में BJP ने जीत के इतिहास गढ़े हैं. 2014 के लोकसभा चुनाव में BJP गठबंधन को 80 में से 73 सीटें हासिल हुईं. इसके बाद 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा-कांग्रेस गठबंधन के सामने 403 सीटों में BJP गठबंधन 325 सीटें जीतने में सफल हुई. इसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा BSP गठबंधन के बावजूद BJP गठबंधन ने 80 में से 64 सीटें जीत लीं. फिर 2022 में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में BJP ने 37 सालों पुराना रिकॉर्ड तोड़ने हुए दोबारा सरकार बनाई और BJP गठबंधन को 403 में 255 सीटों पर जीत हासिल हुई.
2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी का प्रदर्शन काफी ख़राब रहा. दोनों ही बार सपा सिर्फ 5-5 सीटें जीत सकी. 2019 में असंभव सा दिखने वाला गठबंधन BSP के साथ बना. तब 'बुआ-बबुआ' के नाम से अखिलेश यादव और मायावती का नाम लिया जाने लगा. इस गठबंधन से 2014 में खाता न खोलने वाली BSP ने 2019 में 10 सीटें जीत लीं, लेकिन सपा के आंकड़ों में कोई इज़ाफ़ा नहीं हुआ और वो 5 पर ही सीमित रह गई. इससे पहले 2017 के चुनाव में सपा ने कांग्रेस से हाथ मिलाया था. तब अखिलेश यादव और राहुल गांधी की जोड़ी को 'दो लड़कों की जोड़ी' बताकर जमकर चुनाव प्रचार हुआ. माहौल जम गया लेकिन नतीजे वो नहीं आए जिसकी उम्मीद दोनों दलों को थी. इसी तरह दो चुनावों में बड़े दलों से गठबंधन कर हाथ जला चुके सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने छोटे दलों से समझौता किया. इसका फ़ायदा सपा को हुआ. लेकिन वो BJP को हरा नहीं पाई. सपा को 2022 में 111 सीटें हासिल हुई थीं.
विपक्षी एकता के लिए पटना में शुक्रवार को होने वाली बैठक से पहले ही विपक्ष को यूपी में बड़ा झटका लगा. दलित चेहरा मायावती ने ट्वीट कर इस बैठक पर तंज कसा. उन्होंने लिखा है कि 'दिल मिले न मिले हाथ मिलाते रहिए' वाले हालात इस वक़्त उन दलों के हैं, जो बैठक में शामिल हो रहे हैं. ये निशाना सीधे तौर पर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस पर है. सपा की सहयोगी राष्ट्रीय लोकदल ने भी बैठक में शामिल न होने की घोषणा की है. हालांकि RLD प्रमुख जयंत चौधरी ने 'पारिवारिक कारणों' का हवाला देते हुए बैठक में न आने की बात चिट्ठी में लिखकर नीतीश कुमार को शुभकामनाएं दे दीं. जयंत चौधरी को लेकर लम्बे समय से क़यास लगाए जा रहे हैं कि उनकी नजदीकियां भी BJP से बढ़ी हैं. हालांकि BJP और RLD ने इसको लेकर कभी कोई टिप्पणी नहीं की है.
उत्तर प्रदेश को लेकर ये सारी क़वायद इसलिए हो रही है क्योंकि अकेले यूपी में 80 लोकसभा सीटें हैं. यहां BJP, सपा, BSP और कांग्रेस जैसे बड़े दलों के प्रभाव के साथ साथ RLD, अपना दल, सुभासपा और निषाद पार्टी जैसे क्षेत्रीय दलों का क्षेत्र विशेष में ठीक-ठाक प्रभाव रहता है. वर्तमान में BJP के साथ अपना दल (सोनेलाल) और निषाद पार्टी जुड़े हैं. सुभासपा के ओम प्रकाश राजभर को लेकर भी चर्चा है कि वो भी सपा का साथ छोड़ने के बाद BJP के साथ आने को तैयार बैठे हैं. RLD को लेकर भी चर्चाओं का बाज़ार गर्म है. यानी अगर मान लिया जाए कि BJP सुभासपा और RLD को भी अपने साथ ले लेती है तो विपक्ष में सपा, BSP और कांग्रेस को साथ आने की मजबूरी होगी. ये साथ दिखाने में भले आसान लगे लेकिन हक़ीक़त में लगभग 'असंभव' सा लगता है.
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव कांग्रेस पर अक्सर निशाना साधते रहते हैं. मायावती से भी उनके संबंध पुराने दौर में लौट आए यानी जो अनबन थी, वो गठबंधन टूटते ही फिर खड़ी हो गई. ऐसे में अखिलेश यादव अगर विपक्षी एकता के नाम पर कांग्रेस से हाथ मिलाने को तैयार भी हो जाते हैं तो भी कितनी सीटें कांग्रेस को दी जाएंगी और क्या कांग्रेस उस सीट शेयरिंग फॉर्मूले पर राज़ी होगी, ये कहा नहीं जा सकता.
अखिलेश यादव ने वैसे भी इशारों में यूपी में सबसे बड़ा क्षत्रप होने की घोषणा कर दी है. उन्होंने एक ट्वीट में कहा, 'सबको सपा के साथ आ जाना चाहिए'. साफ़ है सपा बड़े दल के तौर पर ही दिखना चाहेगी. इसी बीच कांग्रेस सबसे पुराने और राष्ट्रीय दल होने के नाते सपा से 'बराबरी वाले सम्मान' की उम्मीद करती है. मायावती का रुख देखकर साफ़ है कि वो इस विपक्षी एकता का हिस्सा नहीं बनेंगी. उनकी पार्टी अकेले ही लोकसभा के रण में उतर सकती है.
उधर सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव 'PDA' के फॉर्म्युले पर जातिगत समीकरण को अपने प्रचार का आधार बनाया है. PDA में 'P' से पिछड़ा, 'D' से दलित और 'A' से अल्पसंख्यक है. अखिलेश यादव ने इस समीकरण को साधने की योजना ज़रूर बनाई है, लेकिन निकाय चुनाव में जिस तरह अल्पसंख्यक वोटर कांग्रेस की तरफ डाइवर्ट हुए हैं, उससे सपा चिंतित भी है. पिछड़ों में भी BJP की मज़बूत पकड़ की वजह से सपा के लिए पिछड़े वोटों को साधना आसान नहीं होगा.
दलित वोटों पर अच्छा प्रभाव रखने वाली BSP अध्यक्ष मायावती पहले ही ग़ैर जाटव वोटरों के BJP की तरफ जाने से उन्हें जोड़ने के लिए प्रयास कर रही हैं. ऐसे में अखिलेश यादव ने PDA वाले फॉर्म्युले को उपयोगी ज़रूर बता दिया है लेकिन इसको साधा कैसे जाएगा, फ़िलहाल इसको लेकर जानकार लोग सपा की रणनीति से आकर्षित नहीं दिखाई दे रहे हैं.
भारतीय जनता पार्टी ने भी लोकसभा चुनाव की तैयारियां शुरू कर दी हैं. मोदी सरकार के 9 साल पूरे होने के मौके पर BJP ने पूरे जून महीने की विस्तृत योजना बनाकर वोटर्स तक पहुंचने का काम शुरू कर दिया है. हर लोकसभा सीट पर बड़े नेताओं की रैलियों के अलावा सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों तक पहुंचने और साथ ही जातिगत समीकरण साधने पर विशेष योजना तैयार की है.
जून में अभियान ख़त्म होने के बाद अगले चरण में नई योजना पर काम शुरू होगा. ये सिलसिला चुनाव तक यूं ही जारी रख BJP जनता तक अपनी बात रखने की दिशा में काम कर रही है. पार्टी ने सभी सीटों पर सर्वे कराने का भी फ़ैसला लिया है जिससे सबसे मज़बूत सीटें, लड़ाई वाली सीटें और कमज़ोर सीटों का आंकलन करने के अलावा अपने सांसदों के रिपोर्ट कार्ड भी तैयार करना शुरू कर दिया है.
वीडियो: प्रशांत किशोर ने नीतीश, ममता बनर्जी और अखिलेश यादव पर मीटिंग को लेकर क्या कहा?